वैसे ईसा के तीन हजार वर्ष पूर्व पनपी प्राचीन मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) की सभ्यता में भारत को ‘मेलुहा’ नाम से सम्बोधित किया गया है लेकिन यह पहचान भी बाद में सिंधु नदी की आभा में गुम हो गई। भारत के लिए ‘हिंदूश’ का पहला उल्लेख 486 ईपू में पारसी सम्राट दारा के समय लिखी गई किताब ‘नक्श-ए-रूस्तम’ में मिलता है। सम्राट दारा ( डेरियस) ने पहली बार 516 ईपू में भारत के सिंध प्रांत को जीता था। इस हिसाब से तब इस भूभाग को हिंदस (होना चाहिए था लेकिन सिंदस, लेकिन पुरानी पारसी भाषा में ‘स’ का उच्चारण नहीं था) कहा गया।
बाद में ग्रीको ने भारत को इंडिक ( जिसमें सिंध नदी इंडस हो गई और बाद में लैटिन में यही शब्द ‘इंडिका’ बना) लैटिन से अंग्रेजी में ‘इंडिया’ हो गया। दूसरी तरफ मुस्लिम आक्रांताओं ने सिंध नदी के उस पार के निवासियों को हिंदू कहा, जो आज एक राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अस्मिता का पर्याय हो गया है। यानी हिंदस से हिंद और हिंद में रहने वाले हिंदू या हिंदुस्तानी लेकिन अंग्रेजों की तरह सभी देश भारत को ‘इंडिया’ के नाम से नहीं पुकारते। उन्होंने अपनी भाषाओं के हिसाब से भारत के नाम रखे हुए हैं, जिसकी जानकारी अधिकांश भारतीयों को नहीं है। मसलन ‘इंडिया’ फ्रेंच में ‘इंदे’, स्पेनिश में ‘ला इंदिया’, जर्मन में ‘इंडियेन’, पुर्तगाली में ‘इंदिया अथवा इंदियो’, अरबी में ‘अल हिंद’, आधुनिक ग्रीक में ‘इंदोस’, कोरियाई भाषा में ‘इंदो’, चीनी में ‘यिंदू’, जापानी में ‘इंदो’ नाम से जाना जाता है। इसमें कहीं ‘भारत’ शब्द का उल्लेख नहीं है।
अब इसे बरसों की गुलामी के कारण कहें या आत्मवंचना कहें, हमने भी इंडिया अथवा इंडियन पहचान को स्वीकार कर लिया है। अब इसे बदलना बहुत मुश्किल है। वैसे देशों के मूल नाम के बजाए उन्हें उनके प्रचलित अथवा वाक् सुविधा के हिसाब से नामकरण करना कोई नई बात नहीं है। हर देश दूसरे देश को अपनी निगाह से देखता-समझता है।
जैसे कि चीन का असली नाम चीनी भाषा में ‘झोंगुओ’ है, लेकिन हम उसे चीन के नाम से ही पुकारते हैं, क्योंकि हमने यही नाम सुना और पढ़ा है। फ्रांस का पुराना नाम ‘गाल’ था, लेकिन अब वह फ्रांस ही कहलाता है। ‘म्यांमार’ हमारे लिए ब्रह्म देश था, बाद में बर्मा हुआ और अब म्यांमार। श्रीलंका को अपने पुराने नाम ‘सीलोन’ से पिंड छुड़ाने में काफी वक्त लगा। पाकिस्तान नाम इसलिए चल गया, क्योंकि भारत से धर्म के आधार जो भूखंड अलग हुआ था, उसकी अपनी कोई अलग और एकजाई पहचान नहीं थी।
लेकिन अब राजनीतिक-कारणों से ‘इंडिया बनाम भारत का एक नया संघर्ष खड़ा किया जा रहा है। आग्रह यही कि जो हम सोच रहे हैं, वही सही और सार्थक है। असल में यह संघर्ष लादी हुई और अंतनिर्हित पहचान का है। लेकिन आरोप-प्रत्यारोप के रूप में जो व्याख्याएं इंडिया और भारत की की जा रही हैं, वह अर्ध सत्य से प्रेरित ज्यादा हैं और मैं कहूंगा वही सच पर आधारित हैं। मसलन अगर I.N.D.I.A. ही भारत है तो कांग्रेस ने स्वतंत्रता की लड़ाई किसके लिए लड़ी थी? अंग्रेजो द्वारा प्रदत्त ‘इंडिया’ की पहचान को कायम रखने के लिए तो नहीं लड़ी थी। वह परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़े भारत की आत्मा की स्वतंत्र होने की पुकार थी।
PM Modi vs Rahul Gandhi
- फोटो : Amar Ujala
अगर ‘इंडिया’ धर्मनिरपेक्ष देश है तो फिर ‘भारत’ क्या है? तमाम राष्ट्रवादी अवधारणा के बाद यह सत्य कोई खारिज नहीं कर सकता कि भारत एक बहुलवादी देश है और इसी में उसकी पहचान निहित है। आक्रामकता भारत की पहचान नहीं है (हालांकि इसका खामियाजा भी हमने भुगता है)। चूंकि इंडिया को भारत से अलग नहीं किया जा सकता, इसलिए विपक्षी दलों को भारत शब्द को भी लाना पड़ा। क्योंकि केवल ‘इंडिया’ से काम नहीं चलता। भले ही ‘फील गुड’ की तरह हो।
उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया की अपनी ही परिभाषा के उलट इंडिया की नकारात्मक व्याख्या की। उन्होंने विपक्षी महाजुटान की तुलना भारत को लूटने वाली ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ से कर दी। मसलन ‘इंडियन मुजाहिदीन’ या –पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ से कर दी।
यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्षी गठजोड़ की तुलना कौवे से करते हुए कहा कि कौवा कितना भी हंस बनने की कोशिश करें, मोती नहीं चुग सकता। दूसरे अर्थ में वह मोदी को कभी भी हरा नहीं सकता। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने इंडिया को फ्यूज बल्ब कहा। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि अपने बुरे अतीत से पीछा छुड़ाने के लिए विपक्ष ‘इंडिया’ के नाम से सामने आ गया है। यानी भाजपा का कहना है कि कांग्रेस भले भारत की पार्टी हो, लेकिन उसकी मानसिकता ‘इंडिया’ वाली है।
उधर कांग्रेस और 26 दलों का विपक्षी गठबंधन इंडिया की व्याख्या अपने ढंग से कर रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मणिपुर मामले पर मोदी सरकार की नस दबाते हुए ट्वीट किया कि "आप हमें जो चाहें बुलाएं, मिस्टर मोदी. हम भारत हैं। हम मणिपुर को ठीक करने में मदद करेंगे और हर महिला और बच्चे के आंसू पोंछेंगे। हम उसके सभी लोगों के लिए प्यार और शांति वापस लाएंगे।'' इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी पीएम मोदी को जवाब दिया कि कांग्रेस पार्टी हमेशा 'मदर इंडिया' यानी 'भारत माता' के साथ रही है। अंग्रेजों के गुलाम तो भाजपा के राजनीतिक वंशज ही थे।‘
अब यह अलग बात है कि ‘भारत’ शब्द का इस्तेमाल किसी नकारात्मक उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता। उसके लिए ‘इंडिया’ की शरण में ही जाना पड़ता है। तो क्या मोदी का ‘इंडिया’ और राहुल का ‘इंडिया’ दोनों अलग अलग हैं? क्या भारत की जनता को इन्हीं दोनों के इंडिया में से किसी एक का चुनाव करना होगा?
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