असल सवाल यह है कि लोग इस बार ज्यादा वोट करने क्यों नहीं आ रहे हैं? इस सवाल एक जवाब मौसम है। भयावह गर्मी के चलते लोग मतदान केन्द्रों तक जाना टाल रहे हैं।
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क्या है भाजपा राज्यों का हाल?
दूसरे प्रमुख भाजपा शासित राज्य हैं, मध्यप्रदेश, राजस्थान और यूपी। मध्यप्रदेश में 2019 के लोकसभा चुनाव में कुल 71.20 फीसदी वोट पड़े थे, जबकि इसी राज्य में पहले चरण के मतदान का प्रतिशत 67.75 रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि कहीं भाजपा का मिशन 29 फेल तो नहीं हो रहा? या फिर राज्य में बची-खुची कांग्रेस का भी भट्टा बैठने वाला है?
पिछले लोस चुनाव में भाजपा ने मप्र की 29 में से 28 सीटें जीत ली थीं। राजस्थान में तो पिछले चुनाव में मोदी लहर एकतरफा चली थी और भाजपा सभी 25 सीटों पर काबिज हो गई थी, तब वोटिंग 66.34 फीसदी हुआ था, जबकि इस बार पहले चरण में मात्र 50.95 वोट ही पड़े हैं। इसी तरह यूपी में पिछले लोस चुनाव में 58.61 फीसदी मतदान हुआ था, जबकि इस बार पहले चरण में कुछ कम 57.61 यानी एक फीसदी कम था।
असल सवाल यह है कि लोग इस बार ज्यादा वोट करने क्यों नहीं आ रहे हैं? इस सवाल एक जवाब मौसम है। भयावह गर्मी के चलते लोग मतदान केन्द्रों तक जाना टाल रहे हैं। लेकिन इस देश में अप्रैल-मई की चिलचिलाती गर्मी में चुनाव तो 2004 से हो रहे हैं और पिछले दो लोकसभा चुनाव में मतदान का कुल प्रतिशत और भाजपा का शेयर लगातार बढ़ ही रहा है। लेकिन क्या इस बार वो उत्साह उतार पर है अथवा जो वोटर भाजपा के खिलाफ वोट देना चाहता है, वो सही विकल्प के अभाव में घर से नहीं निकलना ही बेहतर समझ रहा है? वैसे भी लोकतांत्रिक पर्व का बदलती ऋतुओं से खास लेना-देना नहीं होता। मतदाता की पहली चिंता यह होती है कि उसकी निजी जिंदगी में बहार लाने और देश में तरक्की और सौहार्द का गुलशन कौन खिला रख सकता है।
तो क्या इस चुनाव में कहीं कोई अंडर करंट नहीं है, जो मतदाता को वोट डालने पर विवश करे या फिर कोई अंतर्धारा बह रही है, जो हमे ऊपर से नजर नहीं आ रही? जो मतदाता वोट डालने जा रहे हैं, वो कर्तव्य भाव से मजबूर हैं, यथा स्थिति के वाहक हैं या फिर वर्तमान में ही आश्वस्ति के स्वर्णिम भाव से गदगद हैं?
बेशक पहले चरण में मतदात प्रतिशत के उतार चढ़ाव से पूरे चुनाव नतीजों से जोड़कर देखना जल्दबाजी होगी। लगातार तीन चार चरणों में भी मतदान का यही पैटर्न रहता है तो किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। कुछ राज्यों में तो यह चुनाव नीरसता के साए में लड़ा जा रहा है, केवल गैर भाजपा शासित राज्यों में लड़ाई कांटे की दिखती है, जहां भाजपा अपना अश्वमेध दौड़ाना चाहती है तो बाकी विपक्षी दल अपने आखिरी किलों को बचाने की जी जान से कोशिश करते दिखते हैं।
जहां तक भाजपा और प्रकारांतर से एनडुीए की बात है तो लगातार तीसरी बार एंटी इनकम्बेंसी को मात देकर सत्ता में आना कोई सामान्य बात नहीं है। यह असंतोषों के पहाड़ लांघकर एवरेस्ट पर विजय पताका लहराने जैसा है। पहले चरण के बाद संभावित नतीजों के आकलन की जल्दबाजी में सकारात्मक पक्ष यही है कि दोनो खेमों में उम्मीदों के अलाव जल रहे हैं, अंतिम चरण तक इनमे से कितने राख में और कितने हवन में बदलेंगे, यह देखने की बात है।
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