कम मतदान की खबरों ने अचानक विपक्ष की ईवीएम पर आस्था बढ़ा दी थी। लेकिन बढ़ा मतदान यह आस्था फिर घटा सकता है।
- फोटो : Istock
पक्ष और विपक्ष के बीच तनातनी
पहले दो चरणों के मतदान के अंतिम आंकड़ों से भाजपा ने कुछ राहत की सांस ली है, जबकि विपक्ष के मन में शक का कीड़ा और गहरा गया है। उसने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगाते हुए दो प्रश्न उठाए हैं। पहला यह कि दोनों चरणों के अंतिम आंकड़े जारी करने में इतनी देरी के पीछे मंशा या मजबूरी क्या है?
दूसरे, कम बताया जा रहा मतदान अचानक 6 फीसदी तक कैसे बढ़ गया? यह सचमुच आंकड़ों के संग्रहण में देरी है या कुछ और? तीसरा यह कि आयोग केवल मतदान का प्रतिशत क्यों बता रहा है, कुल मतदान के आंकड़े बताने में उसे क्या परेशानी है? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने तो आरोप लगाना शुरू भी कर दिया है कि चुनाव आयोग नतीजों में गड़बड़ी कर सकता है।
आंकड़े जारी करने में यकीनन देरी हुई है। क्योंकि पहले के चुनाव में किसी भी चरण के अंतिम आंकड़े प्राय: तीन दिन के अंदर मिल जाते थे। वैसे भी मतदान के दिन शाम तक के जो आंकड़े चुनाव आयोग जारी करता है, वो सरसरी तौर पर और अनुमानित ही होते हैं, क्योंकि मतपेटियां जमा होने का क्रम देर रात तक या दूसरे दिन सुबह तक भी चलता है। उन सभी के मतदान के वास्तविक आंकड़ों की पुष्टि कर उनको कंपाइल करने में वक्त लगता है। लेकिन उंगली आयोग की मंशा पर उठ रही है।
कांग्रेस ने कहा है कि लोकसभा चुनाव के पहले और दूसरे चरण के मतदान के अंतिम आंकड़े की जानकारी देने में देरी 'अस्वीकार्य' है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मीडिया से कहा कि हमे उम्मीद है कि चुनाव के बचे हुए चरणों में ऐसा नहीं होगा।
सीपीएम नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि ये बहुत परेशान करने वाला है। इससे नतीजों में गड़बड़ी का गंभीर शक पैदा होता है। उनका यह भी कहना था कि जब तक वोटों कुल आंकड़ा न बताया जाए तब तक प्रतिशत बताने का कोई अर्थ नहीं है।
दूसरी ओर पूर्व चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी का कहना है कि मतदान के पुष्ट चुनावी आंकड़े तब उपलब्ध होते हैं, जब वोटिंग के अंत में फॉर्म 17C जमा किया जाता है। इसी फॉर्म पर डाले गए वोटों की कुल संख्या होती है। तभी आयोग को अंतिम आंकड़े पता चलते हैं। हालांकि, कुछ विशेषज्ञो का मानना है कि अंतिम आंकड़ों में पांच छह फीसदी की घट बढ़ असामान्य नहीं है।
इसका एक अर्थ यह भी है कि यदि अंतिम आंकड़े और घटते तो विपक्ष ज्यादा मुतमइन रहता, बढ़ते आंकड़ों ने उसे बेचैन कर दिया है। हालांकि, अंतिम आंकड़े जारी करने में इतना विलंब चुनाव आयोग की कार्य क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है, क्योंकि जो काम तय सीमा में अब तक होता रहा है, वही काम ज्यादा संसाधनों और बेहतर टैक्नोलॉजी के बाद भी इतनी देरी से क्यों हो रहा है अथवा किया जा रहा है?
हालांकि, यह मानना कठिन है कि चुनाव आयोग जान बूझ कर कोई खेला कर रहा होगा, क्योंकि इस चुनाव में सबसे ज्यादा विश्वसनीयता तो उसी की दांव पर लगी है। अगर यह कोई व्यवस्थागत खामी है तो उसे अगले चरणों में दूर करने की जरूरत है।
यह बात अलग है कि अपनी कॉलर ऊंची रखने के लिए कम मतदान को सभी दल अपने अपने पक्ष में बता रहे हैं, लेकिन खुटका सभी के मन में है और खासकर भाजपा के मन में जिसने 400 पार का नारा दिया हुआ है। ऊपर से भले ही प्रधानमंत्री कम मतदान को भगवा रंग में लिपटा मानें, लेकिन अंदरखाने बीजेपी ने अपनी समूची चुनावी मशीनरी को खड़का दिया है कि किसी भी कीमत पर ज्यादा से ज्यादा वोट डलवाओ। वरना नतीजों का ऊंट दुश्मन की करवट जा बैठेगा कुलमिलाकर डर दोनों तरफ है।
हालांकि, कम मतदान की खबरों ने अचानक विपक्ष की ईवीएम पर आस्था बढ़ा दी थी। लेकिन बढ़ा मतदान यह आस्था फिर घटा सकता है। याद करें कि 2019 के लोकसभा चुनाव के समय टीडीपी नेता चंद्राबाबू नायडू विरोधी खेमे में थे और उन्होंने भी ईवीएम पर सवाल उठाए थे। लेकिन इस दफा वो खामोश हैं, बीजेपी के साथ हैं और सत्ता में वापसी की आस लगाए हुए हैं। उन्हें ईवीएम में कहीं कोई खोट नजर नहीं आ रहा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।