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EVM: ईवीएम की अंतिम बार हो अग्निपरीक्षा, फिर कोई सवाल उठाए तो सख्ती से निपटा जाए

सार

एक तरह से यह मान लिया गया कि ईवीएम पर सभी दलों का विश्वास पुनः लौट आया है, लेकिन अब दो घटनाओं ने एक बार फिर ईवीएम के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारतीय राजनीतिक दल ईवीएम को लेकर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, जबकि भारत में ईवीएम का प्रयोग होते हुए करीब 42 साल हो चुके हैं।
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ईवीएम पर फिर शुरू हुए आरोप-प्रत्यारोप। - फोटो : ANI
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विस्तार
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बीती 4 जून को लोकसभा चुनाव में पड़े वोटों की गिनती से ठीक पहले तक विपक्ष इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर बेहद आक्रामक और हमलावर रहा। हालांकि, 4 जून को जैसे-जैसे चुनाव के नतीजे आते गए, वैसे-वैसे ईवीएम का जिक्र पीछे छूटता चला गया। दरअसल, लोकसभा चुनाव में इस बार किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। सत्तारूढ़ रही भारतीय जनता पार्टी बहुमत से थोड़ा पीछे रह गई, जबकि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस समेत अधिकांश विपक्षी पार्टियां वर्ष 2014 और 2019 से अच्छा प्रदर्शन कर लोकसभा पहुंचीं।

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एक तरह से यह मान लिया गया कि ईवीएम पर सभी दलों का विश्वास पुनः लौट आया है, लेकिन अब दो घटनाओं ने एक बार फिर ईवीएम के जिन्न को बोतल से बाहर निकाल दिया है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि भारतीय राजनीतिक दल ईवीएम को लेकर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं, जबकि भारत में ईवीएम का प्रयोग होते हुए करीब 42 साल हो चुके हैं। आज सभी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में ईवीएम इस्तेमाल हो रही है। 

पहली घटना मुंबई नार्थ वेस्ट लोकसभा सीट को लेकर सामने आई। अब एक स्थानीय अखबार ने खबर छापी कि ईवीएम को मोबाइल से जोड़कर ओटीपी द्वारा अनलॉक किया गया। इस सीट पर जीत केवल 48 वोटों से हुई है। चुनाव आयोग ने भ्रामक खबर छापने के लिए न केवल संबंधित अखबार को नोटिस जारी किया है, बल्कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कर यह स्पष्ट किया कि ईवीएम को मोबाइल या किसी अन्य डिवाइस से जोड़ा नहीं जाता है। यह एक स्वतंत्र ईकाई होती है। साफ है, चुनाव आयोग ने तो अपनी बात कह दी, लेकिन इस खबर को विपक्ष नेताओं ने हाथों-हाथ लिया। एक बार पुनः ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए। वही पुरानी बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग दोहरा दी।
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दूसरी घटना विदेश से ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठने वाली आई। बड़े बिजनेस टाइकून एलन मस्क ने यह कहकर सनसनी फैली दी कि ईवीएम को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि इसको इंसानों या एआई द्वारा हैक किया जा सकता है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह उन्होंने भारत के संदर्भ में कहा या अमेरिका को लेकर। एलन मस्क के कथन का खंडन पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने तत्काल कर दिया। उन्होंने जवाब दिया कि यह विचार अमेरिका पर लागू हो सकता है, जहां इंटरनेट से जुड़ी ईवीएम बनाने के लिए कंप्यूटर प्लेटफॉर्म प्रयोग होता है।

भारत में ईवीएम नेटवर्क बिल्कुल अलग है। यह किसी कनेक्टिविटी, ब्लूटूथ या वाई-फाई से जुड़ी नहीं होती है। हमारे यहां ईवीएम हैकिंग संभव नहीं है। वैसे, ईवीएम पर सवाल उठाना कोई नई बात नहीं है। पूर्व उप प्रधानमंत्री और भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी भी ईवीएम को बंद करने की वकालत कर चुके हैं। दरअसल, जो पार्टी विपक्ष में होती है, वो ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है। 

अब ईवीएम के भारतीय संस्करण की बात कर लेते हैं। भारत में सबसे पहले ईवीएम को केरल में वर्ष 1982 में एक उप चुनाव के दौरान प्रयोग में लिया गया था। उस समय कुछ ही पोलिंग बूथों पर ईवीएम को रखा गया। हालांकि, तब सुप्रीम कोर्ट ने ईवीएम के प्रयोग पर यह कहते हुए रोक लगा दी थी कि इसके इस्तेमाल को लेकर किसी कानूनी प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया, यानी कोई वैधानिक दर्जा ईवीएम को नहीं मिला है।

वर्ष 1988 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संविधान में एक संशोधन कर ईवीएम के प्रयोग को हरी झंडी दी। कमाल की बात है कि आज ईवीएम को लेकर कांग्रेस पार्टी सबसे अधिक मुखर है। वर्ष 2004 में पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल लोकसभा चुनाव में हुआ, तब 10 लाख से ज्यादा ईवीएम को प्रयोग में लिया गया था।

सवाल उठता है कि जब भारत में ईवीएम का इतने व्यापक स्तर पर इस्तेमाल हो सकता है तो अमेरिका, नीदरलैंड, आयरलैंड, जर्मनी जैसे विकसित देशों में ईवीएम क्यों बंद कर दिया गया? दरअसल, भारत के उल्ट अमेरिका, आयरलैंड, नीदरलैंड, जर्मनी आदि में स्वतंत्र ईकाई न होकर ईवीएम एक प्रत्यक्ष रिकॉर्डिंग मशीन थी। फिर वहां की सरकार ने ईवीएम को कोई कानून मान्यता भी नहीं दी है।

भारत की परिस्थितियों बिल्कुल अलग हैं। भारत में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। अभी हालिया लोकसभा चुनावों में 60 करोड़ से अधिक लोगों ने ईवीएम से ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया। पूरी चुनावी प्रक्रिया बेहद पारदर्शी है। न तो वोट डालते समय, न वोटों की गणना के समय किसी तरह की कोई परेशानी सामने आई, जबकि बैलेट पेपर से चुनाव कराना न केवल बेहद खर्चीला होता था, बल्कि चुनाव प्रक्रिया बेहद लंबी भी होती थी।

चुनाव प्रक्रिया पर बार-बार सवाल उठाना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। सभी राजनीतिक पार्टियों को चुनाव आयोग के साथ बैठकर इस मुद्दे को एक्सपर्ट्स के नजरिए से समझना चाहिए। कुछ पार्टियों में तकनीकी जानकारी रखने वाले नेता भी हैं। उन्हें आगे आना चाहिए। फिर चुनाव आयोग समय-समय पर ईवीएम को हैक करने के लिए कार्यक्रम आयोजित करता है, लेकिन आज तक कोई भी ईवीएम को हैक करने नहीं पहुंचा है।

चुनाव आयोग को चाहिए कि वो एक बार फिर ईवीएम हैकिंग की प्रतियोगिता आयोजित करे और देश-विदेश से हैकर्स को ओपन चैलेंज दे। इस बार जो भी नतीजा निकले, उसे सर्वमान्य माना जाए। इसके बाद जो राजनीतिक दल या नेता ईवीएम को लेकर सवाल उठाए और यदि वो अपने आरोपों को सिद्ध नहीं कर पाए तो इनसे चुनाव आयोग सख्ती से निपटे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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