एनआइडीएम की सिफारिशें गयीं रद्दी में
केदारनाथ आपदा के कारणों का पता लगाने के लिये राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआइडीएम) की टीमों ने स्वयं दो बार आपदाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करने के साथ ही रिमोट सेंसिंग, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियॉलाजी, राज्य आपदा न्यूनीकरण केन्द्र और भूगर्व सर्वेक्षण विभाग जैसी विभिन्न विशेषज्ञ ऐजेंसियों के सहयोग से तीन खण्डों में अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। जिसमें केदारनाथ आपदा से सबक लेने के लिये 19 सिफारिशें और चेतावनियां दीं गयीं थीं। इनमें भी जलविद्युत परियोजनाओं को ज्यादा फोकस कर कहा गया था कि जलविद्युत परियोजनाओं से सदैव पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ ही स्थानीय समुदाय को त्वरित बाढ़, जमीन धंसने, जल श्रोत सूखने और जनजीवन प्रभावित होने के साथ ही वन्य जीवन और पर्यावरण दूषित होने की शिकायतें भी रही हैं।
बिजली परियोजनाओं से खतरे की अनदेखी
रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं के लिये पर्यावरण प्रभाव आंकलन बाध्यकारी होना चाहिए। इन परियोजनाओं की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) में सुरंगों तथा अन्य क्षेत्रों से पहाड़ काट कर निकले मलबे के निस्तारण का भी स्पष्ट प्लान होना चाहिए। जिसमें मलबा निस्तारण के उचित स्थान और मलबे को निस्तारण स्थल तक पहुंचाने का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये तथा डम्पिंग जोन को नदी क्षेत्र से काफी दूर होना चाहिए। इसमें डम्पिंग स्थल पर सुरक्षा दीवार जरूरी बताई थी ताकि बरसात में मलबा न बह सके? क्योंकि इस मलबे से नदी में त्वरित बाढ़ आने के साथ ही नदी की दिशा भटक जाती है जो कि भूस्खनों को भी जन्म देती हैं। रिपोर्ट में कहा गया था कि केदारनाथ की बाढ़ में श्रीनगर में 330 मेगावाट की परियोजना और चमोली जिले में 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजनाओं के मलबे ने बाढ़ की विभीषिका को कई गुना बढ़ाया है।
भूस्खलन जोनिंग मैप की अनदेखी
इसरो द्वारा गत वर्ष जारी देश के 147 संवेदनशील जिलों के भूस्खलन मानचित्र में उत्तराखण्ड का रुद्रप्रयाग जिला संवेदनशीलता कह दृष्टि से एक नम्बर पर तथा टिहरी दूसरे नम्बर पर दिखाया गया है। प्रदेश के सभी 13 जिले संवेदनशील बताये गये हैं। लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। एनआइडीएम की रिपोर्ट में भूस्खलन जोनेशन मैपिंग का प्राथमिकता के आधार पर पालन, निर्माण कार्यों में विस्फोटों के प्रयोग पर रोक, सड़क निर्माण में वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर, ढलानों के स्थिरीकरण के ठोस प्रयास और ग्लेशियल लेक तथा नदी प्रवाह निगरानी का ठोस ढांचा तैयार करने की सिफारिश भी की गयी थी। अगर इन सिफारिशों पर ध्यान दिया जाता तो पहाड़ इस तरह नहीं काटे जाते और केदारनाथ जैसे संवेदनशील स्थान पर सीमेंट कंकरीट का इतना बड़ा ढांचा भी खड़ा नहीे किया जाता और अब ना ही एवलांच संभावित बदरीनाथ धाम की हजामत की तैयारी न होती।
हिमालयी आपदाओं में 4 गुना वृद्धि
पर्यावरण सम्बन्धी अनुसंधानों में संलग्न संस्था ‘काउंसिल ऑन इनर्जी, इनवायर्नमेंट एण्ड वाटर’ (सीईईडब्लु) द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में 1970 की अलकनन्दा बाढ़ के बाद त्वरित बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने, हिमनद झीलों के फटने और बिजली गिरने आदि आपदाओं में चार गुना वृद्धि हो गयी है। इन आपदाओं के खतरे में राज्य के 85 प्रतिशत जिलों की 90 लाख से अधिक आबादी आ गयी है। रिपोर्ट में इन आपदाओं का कारण पर्यावरण की उपेक्षा बताया गया है।
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