फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

नरेन्द्र मोदी की आंधी में देश विपक्षहीन या विकल्पहीन?

Thu, 23 May 2019 03:44 PM IST
रत्नेश मिश्र रत्नेश मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
Modi Vs Rahul
विज्ञापन
सत्ता पक्ष यदि विपक्षहीन है तो उसे एकतंत्रीय शासन कहते हैं और अगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ऐसा हो रहा हो तो समझने वाली बात यह है कि ज़म्हूरियत किस तरह अपना नायक तैयार कर रही है। जवाब साफ है कि नरेन्द्र मोदी और उनकी राष्ट्रवादी विवेचना से देश की जनता बड़े पैमाने पर जुड़ रही है और उन्हें एक ऐसे महानायक के रूप में मान्यता दे रही है कि इतिहास समय की सीमाओं को लांघकर अपने आप को गढ़ रहा है। लोकशाही विपक्षहीन होने के कगार पर है और ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है बल्कि दूसरी बार हो रहा है। और जो विपक्ष बचा-खुचा है वो भी हांफ रहा है।
विज्ञापन


लोकतंत्र में विपक्ष की एक भूमिका होती है, संघर्ष के मुद्दे होते हैं और वह सड़क से लेकर संसद तक में सरकार को घेरने का काम करती है जिससे देश का लोकतंत्र संतुलित रहता है, सरकार अंकुश में रहती है। लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में देश की जनता ने ऐतिहासिक रूप से राष्ट्रनायक के रूप में नरेन्द्र मोदी को चुना और विपक्ष को नकार दिया। 

नरेन्द्र मोदी 2014 में जब गुजरात निकलकर देश की राजनीति में प्रवेश कर रहे थे तब किसी ने ऐसा सोचा भी नहीं होगा कि वो एक दिन देश को लगभग विपक्षहीन कर देंगे। राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस ही प्रमुख विपक्षी दल के रूप में सामने होती लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे 44 सीटें ही मिलीं जो एक स्वतंत्र दल के रूप में विपक्ष होने की योग्यता से बहुत दूर रही। 2019 में भी जो रुझान सामने आ रहे हैं उससे यह लग रहा है इस बार मोदी लहर ही नहीं मोदी सुनामी है और संसद अगर विपक्षहीन न हुई तो भी बहुत कमजोर विपक्ष के साथ अगले पांच साल तक यात्रा करेगी।  

1971 में इंदिरा गांधी और 1984 में राजीव गांधी बड़े बहुमत से चुनाव जीत कर आए थे, लेकिन उन्हें जल्दी ही उठापटक का सामना करना पड़ा और अगले चुनाव में उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। 

लोकतंत्र में ऐसा बहुत कम ही हुआ होगा। लेकिन अब जब 70 साल से अधिक उम्र का भारतीय लोकतंत्र होने जा रहा है और देश में सबसे अधिक राज करने वाली बड़ी पार्टी कांग्रेस के सामने भाजपा के रूप में एक ऐसा विपक्ष खड़ा हुआ और भाजपा में भी नरेन्द्र मोदी जैसा नायक उभरकर सामने आया जिसने दूसरी बार देश को विपक्षहीन कर दिया। 

राष्ट्रीय फलक पर नरेन्द्र मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की दहाड़ के साथ उभरे थे। और उन्होंने ऐसा किया भी, देश की जनता ने नरेन्द्र मोदी के बरक्स कांग्रेस को नकार दिया। कांग्रेस अपना अस्तित्व बचाने में लगी है। सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ ?  

 भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में देश की सबसे बड़ी पार्टी और सबसे अधिक राज करने वाली कांग्रेस इतनी कमजोर कैसे हो गई कि विपक्षहीन भारत जैसे वाक्य जनता के बीच उछाले जा रहे हैं। 
विज्ञापन

जवाब साफ है कि कांग्रेस को देश के धर्मनिरपेक्ष रूप का प्रतीक माना जाता रहा है। और कहने में संकोच नहीं कि देश की आबादी का एक बड़ धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करती रही है और कांग्रेस को समर्थन देती रही है। लेकिन कांग्रेस खुद को धर्मनिरपेक्ष रखने में नाकाम रही। कभी गरम हिंदुत्व कभी नरम हिंदुत्व के सहारे वह अपने धर्मनिरपेक्ष छवि को दागदार बनाती रही। 

यही वजह रही कि धीरे धीरे वह लोगों में अपना विश्वास खोती गई जबकि नरेन्द्र मोदी अपनी हिंदुत्व की पहचान के साथ अडिग रहे और साथ ही विकास पुरुष की उनकी छवि धीरे-धीरे इतना मजबूत होती गई कि आज न विपक्ष बचा और न ही विकल्प बचा। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें