करुष्ण देश का एक राजा हुआ। नाम था पौंड्रक। उसके चाटुकार मंत्रियों ने पौंड्रक को यह विश्वास दिला दिया कि वही भगवान विष्णु का असली अवतार कृष्ण है। मंत्रियों के झांसे आया पौंड्रक स्वयं को सचमुच वासुदेव कृष्ण समझने लगा। उसने श्रीकृष्ण जैसा वेश भी धारण कर बना लिया।
पौंड्रक ने सबसे पहले अपने शरीर पर नीला रंग करवाया। फिर उसने शंख और चक्र के साथ लकड़ी के दो अतिरिक्त हाथ बनवाए और उन्हें अपने कंधों पर बांधकर चतुर्भुज बन बैठा। उसने एक लाल मणि को कौस्तुभ नाम दिया और उसे भी गले में लटका लिया। फिर मुकुट में एक मोर पंख फंसाया और एक गदा एवं एक पद्म हाथ में लेकर घूमने लगा।
उसने लाेहे का एक पैर बनवाकर उसका चिह्न अपने वक्ष पर छपवा लिया क्योंकि वैसा ही एक पदचिह्न भगवान विष्णु के वक्ष पर बना है। हालांकि विष्णु के वक्ष पर बना पदचिह्न, वास्तव में महर्षि भृगु के पैर का निशान है जिसे श्रीवत्स भी कहते हैं। इस चिह्न को अंकित कराने में पौंड्रक को पीड़ा तो बहुत हुई किंतु कृष्ण की नकल करने के लिए उसे यह भी स्वीकार था। इस तरह पौंड्रक ने श्रीकृष्ण की तरह नकली अस्त्र-शस्त्र एवं वस्त्राभूषण धारण कर लिए।
उसने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया तथा राज्य में अन्य देवी-देवताओं की पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया। फिर भी द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण का यश कम नहीं हुआ। तब पौंड्रक के मंत्रियों ने उससे कहा कि यदि वासुदेव कृष्ण से आगे निकलना है, तो उन्हें युद्ध में पराजित करना होगा।
धूर्त मंत्रियों के चंगुल में फंसे मूर्ख पौंड्रक ने श्रीकृष्ण के पास संदेश भेजा:
‘वासुदेव! मैं भगवान विष्णु का अवतार हूं और मैं ही असल में नारायण का रूप हूं। मैंने संसार को अधर्म से मुक्त कराने के लिए अवतार लिया है। मुझे पता लगा है कि तुम मेरा नाम और मेरे चिह्न जैसे श्रीवत्स, कौस्तुभ, सुदर्शन चक्र, मोरपंख आदि पाञ्जन्य शंख, कौमुदकी गदा तथा पद्म आदि का प्रयोग करते हो। मैं तुम्हें चेतावनी दे रहा हूं कि तुम तत्काल मेरे नाम का दुरुपयोग करना छोड़कर समर्पण कर दो, अन्यथा मुझसे युद्ध करो!’
पौंड्रक का संदेश सुनकर कृष्ण मुसकराए। उन्होंने दूत से कहा कि वह पौंड्रक की इच्छा अवश्य पूर्ण करेंगे। कुछ ही दिन में कृष्ण, सेना लेकर पौंड्रक से युद्ध करने पहुंच गए। कृष्ण के आगमन का समाचार सुनते ही, पौंड्रक तुरंत अपने नकली अस्त्र-शस्त्र धारण करके कृष्ण से युद्ध करने आ गया। पौंड्रक को देखकर यादव सेना ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी। कृष्ण ने पौंड्रक को देखा तो वे भी अपनी हंसी नहीं रोक पाए।
कृष्ण को देखकर पौंड्रक चिल्लाया, ‘रुक जाओ, ढोंगी कृष्ण! मुझे ध्यान से देखो। मुझे देखकर समझ गए होगे कि मैं ही विष्णु का अवतार और असली वासुदेव हूं। मैं अंतिम बार सावधान कर रहा हूं कि अब भी समय है, मेरे सामने समर्पण कर दो तो मैं तुम्हें क्षमा कर सकता हूं अन्यथा आज तुम यहां से जीवित वापस नहीं जाओगे।’
पौंड्रक की बात सुनकर कृष्ण भोला-सा चेहरा बनाकर बोले, ‘हां महाराज, आपकी बात सत्य है और आपका दावा भी सच्चा है। मैं स्वयं को वासुदेव केवल इसलिए कहता हूं क्योंकि मैं वसुदेव जी का पुत्र हूं। परंतु मुझे भगवान विष्णु का असली अवतार आप ही लग रहे हैं।‘
पौंड्रक को लगा कि कृष्ण उसके झांसे में आ गए। वह घमंड में बोला, ‘मैं जानता हूं कि मैं ही असली वासुदेव हूं। इसलिए तुम तत्काल अपने अस्त्र शस्त्र मुझे सौंप दो। अपनी पराजय स्वीकार कर लो।‘
कृष्ण हंसकर बोले, ‘मैं अपने अस्त्र-शस्त्र सौंप सकता हूं किंतु मुझे नहीं लगता कि आप इनका बोझ उठा पाएंगे!” ‘चुप रहो, मूर्ख!’ पौंड्रक चिल्लाया। ‘अपने अस्त्र-शस्त्र मुझे दे दो अन्यथा युद्ध करो क्योंकि अब हम दोनों इस लोक में नहीं रह सकते। तुम्हें मारकर मैं धरती पर धर्म की स्थापना करूंगा।’
यह सुनकर भगवान कृष्ण ने कहा, ‘पौंड्रक, यदि मेरे अस्त्र-शस्त्र लेकर तुम्हें प्रसन्नता होती है तो यही सही! लो, पहले मेरा यह चक्र संभालो!’ और इतना कहते ही, श्रीकृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र पौंड्रक पर छोड़ दिया। अगले ही क्षण सुदर्शन चक्र ने नकली वासुदेव यानी पौंड्रक का सिर धड़ से अलग कर दिया।
भगवान कृष्ण के विषय में प्रसिद्ध है कि जिसने उन्हें जिस रूप में पूजा, उसी रूप में उन्हें पाया। पौंड्रक को श्रीकृष्ण का बाह्य रूप पसंद था इसलिए कृष्ण का वही बाहरी रूप पौंड्रक की मुक्ति का साधन बना।