डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने शौचालय की सुविधा आमजन को उपलब्ध कराई
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ऐतिहासिक कदमों के साथ बदलते रहे समाज
वर्ष 1968 में उन्होंने डिस्पोजल कम्पोस्ट शौचालय बनाया, जिसे कम खर्च में घर के आसपास मिलने वाली सामाग्री से बनाया जा सकता था। वर्ष 1970 में सुलभ इंटरनेशनल सर्विस आर्गेनाइजेशन की नींव पड़ी। वर्ष 1973 में डॉ. बिंदेश्वर पाठक के अभियान में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब बिहार की आरा नगर पालिका के एक अधिकारी ने उन्हें 500 रुपए देकर पालिका परिसर में दो शौचालय बनाने के लिए कहा जहां शुष्क शौचालय को डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने सुलभ शौचालय में परिवर्तित किया और उस काम के लिए उनकी खूब सराहना हुई।
इधर, धीरे-धीरे उनका यह अभियान तेजी से आगे बढ़ता गया और बिहार में एक के बाद एक कई शौचालयों का उन्होंने निर्माण कराए। वर्ष 1980 में प्रतिदिन 25,000 लोग केवल पटना में सुलभ शौचालय की सेवाओं का उपयोग करने लगे थे।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक केवल सुलभ शौचालय नहीं बना रहे थे, बल्कि वह छुआछूत की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम की ओर बढ़ रहे थे। वर्ष 1988 में मैला ढोने वाले कुछ लोगों को वो नाथद्वारा मंदिर ले गए और वहां पर उनसे पूजा-पाठ कराया। हालांकि लोगों ने विरोध किया, लेकिन डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने पुजारियों को समझाया और पूजा संपन्न हुई। यह एक ऐतिहासिक कदम था, जिसको देशभर में सराहा गया।
आज डॉ. बिंदेश्वर पाठक की सुलभ संस्था देश में 10,123 से अधिक सार्वजनिक शौचालय, 15.91 लाख से अधिक घरों में शौचालय, 32,541 से अधिक स्कूलों में शौचालय, 2454 मलिन बस्तियों में शौचालय, 200 से अधिक बॉयोगैस प्लांट, 12 से अधिक आदर्श गांव बना चुकी है। वो 10 हजार से अधिक लोगों को मैला ढोने की कुप्रथा से बाहर ला चुके हैं।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने न केवल शौचालय की सुविधा आमजन को उपलब्ध कराई, बल्कि मैला ढोने, छुआछूत जैसी कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में सराहनीय कार्य किए।
वर्ष 2012 में वृंदावन की विधवाओं के लिए सुलभ शौचालय बनवाया और उनकी आजीविका की व्यवस्था की। उन्हें पढ़ना-लिखना सीखाने के अलावा मोमबत्ती आदि बनाने से कार्य की ट्रेनिंग दी। उन्हें 2000 रुपए प्रतिमाह देना शुरू किया। डॉ. बिंदेश्वर पाठक पिछले कुछ सालों से वृंदावन की विधवाओं के साथ होली मनाते आ रहे थे।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक के प्रयासों के चलते ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने 19 नवंबर 2013 को वर्ल्ड टॉयलेट डे के रूप में मान्यता दी। डॉ. पाठक को पद्म भूषण, प्रतिष्ठित गांधी शांति पुरस्कार समेत देश-विदेश में कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
आज भले सरकार खुले में शौच, शुष्क शौचालयों और मैला ढोने की कुप्रथा की समाप्ति का दावा करती है, लेकिन समाज के लिए जो उल्लेखनीय कार्य डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने किए, वो स्वर्ण अक्षरों में अंकित होंगे।
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