फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

डॉ. बिंदेश्वर पाठक स्मृति शेष: शौचालय क्रांति से समाज और देश में ऐतिहासिक बदलाव लाने वाला योद्धा

सार

आज डॉ. बिंदेश्वर पाठक की सुलभ संस्था देश में 10,123 से अधिक सार्वजनिक शौचालय, 15.91 लाख से अधिक घरों में शौचालय, 32,541 से अधिक स्कूलों में शौचालय, 2454 मलिन बस्तियों में शौचालय, 200 से अधिक बॉयोगैस प्लांट, 12 से अधिक आदर्श गांव बना चुकी है। वो 10 हजार से अधिक लोगों को मैला ढोने की कुप्रथा से बाहर ला चुके हैं।
विज्ञापन
सामाजिक कार्यकर्ता बिंदेश्वर पाठक और सुलभ इंटरनेशनल - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में लालकिले की प्राचीर से स्वच्छ भारत अभियान का एलान किया था और हर घर शौचालय बनाने का संकल्प लिया था, ताकि खुले में शौच को रोका जा सके। हालांकि, स्वतंत्र भारत में खुले में शौच और शौचालय को लेकर चिंतित होने वाले प्रधानमंत्री मोदी पहले व्यक्ति नहीं थे। सुलभ शौचालय के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने वर्ष 1970 में ही इस बात को महसूस किया था कि शुष्क शौचालयों और सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को समाप्त किया जाए। उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर सुलभ शौचालय बनाने की शुरुआत की।

बिंदेश्वर पाठक का योगदान 

आज देश में हजारों सुलभ शौचालय हैं, जिनमें 2 करोड़ से अधिक लोग प्रतिदिन शौच, स्नान जैसी जरूरतों को पूरा करते हैं। शुष्क शौचालय को समाप्त करने की दिशा में देश में नई क्रांति लाने वाले डॉ. बिंदेश्वर पाठक अब हमारे बीच नहीं हैं। जब देश स्वतंत्रता की 77वीं वर्षगांठ बना रहा था, तब 80 वर्षीय शौचालय क्रांति के अग्रदूत ने दुनिया को अलविदा कह दिया। 

विज्ञापन

 

वर्ष 1943 में जन्मे डॉ. बिंदेश्वर पाठक बिहार के वैशाली जिले के गांव रामपुर बघेल के निवासी थे। उनके पिता आयुर्वेदाचार्य और दादा ज्योतिषी थे। डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो अपनी मां योगमाया देवी के ज्यादा करीब थे। उनकी मां ने ही उन्हें दूसरों की मदद करने की शिक्षा दी। उनकी मां कहा करती थीं कि कोई व्यक्ति यदि मदद के लिए आए तो उसे वापस नहीं भेजना चाहिए। व्यक्ति खुद के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की मदद के लिए पैदा होता है। यही बात बालक बिंदेश्वर ने गांठ बांध ली थी और उसे जीवन भर निभाया।


डॉ. बिंदेश्वर पाठक की प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई। फिर वो बिहार की राजधानी पटना चले गए, जहां से उन्होंने बी.एन. कॉलेज से समाजशास्त्र में स्नातक किया। स्नातक की डिग्री लेने के बाद वो शिक्षक बन गए। हालांकि, कुछ ही दिनों में वो पटना में गांधी शताब्दी समारोह समिति के भंगी-मुक्ति प्रकोष्ठ में बतौर स्वयंसेवक जुड़ गए। वैसे, यह उनका लक्ष्य नहीं था।

विज्ञापन


इधर वे मध्यप्रदेश में सागर यूनिवर्सिटी से क्रिमिनोलॉजी में मास्टर डिग्री करना चाहते थे, लेकिन गांधी शताब्दी समारोह समिति के दो लोगों के कहने पर वो पटना में रुकने के लिए राजी हो गए, क्योंकि यहां उन्हें अच्छे वेतन का आश्वासन दिया गया था। इस बीच, सागर यूनिवर्सिटी में दाखिले की तारीख निकल गई और डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने समिति में बने रहने का निर्णय किया। 

समिति के जनरल सेक्रेटरी सरयू प्रसाद ने डॉ. बिंदेश्वर पाठक को मानवाधिकारों और छुआछूत पर काम करने के लिए बिहार के बेतिया जिले में भेजा। एक साक्षात्कार में डॉ. पाठक ने बताया था कि बेतिया में कार्य करने के दौरान एक वाक्या ऐसा हुआ, जिसने उनके मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी।
 

एक दिन बाजार में एक सांड ने एक बच्चे पर हमला कर दिया। वहां मौजूद लोग और वो कुछ साथियों के साथ बच्चे को बचाने दौड़े, तभी किसी ने कह दिया कि यह मैला ढोहने वालों का बच्चा है। फिर क्या था, लोग पीछे हट गए। उन्होंने बच्चे को अस्पताल पहुंचाया। महात्मा गांधी से बेहद प्रभावित डॉ. बिंदेश्वर ने छुआछूत और मैला ढोहने की कुप्रथा के खिलाफ कार्य करने की ठानी।

विज्ञापन

डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने शौचालय की सुविधा आमजन को उपलब्ध कराई - फोटो : instagram

ऐतिहासिक कदमों के साथ बदलते रहे समाज 

वर्ष 1968 में उन्होंने डिस्पोजल कम्पोस्ट शौचालय बनाया, जिसे कम खर्च में घर के आसपास मिलने वाली सामाग्री से बनाया जा सकता था। वर्ष 1970 में सुलभ इंटरनेशनल सर्विस आर्गेनाइजेशन की नींव पड़ी। वर्ष 1973 में डॉ. बिंदेश्वर पाठक के अभियान में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब बिहार की आरा नगर पालिका के एक अधिकारी ने उन्हें 500 रुपए देकर पालिका परिसर में दो शौचालय बनाने के लिए कहा जहां शुष्क शौचालय को डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने सुलभ शौचालय में परिवर्तित किया और उस काम के लिए उनकी खूब सराहना हुई।

इधर, धीरे-धीरे उनका यह अभियान तेजी से आगे बढ़ता गया और बिहार में एक के बाद एक कई शौचालयों का उन्होंने निर्माण कराए। वर्ष 1980 में प्रतिदिन 25,000 लोग केवल पटना में सुलभ शौचालय की सेवाओं का उपयोग करने लगे थे।

डॉ. बिंदेश्वर पाठक केवल सुलभ शौचालय नहीं बना रहे थे, बल्कि वह छुआछूत की दिशा में भी एक क्रांतिकारी कदम की ओर बढ़ रहे थे। वर्ष 1988 में मैला ढोने वाले कुछ लोगों को वो नाथद्वारा मंदिर ले गए और वहां पर उनसे पूजा-पाठ कराया। हालांकि लोगों ने विरोध किया, लेकिन डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने पुजारियों को समझाया और पूजा संपन्न हुई। यह एक ऐतिहासिक कदम था, जिसको देशभर में सराहा गया।
 
आज डॉ. बिंदेश्वर पाठक की सुलभ संस्था देश में 10,123 से अधिक सार्वजनिक शौचालय, 15.91 लाख से अधिक घरों में शौचालय, 32,541 से अधिक स्कूलों में शौचालय, 2454 मलिन बस्तियों में शौचालय, 200 से अधिक बॉयोगैस प्लांट, 12 से अधिक आदर्श गांव बना चुकी है। वो 10 हजार से अधिक लोगों को मैला ढोने की कुप्रथा से बाहर ला चुके हैं।

डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने न केवल शौचालय की सुविधा आमजन को उपलब्ध कराई, बल्कि मैला ढोने, छुआछूत जैसी कुप्रथा को समाप्त करने की दिशा में सराहनीय कार्य किए।

वर्ष 2012 में वृंदावन की विधवाओं के लिए सुलभ शौचालय बनवाया और उनकी आजीविका की व्यवस्था की। उन्हें पढ़ना-लिखना सीखाने के अलावा मोमबत्ती आदि बनाने से कार्य की ट्रेनिंग दी। उन्हें 2000 रुपए प्रतिमाह देना शुरू किया। डॉ. बिंदेश्वर पाठक पिछले कुछ सालों से वृंदावन की विधवाओं के साथ होली मनाते आ रहे थे।  

डॉ. बिंदेश्वर पाठक के प्रयासों के चलते ही संयुक्त राष्ट्र संघ ने 19 नवंबर 2013 को वर्ल्ड टॉयलेट डे के रूप में मान्यता दी। डॉ. पाठक को पद्म भूषण, प्रतिष्ठित गांधी शांति पुरस्कार समेत देश-विदेश में कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

आज भले सरकार खुले में शौच, शुष्क शौचालयों और मैला ढोने की कुप्रथा की समाप्ति का दावा करती है, लेकिन समाज के लिए जो उल्लेखनीय कार्य डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने किए, वो स्वर्ण अक्षरों में अंकित होंगे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें