आवारा" से राजकपूर की लोकप्रियता पूर्व सोवियत संघ में बढ़ गई थी-
- फोटो : अमर उजाला
ऑनलाइन चर्चा और अब्बास की फिल्में
“अनहोनी” की बात करते हुए अंजुम रजबअली ने बताया कि नर्गिस की ख्वाहिश थी कि जिस तरह “आवारा” में राजकपूर अभिनीत पुरुष पात्र का विरासत और माहौल के अनुसार उसका चरित्र परिवर्तन होता है उसी तरह महिला पात्र के जरिये मेरे चरित्र में भी लाइए। आप मुझे ऐसा किरदार दीजिए। मुझे यह थीम बहुत पसंद आई। इसी को ध्यान में रखते ही अब्बास साहब ने महिला पात्र की प्रधानता वाली फिल्म "अनहोनी" का निर्माण किया जिसमें नरगिस ने दोहरी भूमिका निभाई है।
मौलाना आजाद विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति और अब्बास साहब की भतीजी डॉ. सईदा हमीद ने कहा कि "आवारा" से राजकपूर की लोकप्रियता पूर्व सोवियत संघ में इतनी बढ़ गई थी कि वहाँ हर युवा के होठों पर "आवारा" फिल्म के गाने होते थे। यहाँ तक की सन 1955 में सोवियत संघ में राजकपूर जवाहरलाल नेहरू जितने ही लोकप्रिय थे।
कार्यक्रम में विशेष उपस्थिति रही डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता मेघनाथ (रांची) की जिन्होंने अब्बास साहब का एक विशेष संस्मरण साझा करते हुए बताया कि सन 1978 में अब्बास कलकत्ता के एक अस्पताल में आए और उन्हें जानकारी मिली कि इस अस्पताल के निर्माण के लिए छात्रों ने रक्तदान कर करीब तीन लाख रुपया एकत्र किया और इस तरह कलकत्ता स्थित बारह बेड का यह चिकित्सालय बनाया गया तो वे इससे काफ़ी प्रभावित हुए और चाय-मूढ़ी खाते हुए उन्होंने पूछा कि "क्या इस बात का किसी अख़बार में जिक्र हुआ था?"
तब हमने बताया कि एक-दो स्थानीय अख़बार के तीसरे-चौथे पेज के छोटे से कॉलम में न्यूज़ आई थी। तब वापस जाकर उन्होंने अपने ‘ब्लिट्ज’ के अंतिम पृष्ठ पर इस अस्पताल के बनने की घटना के साथ लिखा था, “आई फील अशेम्ड टू कॉल मायसेल्फ जर्नलिस्ट!” वे जानते थे कि सेंसेशनल जर्नलिज्म और रियल जर्नलिज्म क्या होता है।
ख्वाजा अहमद अब्बास का भारतीय सिनेमा में योगदान
- फोटो : अमर उजाला
इप्टा की पहल पर ऑनलाइन कार्यक्रमों की 5 श्रृंखला
इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने कहा कि अब्बास साहब ने गंभीर विषयों से लेकर मनोरंजक फार्मूलों तक से फ़िल्में बनाईं। उन्हें जानने और उनकी मानसिकता को समझने के लिए अब्बास साहब के विपुल कार्यों पर शोध अभी बाकी है।
विनीत तिवारी ने कहा कि भारतीय सिनेमा को विश्व में भारत का सांस्कृतिक राजदूत बनाया था। उनकी मशहूर फिल्म "शहर और सपना" का आइडिया उन्हें बारिश में पाइपों के भीतर रहने वाले लोगों को देखकर आया था।
इस ऑनलाइन परिचर्चा के अंत में कार्यक्रम से जुड़े साथियों ने अपनी राय और प्रश्न भी रखे। कार्यक्रम में सैय्यद शमशुद्दीन (पाकिस्तान), अपर्णा महाजन, लतिका जाधव (पुणे), जया मेहता, सौम्या लाम्बा, अंतरा देबसेन, एन डी पंचोली, असीमा रॉय चौधरी, राजीव कुमार शुक्ला (दिल्ली), प्रमोद बागड़ी, सारिका श्रीवास्तव, विवेक मेहता (इंदौर), राकेश वानखेड़े, फिल्म अभिनेता राजेन्द्र गुप्त, तरुण कुमार, उषा आठले, नागेश धुर्वे (मुंबई), प्रितपाल सिंह (अंबिकापुर), बेनेडिक्ट डामोर (झाबुआ) अर्पिता श्रीवास्तव (जमशेदपुर), शेखर मल्लिक (घाटशिला), सत्येन्द्र कुमार शेंडेय (सिवनी), संघमित्रा मलिक (हैदराबाद), शमीम अख्तर (अलीगढ), आर. के. एस. राठौर (लखनऊ), हिम्मत छंगवाल (उदयपुर), सुनीता चतुर्वेदी (जयपुर), जमुना बीनी (अरुणाचल प्रदेश), शशिभूषण (उज्जैन), अरुण शीतांश (आरा, बिहार), प्रकाशकान्त (देवास), लोकबाबू (छत्तीसगढ़), कृष्णा दुबे ( गुना), रामदुलारी शर्मा (अशोकनगर) आदि जुड़े।
भारतीय जननाट्य संघ इप्टा की ओर से मशहूर उर्दू लेखक, पटकथा लेखक और निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास पर केंद्रित 5 कार्यक्रमों की ऑनलाइन श्रृंखला का आयोजन चल रहा है जिसमें अब तक अब्बास की लिखी राही, दो बूंद पानी, हिना, आवारा और अनहोनी पर बातचीत हो चुकी है। कार्यक्रम के अंतिम 5वे चरण 7 अगस्त को होगा जिसमें अब्बास द्वारा 1946 में निर्देशित पहली फिल्म धरती के लाल पर बातचीत होगी।
उल्लेखनीय है कि बलराज साहनी पहली बार फिल्म से पर्दे पर आए थे और यह इप्टा की बनाई हुई पहली फिल्म थी. इसी फिल्म ने भारतीय सिनेमा में यथार्थवाद की शुरुआत हुई और बाद में विमल रॉय ने इसी से प्रेरित होकर दो बीघा जमीन 1953 में बनाई थी. खास बात यह है कि इस फिल्म को फ्रांस के कान फिल्म समारोह में पहली बार दिखाया गया था और विदेशी फिल्म समोराह में दिखाई जाने वाली यह पहली फिल्म थी.
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।