केरल में मानसून के मौसम में भारी और तीव्र वर्षा होती है जिससे मिट्टी की धारण क्षमता कमजोर होने से भूस्खलन होता है।
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केरल में भूस्खलन त्रासदियों का लम्बा इतिहास
वायनाड का नवीनतम् भूस्खलन केरल की कोई नयी त्रासदी नहीं है। यहां भूस्खलनों के लिए प्राकृतिक कारण तो अवश्य हैं मगर इसके लिए मानवीय कारण कम जिम्मेदार नहीं हैं। राज्य में सन् 2001 में कोट्टायम जिले में भी एक बड़े भूस्खलन में कई लोग मारे गए और व्यापक क्षति हुई थी। मानसून के मौसम में, इडुक्की जिले और अन्य क्षेत्रों में भूस्खलन के कारण जान-माल का नुकसान के उदाहरण मौजूद हैं।
सन् 2018 की बाढ़ के साथ राज्य भर में कई भूस्खलन हुए। उस समय खासकर इडुक्की, वायनाड और मलप्पुरम के पहाड़ी जिलों में भारी नुकसान हुआ था। इसी तरह 2019 में भी विभिन्न जिलों में भीषण भूस्खलन हुआ। उस समय वायनाड में पुथुमाला और मलप्पुरम में कवलप्पारा जैसे इलाके गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। अगस्त 2020 में इडुक्की जिले के पेट्टीमुडी इलाके में एक भयावह भूस्खलन हुआ, जिसमें कम से कम 66 लोग मारे गए।
समुद्र का पड़ोस अतिवृष्टि का कारण
केरल में मानसून के मौसम में भारी और तीव्र वर्षा होती है जिससे मिट्टी की धारण क्षमता कमजोर होने से भूस्खलन होता है। कोचीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीयूएसएटी) में वायुमंडलीय रडार अनुसंधान केन्द्र के एक अध्ययन के अनुसार अरब सागर के गर्म होने से घने बादल तंत्र बन रहे हैं, जिससे केरल में कम समय में ही अत्यधिक भारी वर्षा हो रही है और भूस्खलन की संभावना बढ़ रही है।
अध्ययन में कहा गया है कि वर्षा की तीव्रता में वृद्धि मानसून के मौसम में पूर्वी केरल में पश्चिमी घाट के उच्च से मध्य-भूमि ढलानों में भूस्खलन की संभावनाएं बढ़ रही है। वनों को कृषि और शहरी क्षेत्रों में बदलने से मिट्टी को स्थिर करने में मदद करने वाला प्राकृतिक वनस्पति आवरण कम हो रहा है। केरल के पहाड़ी क्षेत्रों में कुछ स्थानों पर जनसंख्या का केन्द्रीकरण, तेजी से शहरीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास होने से प्राकृतिक भूभाग और जल निकासी पैटर्न को बिगड़ रहा है, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है। विशेषज्ञों के अनुसार मानवीय गतिविधियों या प्राकृतिक घटनाओं के कारण प्राकृतिक जल निकासी पैटर्न में परिवर्तन से जल संचय और छिद्रों में पानी का दबाव बढ़ रहा है, जिससे ढलान अस्थिर हो रहे हैं।
गाडगिल रिपोर्ट फाइलों में हुई गुम
भारत सरकार द्वारा भूस्खलन पारिस्थितिकीविद् माधव गाडगिल के नेतृत्व में ‘‘गठित पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल’’ ने 2011 में केंद्र को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें सिफारिश की गई थी कि पूरी पहाड़ी श्रृंखला को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया जाए और उनकी पारिस्थितिक संवेदनशीलता के आधार पर पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में विभाजित किया जाए। लेकिन उन सिफारिशों की अनसुनी कर दी गई।
भूस्खलन देशभर के पहाड़ी क्षेत्रों में एक आम भूवैज्ञानिक जाखिमों में से एक है। भारत में लगभग 0.42 मिलियन वर्ग किमी या 12.6 प्रतिशत भूमि क्षेत्र बर्फ से ढके क्षेत्र को छोड़कर, भूस्खलन के लिए संवेदनशील है। इसमें से 0.18 मिलियन वर्ग किमी उत्तर पूर्व हिमालय में पड़ता है।
पश्चिमी घाट और कोंकण पहाड़ियों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र) में 0.09 मिलियन वर्ग किमी और आंध्र प्रदेश के अरुकु क्षेत्र के पूर्वी घाट में 0.01 मिलियन वर्ग किमी भूस्खलन संवेदनशील चिन्हित किया गया है।
दरअसल केरल या उत्तराखण्ड ही नहीं बल्कि हिमालय के साथ ही दक्षिण के सभी पहाड़ी इलाके भूस्खलन की जद में हैं। इसरो ने देश के 17 राज्यों और दो केन्द्र शासित 147 जिलों को संवेदनशील माना है।
इसरों के जाखिम मानचित्र के अनुसार वर्ष 2014 से लेकर 2017 के बीच मीजोरम में 12,385, उत्तराखण्ड में 11,219, त्रिपुरा में 8,070, अरुणाचल में 7,689 जम्मू-कश्मीर में 7,280 और केरल में 6039 भूस्खलन दर्ज हुए। पूर्वोत्तर के जिलों में वनावरण का ह्रास भी भूस्खलन का एक प्रमुख कारण है।
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