“ऐसा नहीं है कि पर्दा और ऐसी ही अन्य बुराइयां देश के कुछ भागों में हिंदुओं के कई वर्गों में प्रचलित नहीं है।
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हो सकता है कि ये बात कुछ लोगों को बुरी लगे लेकिन बाबा साहेब ने ये पुस्तक 40 के दशक में लिखी थी, तब से लेकर आज तक समाज में कई बदलाव आ चुके हैं। लेकिन उस वक्त वो पर्दाप्रथा को महिलाओं के सेहत से भी जोड़कर देखते थे।
उन्होंने अपनी पुस्तक में लिखा है-
"ऐसी पृथकता का मुस्लिम महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। वो खून की कमी, टीबी, पायरिया और कई अन्य रोगों से पीड़ित हो जाती हैं। उनका शरीर भी मजबूत नहीं रह पाता और उनकी कमर भी झुकती जाती है, उनकी हड्डियां निकल आती हैं, हाथ और पांव में खम पड़ जाता है, वे कुरूप हो जाती हैं। पसलियों, जो़ड़ों और ज्यादातर सभी हडिड्यों में दर्द रहता है। उनमें हृदय की धड़कन बढ़ने का सिलसिला भी प्राय: पाया जाता है। इन सभी कमजोरियों के फलस्वरूप प्रसूति काल (डिलिवरी) के दौरान अधिकांश की मृत्यु हो जाती है।
पर्दाप्रथा के कारण मुस्लिम महिलाओं का मानसिक और नैतिक विकास भी नहीं हो पाता। स्वस्थ्य सामाजिक जीवन से वंचित रहने से उनमें गलत प्रवृत्ति आ जाती है। बाहरी दुनिया से बिल्कुल अलग-थलग रहने के कारण उनका ध्यान तुच्छ पारिवारिक झगड़ों में ही उलझा रहता है। इसका परिणाम संकीर्ण सोच और संकुचित दृष्टिकोण के रूप में सामने आता है।"
डॉ. आंबेडकर हमेशा अपनी बात बिना लाग लपेट के कहते थे। इसीलिए वो मुस्लिम और हिंदू दोनों समुदायों के अंदर मौजूद पर्दा प्रथा का विरोध करते थे। लेकिन बाबा साहेब के मुताबिक हिंदुओं की पर्दाप्रथा और मुस्लिम समाज की बुर्का प्रथा में एक अंतर था।
इस बारे में उन्होने अपनी किताब के पेज नंबर 232 पर लिखा-
“ऐसा नहीं है कि पर्दा और ऐसी ही अन्य बुराइयां देश के कुछ भागों में हिंदुओं के कई वर्गों में प्रचलित नहीं है। परंतु अंतर केवल यही है कि मुसलमानों में पर्दा-प्रथा को एक धार्मिक आधार पर मान्यता दी गई है, लेकिन हिंदुओं में ऐसा नहीं है। हिंदुओं की तुलना में मुसलमानों में पर्दा-प्रथा की जड़े गहरी हैं। मुसलमानों में पर्दाप्रथा एक वास्तविक समस्या है और जबकि हिंदुओं में ऐसा नहीं है। मुसलमानों ने इसे समाप्त करने का कभी प्रयास किया हो इसका भी कोई साक्ष्य नहीं मिलता है।”
“मुसलमानों ने समाज में मौजूद बुराइयों के खिलाफ कभी कोई आंदोलन नहीं किया। हिंदुओं में भी सामाजिक बुराइयां मौजूद हैं, लेकिन अच्छी बात ये है कि वो अपनी इस गलती को मानते हैं- बाबा साहब अंबेडकर।
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पर्दाप्रथा ही नहीं डॉ. आंबेडकर इस्लाम के अंदर मौजूद बहुपत्नी प्रथा यानि चार शादियां करने के भी प्रचंड विरोधी थे। उनका मानना था का चार शादियों से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन और उनका दमन होता है। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि इस्लाम धर्म का जन्म समानता के सिद्धांत पर हुआ था लेकिन भारत तक पहुंचते-पहुंचते इस्लाम के अंदर भी जातिगत भेदभाव और ऊंच-नीच की बुराई शामिल हो गई। लेकिन बाबासाहेब को सबसे ज्यादा तकलीफ इस बात से थी कि भारत के मुसलमान समाज सुधार के विरोधी हैं।
उन्होंने अपनी पुस्तक के पेज नंबर 233 पर स्पष्ट शब्दों में लिखा है-
“मुसलमानों ने समाज में मौजूद बुराइयों के खिलाफ कभी कोई आंदोलन नहीं किया। हिंदुओं में भी सामाजिक बुराइयां मौजूद हैं, लेकिन अच्छी बात ये है कि वो अपनी इस गलती को मानते हैं और उसके खिलाफ आंदोलन भी चला रहे हैं। लेकिन मुसलमान तो ये मानते ही नहीं हैं कि उनके समाज में कोई बुराई है। दरअसल मुसलमान समाज सुधार के प्रबल विरोधी हैं।“
आपने आजकल एक शब्द बहुत सुना होगा ‘इस्लामोफोबिया’, दुनियाभर के मुसलमान अपने खिलाफ होने वाले किसी भी विरोध के लिए इस्लामोफोबिया शब्द का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन डॉ. अंबेडकर ने इस मुद्दे पर जो विचार रखे हैं उसे जानने के बाद आपको लगेगा कि भारतीय मुसलमान एक तरह से ‘हिंदूफोबिया’ से पीड़ित हैं। इसी वजह से वो अपने समाज में सुधार नहीं करते हैं।
बाबासाहेब ने अपनी पुस्तक के पेज नंबर 235 पर लिखा-
“हिंदुओं के वर्चस्व की वजह से मुसलमान हर उस चीज़ को सुरक्षित रखने पर ज़ोर देता है जो कि इस्लामी है। वो ये जांचने-पऱखने की हिम्मत भी नहीं करता कि ये मुस्लिम समाज के लिए लाभप्रद है या हानिकारक। भारतीय मुसलमान ये महसूस करता है कि दमन और राजनैतिक दवाब उसे दलित बना देगा। इसी के चलते वो हिंदुओं की सामाजिक और राजनैतिक सोच में विलीन होने से बचता है और इसीलिए भारत का मुसलमान अन्य देशों के मुसलमानों की तुलना में सामाजिक सुधार के मामले में पिछड़ा हुआ है।
चुनावी सीटों और पदों के लिए लगातार संघर्ष में मुसलमानों की ज्यादातर ऊर्जा नष्ट हो जाती है और उनके पास अपने समाजिक सुधार के बारे में सोचने का समय नहीं बचता है और बाकी का समय सांप्रदायिक तनाव की भेंट चढ़ जाता है। हिंदुओं के हावी होने के डर से मुसलमान एकजुट होकर अपनी सामाजिक-धार्मिक एकता को हर कीमत पर बचाए रखना चाहते हैं।”
एक बार फिर ध्यान दीजिए और बाबासाहेब की इन 75 साल पुरानी बातों को ताजा हिजाब के विवाद से जोड़कर देखिए, सारा मामला साफ हो जाएगा। उन्होंने यहां तीन महत्वपूर्ण बात कहीं हैं-
- पहली ये कि ‘हिंदुओं के वर्चस्व की वजह से मुसलमान हर उस चीज़ को सुरक्षित रखने पर ज़ोर देता है जो कि इस्लामी है।
- दूसरी ये कि ‘वो ये जांचने-पऱखने की हिम्मत भी नहीं करता कि ये सब मुस्लिम समाज के लिए लाभप्रद है या हानिकारक?’
- तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात ‘और इसीलिए भारत का मुसलमान अन्य देशों के मुसलमानों की तुलना में सामाजिक सुधार के मामले में पिछड़ा हुआ है।’
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