कर्नाटक चुनाव के नतीजे बता रहे हैं कि कांग्रेस पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने जा रही है। हिमाचल में मिली कामयाबी के बाद इस बड़ी जीत को कांग्रेस के लिए संजीवनी कहा जा रहा है, बल्कि कांग्रेस को बहुत दिनों बाद इतनी सॉलिड जीत मिल रही है। नतीजों को देखते हुए कांग्रेस नेताओं का उत्साह चरम पर है। इसे तमाम नेताओं के बयानों से भी समझा जा सकता है।
पहले बात चुनाव और उनके मुद्दों की करते हैं। कर्नाटक के चुनाव और नतीजों के बाद कई अहम पहलू सामने आए हैं। कर्नाटक देश का एक अहम राज्य है। यहां बिहार-यूपी जैसी ज्यादा सीटें तो नहीं हैं, लेकिन इस राज्य को साउथ का एंट्री प्वाइंट माना जाता है। यहां मिली जीत का असर दूसरे राज्यों में भी पड़ेगा। यही वजह है कि बीजेपी ने चुनाव जीतने के लिए कड़ी मेहनत की थी। यह बात अलग है कि वह मुद्दों को भुनाने में कामयाब नहीं हो सके।
भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक के चुनाव में विकास और रोजगार जैसे मुद्दों के इतर अपने चिर-परिचित धार्मिक एजेंडे को लेकर ही आगे बढ़ती रही। यहां तक कि अप्रत्याशित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘बजरंग बली की जय’ जैसे नारे भी लगवाते दिखे। पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री ने पांच ट्रिलियन की इकॉनामी का एक बार भी जिक्र नहीं किया। न मेक इन इंडिया और न ही स्टार्टअप जैसे विषयों को छुआ।
कर्नाटक के नतीजों को देखें तो कांग्रेस को ज्यादा फायदा अपनी रणनीति की जगह बीजेपी की कमजोरियों की वजह से मिला है। ऐसे में कांग्रेस के लिए भी यह चिंतन और मंथन का समय है कि अगर वह कामयाबी को निरंतरता में तब्दील नहीं कर पाई तो एक बार फिर से पार्टी वैंटिलेटर पर पहुंच जाएगी।
इस साल के अंत में मिजोरम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में चुनाव होने हैं। इनमें राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार है। पार्टी पर इन राज्यों में अपनी सरकार को बचाने का दबाव होगा। वहीं मध्य प्रदेश में इस बार पूर्ण बहुमत में सरकार बनाने के लिए भी रणनीति बनानी होगी। उसे मिजोरम और तेलंगाना में भी अपना प्रदर्शन बेहतर करना होगा।
कांग्रेस को 2024 के आम चुनावों से पहले इन प्रदेशों के चुनावों से होकर गुजरना है। इस लिहाज से भी कांग्रेस को अपना प्रदर्शन न सिर्फ बेहतर करना होगा, बल्कि एक विश्वसनीय पार्टी के तौर पर सामने आना होगा। ऐसी पार्टी जो जनता के ज्यादा नजदीक हो, जिसके पास न सिर्फ जमीनी मुद्दे हों, बल्कि बेहतर रणनीति भी हो।
हर बार सामने वाली पार्टी की कमजोरी से चुनाव नहीं जीता जा सकता है। अगर कांग्रेस इस साल होने वाले विधानसभा के इन चुनावों में ऐसा नहीं कर सकी तो कर्नाटक की संजीवनी का असर धीरे-धीरे कम होता जाएगा। इसका खामियाजा उसे 2024 के आम चुनावों में भुगतना होगा।
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