भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ब्रज और भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कुछ कजरी गीतों की रचना की है।
- फोटो : अमर उजाला
बदलते समय के साथ लोक संगीत के दूसरे प्रारूपों में तो बहुत बदलाव आए, लेकिन यह कजरी जस की तस रही। कजरी गीत का एक प्राचीन उदाहरण तेरहवीं शताब्दी के बड़े सूफी शायर अमीर ख़ुसरो की बहुप्रचलित रचना है- 'अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया।' अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की एक रचना 'झूला किन डारो रे अमरैया' भी बेहद प्रचलित है।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने ब्रज और भोजपुरी के अलावा संस्कृत में भी कुछ कजरी गीतों की रचना की है। लगभग सभी शास्त्रीय गायकों और वादकों ने कजरी की पीड़ा को सुर दिए हैं। गिरिजादेवी की आवाज़ और बिस्मिल्लाह खां की शहनाई में कजरी की वेदना शिद्दत से महसूस होती है।
भोजपुरी लोकगायिका विंध्यवासिनी देवी और शारदा सिन्हा के गाए कजरी गीत हमारी अनमोल धरोहर हैं। हिंदी और भोजपुरी सिनेमा में भी कजरी गीतों का खूब प्रयोग हुआ है, लेकिन ज्यादातर कजरी गीतों में कजरी की आत्मा कहीं नहीं नज़र आती।
सचिनदेव वर्मन के संगीत में गीतकार शैलेन्द्र का लिखा फिल्म 'बंदिनी' का यह कजरी गीत आज भी सिनेमा में कजरी गीतों का मीलस्तंभ बना हुआ है !
अब के बरस भेज भैय्या को बाबुल
सावन में लीजो बुलाए रे
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियां
दीजो संदेशा भिजाए रे।
अम्बुवा तले फिर से झूले पड़ेंगे
रिमझिम पड़ेंगी फुहारें
लौटेंगी फिर तेरे आंगन में बाबुल
सावन की ठंडी बहारें
छलके नयन मोरा कसके रे जियरा
बचपन की जब याद आए रे। ..
बैरन जवानी ने छीने खिलौने
और मेरी गुड़िया चुराई
बाबुल थी मैं तेरे नाज़ों की पाली
फिर क्यों हुई मैं पराई
बीते रे जुग कोई चिठिया न पाती
ना कोई नैहर से आए रे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।