समाज के सवालों पर क्यों खड़ी की जाती रही हैं महिलाएं
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ऐसे में हत्यारें से अधिक अपराधी तो वह दर्शक हैं जो अपराध को होता देखकर भी मौन रहे। इसी तरह कहीं भाई अपनी बहन का सिर काट रहा है तो कहीं पति गुस्से में पत्नी के टुकड़े कर रहा है तो कहीं महिलाएं परिवार, समाज से लेकर कार्यस्थलों तक में यौन शोषण का शिकार हो रही हैं।
इस तरह की घटनाएं हमारे समाज के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए भी शर्मनाक है। जब हम अपने ही समाज में महिलाओं के प्रति हत्या, हिंसा और बलात्कार को रोक नहीं पा रहे बल्कि इन अपराधिक घटनाओं में उनके सहयोगी बन रहे हैं और उन घटनाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन करके उनके सही होने का उपक्रम कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हम अपने ‘राष्ट्र’ को ‘माता’ शब्द के रूप से संबोधित करते हैं। ऐसे में क्या हम उस शब्द से जुड़े स्त्री सम्मान व मातृत्व भाव का सम्मान कर पा रहे हैं!
हमारे समाज में महिलाओं के साथ हिंसा, बलात्कार की बहुत सी अनगिनत घटनाएं प्रतिदिन घटती है। हम स्वयं भी उस हिंसा को बढ़ावा देते हैं और फिर यह हिंसा एक वर्ग विशेष के प्रति आक्रामक रूप धारण कर लेती है। उसके सम्मान व जीने के अधिकार का हनन करती है।
महिलाओं के प्रति हिंसा प्रत्येक देशकाल में होती रही है। यह हिंसा स्त्री को निर्वस्त्र ही नहीं करती बल्कि उसके सम्मान के साथ ही राष्ट्र के सम्मान को भी कटघरे में खड़ा करती है। यहां ‘स्त्री’ का अस्तित्व ही फिर एक प्रश्न बनकर रह जाता है। फिर वह रामायण की सीता हो, महाभारत की द्रोपदी हो या आज की महिलाएं। जो सत्ता, समाज के सवालों पर सदैव ही कटघरे में खड़ी की जाती रही हैं।
कभी अग्नि परीक्षा देने को मजबूर होती हैं और हम उसे सतीत्व से जोड़कर महिमामंडित करते हैं तो कहीं अपने अहं में जुए पर पत्नी को दाव पर लगाते पतियों के कारण सभा में निर्वस्त्र की जाती है और सभा में राजा से लेकर प्रजा सभी मौन दर्शक बनते हैं। समय, देशकाल वातावरण सभी कुछ बदला है जो नहीं बदला है, वह हमारी मन: स्थिति है।
आज वैवाहिक संबंधों से इत्तर प्रेम प्रसंगों में लिप्त पुरुषों से अधिक महिलाओं के प्रसंग मीडिया में बहस का हिस्सा बन रहे हैं लेकिन इन सब के बीच महिलाओं के साथ वीभत्स रूप से घटित हिंसा व बलात्कार की घटनाओं में धर्म से लेकर जाति तक पर तो चर्चा की जाती है लेकिन वीभत्स रूप से हिंसा व हत्या के पीछे स्त्री के प्रति वीभत्स मानसिकता बहस के केंद्र में नहीं आती है। यही कारण हैं कि महिलाओं के प्रति हिंसा और बलात्कार की घटनाएं बढ़ी हैं।
सत्ता, समाज के सवालों पर सदैव ही महिलाएं कटघरे में खड़ी की जाती रही हैं। कभी अपनों के ही द्वारा अग्नि परीक्षा देती हैं तो कभी सरे आम निर्वस्त्र की जाती हैं। उस समय में भी समाज संवेदन शून्य था और आज भी शून्य है। यह मानवीय शून्यता समाज के अस्तित्व को धीरे-धीरे समाप्त कर रही है साथ ही स्त्री-पुरुष संबंधों के मध्य अविश्वास को भी बढ़ावा दे रही है।
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