जोशीमठ में भू-धंसाव से घर में आई दरार
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करोड़ों के मकान का भी सवा लाख मुआवजा
एनडीएमए के नियमों में पूर्णरूप से क्षतिग्रस्त आवासीय भवन का मुआवजा पहाड़ी क्षेत्रों में 1,30,000 रुपये प्रतिघर और मैदानी क्षेत्र में 1,20,000 प्रति घर तय है। आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त पक्के घर का मुआवजा 65,000 रुपये तथा कच्चे घर का 40,000 रुपये तय है। मकानों के साथ ही क्षतिग्रस्त झोपड़ी के लिए 8000 रुपये तथा पशुओं के बाड़े के लिए 3000 रुपये का मुआवजा तय है। इसी तरह बाढ़ की स्थिति में 3 सेमी तक गाद हटाने के लिए अधिकतम् 18,000 रुपये और न्यूनतम् 2200 रुपये तय है।
जोशीमठ में बाढ़ नहीं आई, इसलिए गाद का सवाल ही नहीं। मगर वहां गहरी और चौड़ी दरारों के कारण खेत ही बेकार हो गए हैं। हल चलाते समय हल और बैल दानों ही दरारों और गड्ढों में फंस सकते हैं। जमीन भी खिसक रही हो तो फिर खेत कैसे सुरक्षित रह सकते हैं।
मुआवजे में बागवानी फसलों के लिए वर्षा सिंचित क्षेत्रों में 8,500 प्रति हेक्टेयर अधिकतम और 1,000 रुपये न्यूनतम तय है। इसी तरह सुनिश्चित सिंचित क्षेत्रों में अधिकतम मुआवजा 17,000 और न्यूनतम् 2,000 रुपये है। बारामासी फसलों, एग्रो फारेस्ट्री (अपने खेतों में वृक्षारोपण) पर अधिकतम 22,500 और न्यूनतम 2,500 न्यूनतम प्रति हेक्टेयर है।
ऐरी, मलबरी, और टसर के लिए 6,000 रुपये प्रति हेक्टेअर और मूंगा के लिए 7,500 प्रति हेक्टेअर तय है। अगर सरकार इस हिसाब से मुआवजा बांटती है तो उसे भारी जनाक्रोश का सामना करना पड़ेगा। करोड़ रुपए तक के मकान के लिए 1लाख 30 हजार दोगे तो लोग भड़केंगे ही।
भूधंसाव के कारण बरबाद हो रहे जोशीमठ में 30 जनवरी तक 863 मकानों पर दरारें हैं और केवल 181 को असुरक्षित घोषित किया गया था। सरकारी भाषा में मकानों को पूर्णरूप से या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त घोषित नहीं किया गया है। सरकार द्वारा जो एक्सग्रेसिया दिया जाना है वह क्षति के आधार पर ही दिया जाना है। जिन मकानों के नीचे धरती खिसक रही हो उनमें चाहे जितनी और जैसी भी दरारें हो, उन्हें कैसे सुरक्षित या आंशिक क्षतिग्रस्त माना जा सकता है? इसलिए जितने भी मकान भूधंसाव के क्षेत्र में हैं वे सभी खतरे में हैं और उनको पूर्ण क्षतिग्रस्त ही माना जा सकता है।
आपदा का मुआवजा अलग-अलग नहीं हो सकता
बदरीनाथ में मास्टर प्लान के तहत निर्माण कार्य के लिए सरकार ने पुराने मकान, सराय और होटल, और निजी आवास आदि ध्वस्त करा दिए। इसलिए जोशीमठ के आपदा प्रभावित अपने लिए भी बदरीनाथ के जैसा मुआवजा और पैकेज चाहते हैं। कुछ लोग टिहरी बांध विस्थापितों का जैसा पैकेज देने की बात कर रहे हैं। मगर राज्य सरकार आर्थिक रूप से उस स्थिति में नहीं है।
बदरीनाथ में भारत सरकार के हिसाब से और उसी के परिव्यय से काम हो रहा है। टिहरी में बांध बनाकर प्रतिदिन अरबों रुपये के राजस्व अर्जित करने के लिए लोगों को विस्थापित किया गया। इसलिए टीएचडीसी के लिए मुआवजे की मुंहमांगी रकम देना मुश्किल नहीं था। किसी बड़े परियोजन के लिए हुए पुनर्वास और आपदा के कारण पुनर्वास के नियम बिल्कुल अलग होते हैं।
जोशीमठ में एनडीएमए के 10 अक्तूबर 2022 को संशोधित नियमों और मानकों के अनुसार ही मुआवजा दिया जाना है। एनडीएमए केवल जोशीमठ के लिए अपने नियमों से बाहर नहीं जा सकता। अगर ऐसा हुआ तो सारे देश में उसी हिसाब से आपदा मुआवजा देना होगा। अगर राज्य सरकार अपनी ओर से मुआवजे की अतिरिक्त राशि देती है तो आपदाओं की दृष्टि से अति संवेदनशील उत्तराखण्ड में अन्य स्थानों में भी उतना ही मुआजा देना देना पडेगा।
उत्तराखण्ड में हर साल भूस्खलन, त्वरित बाढ़, बिजली गिरने, एवलांच जैसी प्राकृतिक आपदाएं होती रहती है सबसे बड़ा भूकम्प का खतरा तो हर समय मंडराता ही रहता है। अगर बदरीनाथ के पैटर्न पर मुआवजा दिया गया तो प्रदेश भर में आपदा प्रभावितों को उसी पैटर्न पर मुआवजा दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में मुआवजे के मानकों में आम लोगों की आजीविका को अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।
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