सरकार को किसानों के सुरक्षा कवच के रूप में और इन अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारन्टी भी सुनिश्चित करना चाहिए।
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प्रोफेसर श्वेता मिश्रा का यह भी सुझाव है कि इन मोटे अनाजों की पैदावार और खपत वाले इलाके की पहचान के साथ-साथ परम्परागत तकनीक से हटकर नई तकनीक का ईजाद करना भी उतना ही जरूरी है। हरित क्रांति के पहले भारत में इन मोटे अनाजों की पैदावार 20% के करीब थी, जो अब घटकर 6% ही रह गई है। इसलिए भारत को मोटे अनाजों का 'हब' बनाने के लिए जरूरी है कि उन इलाकों की पहचान की जाए और उसे उत्तर प्रदेश की तरह 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' की तरह विकसित करने की योजना तैयार कीजाए।
क्या हैं चुनौतियां?
मसलन उड़ीसा, तेलंगाना, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात के आदिवासी बहुल वे इलाकों में जहां बरसात कम होती हैं। इन अनाजों की पैदावार के लिए सर्वथा उपयुक्त हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा, घाघरा और गंडक के इलाके में आज भी इन अनाजो की अच्छी पैदावार होती है। पर पैदावार के बाद इन अनाजों के 'प्रॉसेसिंग' की समस्या भी कम विकट नहीं है। गांवों में अब ओखल, मूसल, जाता और ढेंकी चलाने वाली औरतें लगभग नहीं के बराबर है। इसके बिना आज देशज तकनीक से इन अनाजों से अन्न निकालने में खासी मुश्किलें होंगी।
मसलन सांवा और कोदो जैसे अनाजों में अन्न के ऊपर 'सात लेयर' होती हैं। ऐसे में जब जाता और ढेंकी गांवों से गायब है। फिर किसान इन अनाजों के उत्पादन के प्रति उदासीन भी हो सकते हैं। प्रोफेसर श्वेता मिश्रा बताती हैं कि हाल ही में पूसा इंस्टीट्यूट ने इन इन मोटे और छोटे अनाजों के छिलके हटाने के लिए एक यूनिट तैयार की है। अब इसका पेटेंट भी हो चुका है। उम्मीद है कि यह यूनिट 'कॉस्ट इफेक्टिव' भी होगी और शीघ्र ही बाजार में उपलब्ध हो जाएगी।
क्या उठाने चाहिए सरकार को कदम?
सरकार को किसानों के सुरक्षा कवच के रूप में और इन अनाजों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारन्टी भी सुनिश्चित करना चाहिए। बताते चलें कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के तहत सरकार 22 तरह के अनाजों का समर्थन मूल्य घोषित करती है और महज 6% अनाजों की सरकारी खरीद ही सम्भव हो पाती है।
इसके अलावा इन अनाजों की खपत बढ़ाने के लिए गरीब कल्याण योजना के तहत सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए दिए जाने वाले अनाजों में भी शामिल करना होगा। आंगनबाड़ी केंद्रों से वितरित होने वाले पौष्टिक अनाजों में भी इसे शामिल किया जा सकता है।
साथ ही इन अनाजों की खपत बढ़ाने के लिए जरूरी है कि केन्द्रीय और राज्य सरकारों के कैंटीन और निजी कैंटीनों में भी इन अनाजों के सेवन से स्वास्थ्य में होने वाले फायदे के बारे में 'मिशन मोड' में जागरूकता अभियान चलाना होगा। जिन इलाकों में इन अनाजों की पैदावार हो सकती है, वहां बीज बैंक और प्रोसेसिंग यूनिट भी तैयार करनी होगी, ताकि किसानों को इन अनाजों के बीज आसानी से उपलब्ध हो सके।
इन प्रयासों से उम्मीद की जानी चाहिए कि हाल तक गरीबों का पेट भरने वाले इन विश्वामित्री मोटे अनाजों को आजादी के अमृतकाल में ही सही उचित गौरव और गरिमा हासिल होगी। तब शायद ये मोटे अनाज यह बहाना और शिकायत न करें कि "नहीं हम मंडी नहीं जाएंगे। खलिहान से उठते हुए कहते हैं दानें। जाएंगे तो फिर लौट कर नहीं आएंगे। जाते-जाते कहते दानें। अगर लौटकर आएंगे, तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे।" (केदारनाथ सिंह)
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