चार बार गढ़वाल से सांसद रहे
उन्होंने सन् 1952 से लोकसभा में चार बार गढ़वाल का प्रतिनिधित्व किया। सन् 1963 से 1971 तक वह जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री तथा इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडलों के सदस्य रहे। केन्द्रीय शिक्षा राज्यमंत्री के रूप में उन्होंने केन्द्रीय विद्यालयों की स्थापना करवाई और केन्द्रीय विद्यालय संगठन के पहले अध्यक्ष रहे।
त्रिभाषी फार्मूला को महत्व देकर उन्होंने संगठन को प्रभावशाली बनाया। गांधी जी के हिन्दी के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना कराई। दक्षिण भारत एवं पूर्वाेत्तर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में उनका अद्वितीय योगदान रहा था। संसद में वह हिन्दी में ही बोलते थे। प्रश्नों का उत्तर भी हिन्दी में ही देते थे।
एक बार नेहरू जी ने उन्हें टोका तो उन्होंने विनम्रतापूर्वक कह दिया कि मैं आपके आदेश का जरूर पालन करता, परन्तु मुझे हिन्दी में बोलना उतना ही अच्छा लगता है जितना अन्य विद्वानों को अंग्रेजी में।
दुर्लभ नेता, स्वेच्छा से राजनीति छोड़ दी
भक्त जी ने 1971 में सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया। वह उन दुर्लभ राजनेताओं में थे, जिन्होंने उच्च पद पर रह कर स्वेच्छा से राजनीति छोड़ी। राजनीति की काली कोठरी में रहकर भी वह बेदाग निकल आए। तत्पश्चात् उन्होंने अपना सारा जीवन शिक्षा व साहित्य की सेवा में लगा दिया।
उनकी लोकप्रियता का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि लोकसभा चुनाव में उनसे पराजित होने वाले कोई और नहीं बल्कि पेशावर काण्ड के हीरो वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली थे। वह जिस किसी पद पर भी रहे, उन्होंने निष्ठा तथा ईमानदारी से कार्य किया। वह सादा जीवन और उच्च विचार की मिसाल थे।
बड़े से बड़ा पद प्राप्त होने पर भी अभिमान और लोभ उन्हें छू न सका। वह ईमानदारी से सोचते थे, ईमानदारी से काम करते थे। निधन के समय भी वह किराए के मकान में रह रहे थे। किसी दबाव पर अपनी सत्यनिष्ठा छोड़ने को वह कभी तैयार नहीं हुए।
छोड़ दिया था कुलपति पद
भक्त दर्शन सन् 1972 से 1977 तक उ0प्र0 खादी बोर्ड के उपाध्यक्ष रहे और 1972 से 1977 तक कानपुर वि.वि. के कुलपति। उन्हें एक बार छात्र आन्दोलन के दौरान छात्रों का अभद्र व्यवहार इतना आहत कर गया कि उन्होंने तत्काल पद से इस्तीफा दे दिया। वह 1988-90 में उ.प्र. हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष रहे और दक्षिण भारत के अनेक हिन्दी विद्वानों को उन्होंने सम्मानित करवाया।
उन्होंने हिन्दी और भारतीय भाषाओं के लेखकों की पुस्तकों का अनुवाद करवाया और उनके प्रकाशन में सहायता की। डॉ0 भक्तदर्शन ने अनेक उपयोगी ग्रंथ लिखे और कुछ सम्पादित किए। इनमें श्रीदेव सुमन स्मृति ग्रंथ, गढ़वाल की दिवंगत विभूतियां (दो भाग) कलाविद् मुकुन्दी लाल बैरिस्टर, अमर सिंह रावत एवं उनके आविष्कार तथा स्वामी रामतीर्थ पर आलेख प्रमुख हैं, इसीलिए उनको डॉक्टरेट उपाधि से सम्मानित किया गया था। 79 वर्ष की उम्र में 30 अप्रैल 1991 को देहरादून में दिवंगत विभूतियों का यह लेखक स्वयं दिवंगत हो गया।
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