देश में एकरूपता लाने के लिए पूरे देश में एक भाषा को प्रयोग में लाना चाहिए।
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मातृभाषा को बढ़ावा देने की आवश्यकता
विश्व के किसी भी देश में प्राथमिक शिक्षा विदेशी भाषा में नहीं दी जाती। विश्व के परिप्रेक्ष्य में लगभग सभी उन्नत एवं विकसित देशों में वहाँ की शिक्षा, शोध कार्यों, शासन-प्रशासन की भाषा वहां की भाषा होती है और अपने देश में भी ऐसे ही भाव को प्रोत्साहित करना चाहिए जिससे कि सभी कार्य मातृभाषा में हों। भारत के महापुरुषों, शिक्षाविदों जैसे विनोबा भावे, महात्मा गाँधी, पं. मदन मोहन मालवीय, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के भी यहीं विचार थे।
पूर्व में किए गए अध्ययन यहीं बताते हैं कि अपनी भाषा के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने से चिंतन एवं विचारों में मनोवैज्ञानिकता एवं सृजनात्मकता आती है और कठिन विषय भी सुगमता से समझ में आ जाते हैं।
इस वर्ष अपना देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, इन सपनों को साकार करने में अन्य घटकों के साथ-साथ हिंदी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। भारत में अनेक भाषाओं का समागम है, अतः देश में एकरूपता लाने के लिए पूरे देश में एक भाषा को प्रयोग में लाना चाहिए।
लोकमान्य तिलक ने हिंदी के संबंध में विचारों में लिखा है –
यह तो उस आंदोलन का अंग है जिसे मैं राष्ट्रीय आंदोलन कहूंगा और जिसका उद्देश्य समस्त भारतवर्ष के लिए एक राष्ट्रीय भाषा की स्थापना करना है क्योंकि सबके लिए समान भाषा राष्ट्रीयता का महत्वपूर्ण अंग है।
कुछ इसी प्रकार के विचार भारतेन्दु हरिश्चंद्र के भी रहे हैं वह लिखते हैं-
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।
महात्मा गांधी ने अपने पत्र हिंदी नवजीवन में लिखा है-
इस विदेशी भाषा (अंग्रेजी) के माध्यम ने बच्चों के दिमाग को शिथिल कर दिया है, उनके स्नायुओं पर अनावश्यक जोर डाला है उन्हें रट्टू और नकलची बना दिया है तथा मौलिक कार्यों और विचारों के लिए सर्वथा अयोग्य बना दिया है।
गूगल का अनुमान है कि वर्ष 2024 तक भारत में अंग्रेजी की तुलना में हिंदी माध्यम से इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या कहीं अधिक होगी।
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हिंदी की विशेष भूमिका
एक तरफ जहां हिंदी सिनेमा खरबों रुपयों की इंडस्ट्री है तो दूसरी तरफ देश के सर्वाधिक पठित अखबार हिंदी के हैं। यदि हम टेलीविजन की बात करें तो दो तिहाई चैनल हिंदी के हैं और सर्वाधिक देखे जाने वाले चैनलों में हिंदी आगे है। विज्ञापन में भी हिंदी का बोलबाला है और यह भी प्रसन्नता का विषय है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी भाषा नीति को प्रोत्साहित किया गया है।
एक तरफ जहां हम भारत में हिन्दी और मातृभाषा में शिक्षा को प्रोत्साहित कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पूरी दुनिया में 200 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है। डिजिटल इंडिया के अंतर्गत मोबाइल एप्स आदि में भी हिंदी की अपार संभावनाएं हैं।
गूगल का अनुमान है कि वर्ष 2024 तक भारत में अंग्रेजी की तुलना में हिंदी माध्यम से इंटरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या कहीं अधिक होगी। पुस्तक प्रकाशक किताबों के प्रिंट वर्जन के साथ-साथ ऑडियो-डिजिटल वर्जन भी हिंदी में प्रकाशित कर रहे हैं। ऑडियो किताबों का ई-वर्जन जैसी डिजिटल दुनिया ने हिंदी का एक नया संसार ही बना दिया है। भारत को आत्मनिर्भर बनाने में देश भर में प्रयास हो रहा है और इसे साकार करने में हिंदी की भी एक महती भूमिका होगी इसका हमें पूर्ण विश्वास है।
आज अन्य देशों में भी हिंदी सीखने की जिज्ञासा बढ़ती जा रही है। हिंदी सिनेमा, हिंदी टेलीविजन के बढ़ते प्रसार ने हिंदी सीखने की चाहत को कई गुना बढ़ा दिया है। आज पूरे विश्व में कोई योग को समझने के लिए, कोई भारतीय अध्यात्म को समझने के लिए हिंदी को सीखने का प्रयास कर रहा है।
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर यह आवश्यक है कि मातृभाषा में आ रही चुनौतियों से निपटने के लिए प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर के साथ-साथ उच्च शिक्षा में भी हिंदी भाषा प्रयोग को बढ़ावा देने के प्रयास किए जाएं तथा सभी संस्थानों में हिंदी को प्रोत्साहित किया जाए।
हिंदी ज्ञान, विज्ञान, चिंतन, परंपरा की भाषा एवं उचित माध्यम बने। भाषा का ज्ञान, ज्ञान का द्वार है। इस अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर, आइए, हम सभी संकल्प लें कि हम अपनी मातृभाषा का सम्मान करें क्योंकि-
मातृभाषा का सम्मान, देश का सम्मान है,
हमारी स्वतंत्रता वहाँ है, मातृभाषा जहाँ है।
इसी सम्मान से हम अपने देश, भारत का सम्मान बढ़ाने में और नए भारत की संरचना करने में सफल होंगे।
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