नेल्सन मंडेला ने अपने एक वक्तव्य में कहा था कि ‘यदि आप किसी आदमी से उस भाषा में बात करते हैं जिसे वह समझता है, तो यह बात उसके दिमाग तक जाती है। अगर आप उसकी भाषा में बात करते हैं तो वह उसके दिल तक जाती है’। हमारी मातृभाषाएं हमारे हृदय का द्वार है। जो धीरे-धीरे भाषिक नीति-नियमों में उसकी अवहेलना के कारण सामाजिक भाषिक व्यवहार से लेकर शिक्षा तक में सिमटती जा रही हैं।
आज का समय विज्ञान और तकनीक का है। हमारा युवा शिक्षा के माध्यम से इससे जुड़ रहा है। लेकिन कितने ही युवा भाषाई दूरियों के कारण विज्ञान और तकनीक से स्वयं को दूर कर रहे हैं। भाषा, ज्ञान के ग्रहण और संग्रहण दोनों का ही माध्यम है। लेकिन यदि वह शिक्षा किसी एक भाषा विशेष को केंद्र में रखकर पढ़ी-पढ़ाई जाती रहेगी तो युवा उस ज्ञान परंपरा से ही दूरी बना लेगा। मनोवैज्ञानिक तथ्य भी है कि बच्चा जितनी तेजी व बेहतर तरीके से अपनी मातृभाषा में ज्ञान को अर्जित कर सकता है, वह अन्य भाषा में संभव नहीं है।
उसकी अन्य भाषाओं में सीखने की प्रक्रिया शिथिल, उबाऊ और अधिक मानसिक द्वंद्व से गुजरती है। अपने जीवन अनुभव को साझा करते हुए पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम ने कहा था कि ‘मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बन पाया क्योंकि मेरी शिक्षा मेरी मातृभाषा में हुई है’। मातृभाषा में शिक्षा के अभाव के कारण युवाओं का एक बड़ा वर्ग विज्ञान और तकनीकी ज्ञान को अर्जित करने से पिछड़ रहा है।
हमारे आसपास संवैधानिक स्तर से लेकर शैक्षणिक संस्थानों तक, लोक से शहर तक मातृभाषाओं के संरक्षण का प्रश्न सदा ही उठता रहा है। लेकिन यह प्रश्न सिर्फ प्रश्न ही बनकर रह जाता है। आज भी आकादमिक से लेकर सार्वजनिक स्तर के अधिकांश कार्य, नीति नियम, योजनाएं, वैधानिक फैसले सभी अंग्रेजी भाषा में संपन्न होते है।
हिंदी भाषा की दोयम दर्जे की स्थिति का प्रभाव भारत की विभिन्न मातृभाषाओं पर भी देखा जा रहा है। भारत का ही एक आम युवा हिंदी भाषा को बोलने से संकुचाता है। हिंदी क्षेत्र की मातृभाषाओं के नाम सुनकर तो वह नाक आंख मुंह बनाने लगता है। उन्हें भाषा ही नहीं मानता है।
आज के युवा द्वारा अपनी मातृभाषा के प्रति इतना नकार भाव, उसके प्रति हिकारत का भाव रखना, हमें भारतीय भाषाओं विशेषकर मातृभाषाओं के भविष्य के प्रति चिंतित करता है। ऐसे मानसिक व सामाजिक परिवेश में मातृभाषाओं को कैसे बचाया जा सकता है? इन मातृभाषाओं में संचित ज्ञान राशि की संचित निधि को कैसे सजोया या सवारा जा सकता है ? यह प्रश्न आज भी ज्वलंत बना हुआ है।
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