भारत के संदर्भ में अगर बात की जाए तो संसदीय लोकतंत्र काफी मजबूती से बीते 68 सालों में दुनिया के सामने आया है।
साल 1889 में सांसदों के एक छोटे समूह के रूप में शुरू हुआ अंतर-संसदीय संघ आज संसदीय कूटनीति और संवाद के माध्यम से शांति को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। अंतर-संसदीय संघ का नारा "लोकतंत्र के लिए- सभी के लिए" और लक्ष्य "लोकतंत्र और संसद द्वारा लोगों की शांति और विकास के लिए दुनिया की हर आवाज को सुना जाए" ।
वर्तमान परिदृश्य में संसदीय लोकतंत्र के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय संसदीय दिवस का आयोजन काफी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब लोग राजनीतिक संस्थानों में से विश्वास खोते जा रहे हैं। हम दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र के ऊपर नस्लीय, धार्मिक उन्माद और तानाशाही खतरे को मंडराते देख रहे हैं। ऐसे में अगर दुनिया में लोकतंत्र को मजबूती से पनपाना है तो दुनिया भर की संसद को लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में मजबूत,पारदर्शी और जवाबदेह होने की जरूरत है।
भारत के संदर्भ में अगर बात की जाए तो संसदीय लोकतंत्र काफी मजबूती से बीते 68 सालों में दुनिया के सामने आया है। संसदीय प्रणाली के लिहाज से दुनिया के 193 देशों में से 79 देशों में द्विसदनीय और 114 देशों मे एकसदनीय व्यवस्था है। भारत में द्विसदनीय व्यवस्था है उच्च सदन राज्य सभा और निचले सदन लोक सभा के रूप में।
भारत में 30 साल बाद 2014 में एक पूर्ण बहुमत की सरकार का गठन होने के साथ ही हम संसद में कार्य उत्पादकता में बढ़ोतरी देख रहे हैं। सदन में व्यवधान पहले से कम हुआ है और विधायी कामकाज भी पहले की अपेक्षा काफी बढ़ा है। 17वीं लोक सभा के पहले सत्र में संसद के दोनों सदनों से 30 विधेयक पारित हुए और लोक सभा में 35 विधेयक पारित किए गए इससे 1952 में बनी पहली लोक सभा के पहले सत्र के 24 विधेयकों को पारित करने का अभेद रिकार्ड भी टूट गया।
इसके साथ यह भी सच है कि संख्याबल में कमजोर होने के कारण मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता का पद भी हासिल नहीं कर सकी,जिसका परिणाम यह हुआ है कि सदन में विपक्ष की आवाज़ कमजोर हुई। सफल लोकतंत्र के लिए सत्ता पक्ष के साथ ही मजबूत विपक्ष की भी जरुरत होती है।
महिलाओं का संसद में प्रतिनिधित्व बढा है और 17वीं लोक सभा में 78 महिला जनप्रतिनिधि सांसद के तौर पर चुन कर संसद पहुंची हैं जो भारत में अब तक की सबसे बड़ी संख्या है, हांलाकि पुरी दुनिया के संसदों में महिला सांसदों का हिस्सा 25 प्रतिशत है। इस लिहाज से भारत की संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी दुनिया के औसत से अभी भी कम है।
अंतरराष्ट्रीय संसदीय दिवस के मौके पर हम यह उम्मीद कर सकते हैं कि संसद जनता के प्रति अपनी जवाबदेही बना कर रखेगी और समाज में किसी के साथ भी नस्ल, भाषा, क्षेत्र, जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं होगा और समाज के अंतिम पायदान पर बैठे व्यक्ति की आवाज संसद में सुनी जाए तभी हम वास्तविक अर्थ में अंतरराष्ट्रीय संसदीय दिवस की सार्थकता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।
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