महात्मा गांधी की मूर्ति (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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एक अजीब सी उलझन
कभी-कभी, जब हम दुनिया में अपने चारों ओर देखते हैं, तो हम पाते हैं कि हिंसा और नकारात्मक मानसिकता हावी हो गई है, लेकिन यह दीर्घ काल तक रहने वाली नहीं है। प्रत्येक मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति शांति में रहने की होती है। संघर्ष हमारा स्वभाव नहीं है और इसलिए हम संघर्ष से बाहर निकलना चाहते हैं लेकिन हम नहीं जानते कि कैसे, कहां और क्यों?
यहीं पर योग, ध्यान और अन्य साधनाओं का ज्ञान लोगों को हिंसक प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने में मदद करता है। उच्च जागरूकता की स्थिति में हिंसा नहीं हो सकती। जब आपके पास अपने और अपने जीवन के बारे में एक व्यापक दृष्टिकोण होता है, तो अहिंसा स्वाभाविक रूप से आपके अंदर पनपती है। अहिंसा और धैर्य आत्मा की महान शक्ति के लक्षण हैं।
अशांत को सुख कहां?
हिंसा के प्रति झुकाव रखने वाला मन जिसके पास है, ऐसा व्यक्ति कभी भी स्वयं से प्रेम नहीं कर पाएगा। जो शांत नहीं है, वह अपने भीतर और आसपास के देवत्व से नहीं जुड़ सकता। भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, "अशांतस्य, कुत: सुखम।" यदि आप अशांत हैं, तो सुख नहीं हो सकता और हिंसा ही लोगों को अशांत करती है।
आज दुनिया में हम पाते हैं कि अज्ञानी जन कट्टर धार्मिक हैं, तथाकथित बुद्धिजीवी नास्तिक होने में गर्व महसूस करते हैं, और बुद्धिमान व्यक्ति ही वास्तव में आध्यात्मिक हैं। यह समय है कि हम अपने युवाओं को सीमित पहचान से परे देखने और उस सामान्य मानवता के साथ जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करें जिसका हम सभी हिस्सा हैं। आइए हम अहिंसा के सार्वभौमिक मूल्य का आह्वान करें और देश, धर्म, लिंग और जाति के नाम पर हो रही व्यर्थ हिंसा को समाप्त करें।