देश में हर साल बड़ी संख्या में बाघ मर रहे हैं, हाथी कई बार ट्रेनों से टकराकर मौत के मुंह में समा जाते हैं।
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कुछ समय पूर्व उत्तराखण्ड से भी चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें बताया गया था कि उत्तराखण्ड की नदियों तथा अन्य जलस्रोतों में मिलने वाली महाशीर, रौला, स्नो ट्राउट, रेनबो ट्राउट, पत्थर चट्टा, असेला, गारा, गूंज, बरेलियस इत्यादि मछलियों की करीब 258 प्रजातियों का अस्तित्व खतरे में हैं और इसका प्रमुख कारण नदियों के आसपास अवैध खनन के चलते पारिस्थितिकीय तंत्र का बिगड़ना है, जिसका यहां मिलने वाली मछलियों की तमाम प्रजातियों पर इस कदर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है कि जिन नदियों में प्रायः 50 से 100 किलो तक वजनी महाशीर जैसी मछलियां बहुतायत में मिलती थी, वहीं अब 5-10 किलो वजनी मछलियां ढूंढ़ना भी मुश्किल होता जा रहा है।
दरअसल, इन क्षेत्रों में अवैध खनन, लगातार निर्माण कार्यों, भू-स्खलन और गलत तरीकों से शिकार के कारण मछलियों के भोजन के स्रोत और उनके पलने-बढ़ने की परिस्थितियां प्रभावित हुई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे क्षेत्रों में मछलियों के छिपने और प्रजनन की परिस्थितियां प्रतिकूल होती जा रही हैं, जिसका सीधा असर मछलियों की इन तमाम प्रजातियों के अस्तित्व पर पड़ रहा है।
भू-स्खलन के कारण नदियों में गाद की मात्रा बहुत बढ़ गई है, जो मछलियों के छिपने और उनके खाने की जगहों को बर्बाद कर रही है। इसके अलावा नदियों में जमा होते कचरे के कारण भी मछलियों का भोजन खत्म हो रहा है।
देश में हर साल बड़ी संख्या में बाघ मर रहे हैं, हाथी कई बार ट्रेनों से टकराकर मौत के मुंह में समा जाते हैं, इनमें से कईयों को वन्य तस्कर मार डालते हैं। कभी गांवों या शहरों में बाघ घुस आता है तो कभी तेंदुआ और घंटों-घंटों या कई-कई दिनों तक दहशत का माहौल बन जाता है।
यह सब वन क्षेत्रों के घटने और विकास परियोजनाओं के चलते वन्य जीवों के आश्रय स्थलों में बढ़ती मानवीय घुसपैठ का ही परिणाम है कि वन्य जीवों तथा मनुष्यों का टकराव लगातार बढ़ रहा है और वन्य प्राणी अभयारण्यों की सीमा पार कर बाघ, तेंदुए इत्यादि वन्य जीव अब अक्सर बेघर होकर भोजन की तलाश में शहरों का रूख करने लगे हैं, जो कभी खेतों में लहलहाती फसलों को तहस-नहस कर देते हैं तो कभी इंसानों पर जानलेवा हमले कर देते हैं।
विकास के दिशाहीन मॉडल ने कई प्रजातियों को विलुप्त कर दिया है।
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‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के अनुसार देश के जलक्षेत्र में भी 13 हजार लुप्तप्रायः प्रजातियों की गणना की गई है, जिसका एक बड़ा कारण 8 हजार किलोमीटर तटरेखा के आसपास बंदरगाह तथा बिजलीघरों जैसी विकास परियोजनाएं मानी जा रही हैं। ‘इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर’ (आईयूसीएन) के मुताबिक भारत में पौधों की करीब 45 हजार प्रजातियां पाई जाती हैं और इनमें से भी 1336 प्रजातियों पर लुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इसी प्रकार फूलों की पाई जाने वाली 15 हजार प्रजातियों में से डेढ़ हजार प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं।
पृथ्वी पर पेड़ों की संख्या घटने से अनेक जानवरों और पक्षियों से उनके आशियाने छिन रहे हैं, जिससे उनका जीवन संकट में पड़ रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यदि इस ओर जल्दी ही ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में स्थितियां इतनी खतरनाक हो जाएंगी कि धरती से पेड़-पौधों तथा जीव-जंतुओं की कई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। माना कि धरती पर मानव की बढ़ती जरूरतों और सुविधाओं की पूर्ति के लिए विकास आवश्यक है लेकिन यह हमें ही तय करना होगा कि विकास के इस दौर में पर्यावरण तथा जीव-जंतुओं के लिए खतरा उत्पन्न न हो।
अगर विकास के नाम पर वनों की बड़े पैमाने पर कटाई के साथ-साथ जीव-जंतुओं तथा पक्षियों से उनके आवास छीने जाते रहे और ये प्रजातियां धीरे-धीरे धरती से एक-एक कर लुप्त होती गई तो भविष्य में उससे उत्पन्न होने वाली भयावह समस्याओं और खतरों का सामना हमें ही करना होगा। बढ़ती आबादी तथा जंगलों के तेजी से होते शहरीकरण ने मनुष्य को इतना स्वार्थी बना दिया है कि वह प्रकृति प्रदत्त उन साधनों के स्रोतों को भूल चुका है, जिनके बिना उसका जीवन ही असंभव है।
आज अगर खेतों में कीटों को मारकर खाने वाले चिडि़या, मोर, तीतर, बटेर, कौआ, बाज, गिद्ध जैसे किसानों के हितैषी माने जाने वाले पक्षी भी तेजी से लुप्त होने के कगार हैं तो हमें आसानी से समझ लेना चाहिए कि हम भयावह खतरे की ओर आगे बढ़ रहे हैं और हमें अब समय रहते सचेत हो जाना चाहिए। हमें अब भली-भांति समझ लेना होगा कि पृथ्वी पर जैव विविधता को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यही है कि हम धरती की पर्यावरण संबंधित स्थिति के तालमेल को बनाए रखें।
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