‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ नाम पूरी तरह अंग्रेजी में है
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ग्रीक पुराणों में इसका उल्लेख करीब ढाई हजार वर्ष पहले से मिलता है। बिहार की जनता इससे कैसे और क्या प्रेरणा लेगी, यह भी देखने की बात है। खासकर तब जब, राज्य की सत्ता के लिए चुनावी घमासान लालटेन, तीर, कमल, पंजे व घर जैसे पारंपरिक और सुपरिचित प्रतीको में हो।
प्रिया की अंग्रेजियत पर राहुल देव की आपत्तिनुमा सलाह यह है कि वे पहले यह सर्वे तो करा लेतीं कि पार्टी के ऐसे अंग्रेजी नाम व पश्चिम प्रेरित चुनाव चिन्ह से कितने लोग प्रेरणा लेंगे? बिहार तो दूर राजधानी पटना में ही कितने लोग इसे समझ पाएंगे? राहुल का आशय यह है कि अगर हिंदी भाषी बिहार में राजनीति करनी है तो पार्टी का नाम,चिह्न तो हिंदी, देसी बोली या उससे मिलती-जुलती भाषा में हो।
यहां मूल मुद्दा राजभाषा और अघोषित रूप से राष्ट्रभाषा हिंदी वाले देश में ज्यादातर राजनीतिक दलों के नाम अंग्रेजी में या फिर अंग्रेजीयुक्त होने का है। देश में कुल 8 रजिस्टर्ड राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां हैं। इनमें से एक का भी पूरा नाम पूर्णत: हिंदी में नहीं है।
इसी तरह भारत में 52 मान्यता प्राप्त प्रादेशिक पार्टियां है, जिनमें से केवल 8 पार्टियां ऐसी हैं, जिनके नाम पूरी तरह हिंदी में कहे जा सकते हैं (इनमें वो प्रादेशिक दल शामिल नहीं हैं, जिनके नाम उनकी स्थानीय भाषाओं में हैं)। जैसे कि शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल, बीजू जनता दल या सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा आदि।
इनके अलावा देश में 2538 गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल भी हैं, उनमें से भी बहुत कम के नाम हिंदी में हैं। ज्यादातर के नाम या तो अंग्रेजी हैं या हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि संपूर्ण रूप से हिंदी नाम वाली कोई पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर जनता का समर्थन नहीं जुटा पाती। मूल रूप से हिंदी पट्टी की कही जाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने भी ‘भारतीय’ और ‘जनता’ शब्द तो हिंदी से लिए लेकिन (शायद राष्ट्रीय बनने के लिए) अंग्रेजी का ‘पार्टी’शब्द कायम रखा ( जब तक वो पूर्ण हिंदी नाम वाली ‘जनसंघ’ थी, तब तक उसकी राजनीतिक सफलताएं सीमित थीं)।
‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ नाम पूरी तरह अंग्रेजी में है। दोनो कम्युनिस्ट पार्टियों के नाम भी अंग्रेजी में है। इस सूची में बहुजन समाज पार्टी, ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, नेशनलिस्ट कांग्रेस के अलावा एक चौंकाने वाला नाम एनपीपी यानी नेशनल पीपुल्स पार्टी का है, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहली मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टी है।
बता दें कि देश में राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी का दर्जा उन दलों को मिलता है, जिन्होंने आम चुनावों में तीन अलग-अलग राज्यों में लोकसभा की कम से कम 2 फीसदी सीटें जीती हों, लोकसभा अथवा विधानसभा चुनावों में जिन्हें चार राज्यो में 6 फीसदी वोट मिले हों या फिर जिसे चार राज्यों में प्रादेशिक पार्टी का दर्जा हासिल हो।
कहने का आशय ये कि पार्टी का नाम शुद्ध हिंदी में हो तो भी उसे जनता का समर्थन मिले,जरूरी नहीं है। यहां तक कि हिंदी पट्टी में भी राजनीतिक दल का नाम हिंदी में ही रखने का कोई सियासी आग्रह नहीं है, यानी ‘नाम में क्या रखा है’ वाला अंदाज।
ऐसे में पुष्पम प्रिया चौधरी अंग्रेजी नाम, धाम और तेवर के साथ चुनाव मैदान में उतर रही है तो इसे 21 वीं सदी में हिंदी के साथ हो रहे या होने वाले सलूक के आईने में देखा जाना चाहिए। यह भी सही है कि हिंदी को शुद्धता के पवित्र बांध से रोकने की तमाम कोशिशें विफल ही रही हैं। लेकिन हिंदी है कि पहाड़ी नदी की माफिक बहती जा रही है।
राजनीतिक दलों के नामकरण में उसकी भूमिका तो उसका एक हिस्सा भर है। हकीकत यह भी है कि आज हिंदी के अंग्रेजीकरण का एक वैश्विक षड्यंत्र चल रहा है, और हम चाहे-अनचाहे उस जाल में फंसते चले जा रहे हैं। यह सवाल हमे बैचेन नहीं करता कि देश पर राज करने वाले दलों अथवा राजनीति में जिनकी अहम भूमिका है, वो पार्टियां भी अपने नाम हिंदी में रखना जरूरी नहीं समझती।
इनमें वो दल भी शामिल हैं, जिनका आधार उन राज्यों में है, जो अपने आप को ‘हिंदी भाषी’ कहते हैं। पुष्पम प्रिया ने नए जमाने के हिसाब से सियासी रंगमंच पर एंट्री तो धमाकेदार मारी है,लेकिन इससे बिहार की उस जनता, जो सपने देखने से ज्यादा समस्याओं का निदान चाहती है, के दिलों में घंटी कैसे बजेगी, यह देखने की बात है। जहां तक राहुल देव की बात है तो उनकी चिंता अपनी जगह है, लेकिन देश का राजनीतिक रिकाॅर्ड यही दर्शाता है कि संज्ञाओं के हिसाब से तो हिंदी के लिए अभी भी ज्यादा गुंजाइश नहीं है।
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