इस आंदोलन में नवीनता यही थी कि यह ‘ईंट का जवाब पत्थर’ से देने के बजाए ‘शूल का जवाब फूल’ से देने में यकीन रखता था
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देश की तत्कालीन कई दिग्गज हस्तियों ने विरोधस्वरूप अपनी पदवियां लौटाकर अंग्रेजी सत्ता के प्रति अपना मुखर विरोध दर्ज कराया। हालांकि ऐसे कुछ प्रयास आजादी के बाद भी अलग-अलग मुद्दों पर सत्ता का विरोध जताने के लिए हुए, लेकिन उसमें वो ताकत और ताब नहीं दिखी, जो असहयोग आंदोलन की ज्वाला में थी। क्योंकि वह केवल विदेशी सत्ता के खिलाफ वैचारिक विरोध ही नहीं था बल्कि गुलामी, शोषण और हर प्रकार के अत्याचार के खिलाफ भी था।
इस आंदोलन में नवीनता यही थी कि यह ‘ईंट का जवाब पत्थर’ से देने के बजाए ‘शूल का जवाब फूल’ से देने में यकीन रखता था। इसी आंदोलन ने उस स्वदेशी की भी बुनियाद को मजबूत किया, जिसे आज चीनी माल के बहिष्कार के रूप में अप्लाई किया जा रहा है। उसी दौरान इंग्लैंड में मशीन से बने कपड़े व अन्य वस्तुओं का बहिष्कार शुरू हुआ और उसकी जगह हाथ से बुनी खादी ने ले ली।
इसका असर इतना व्यापक था कि खादी महज एक वस्त्र से विचार और देशभक्ति के प्रतीक में तब्दील हो गई। कहते हैं कि काल अपना चक्र पूरा करता है। तारीखें भले बदल गई हों, ‘स्वशासन’ और ‘स्वदेशी’ जैसे शब्द नए हालात में अपनी प्रासंगिकता फिर खोज रहे हैं। फर्क इतना है कि गांधी ने तब ‘स्वशासन’ की बात की थी, आज ‘सुशासन’ की जा रही है।
हालांकि इन सौ सालों में देश ‘स्व’ और ‘सु’ के भावार्थ को ठीक से न तो समझ पाया है और न ही इसके अंतर को पाट सका है। यह भी विडंबना है कि 15 अगस्त 1947 को आजादी (स्वशासन) हासिल होने के बाद भी हमे ‘सुशासन’ की दुहाई बार-बार देनी पड़ रही है,क्योंकि वह अभी भी ‘मृग मरीचिका’ की तरह ही है।
दरअसल ‘स्वशासन’ को ‘सुशासन’ में बदलने के राजनीतिक प्रयोगों में बुनियादी नैतिक ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और पारदर्शिता चाहिए। गांधी के स्वशासन की परिकल्पना इन्हीं तत्वों पर आधारित थी। स्वतंत्रता की 74 वीं सालगिरह पर इस पर आत्मचिंतन जरूरी है कि क्या स्वशासन को सुशासन में रूपांतरित करने की वांछित ईमानदारी हम में है?
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