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म्यांमार सीमा: कंटीले तारों की बाड़ से बढ़ेगी समस्या? राज्य में उठ रही है विरोध की आवाज

सार

नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो का कहना है कि अगर सीमा पर बाड़ लगाना अनिवार्य है तो आम लोगों की समस्याओं को भी ध्यान में रखना होगा। सीमा के दोनों ओर नागा जनजाति के लोग रहते हैं।
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भारत म्यांमार बॉर्डर - फोटो : istock
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विस्तार
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पूर्वोत्तर के कई राज्यों और संगठनों के विरोध के बावजूद केंद्र सरकार ने म्यांमार से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के फैसले पर अडिग रहते हुए दोनों देशों के बीच जारी मुक्त आवाजाही समझौते को तत्काल प्रभाव से खत्म कर दिया है।

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केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा है कि मणिपुर में मोरे से लगी म्यांमार सीमा पर 10 किमी लंबी बाड़बंदी का काम पूरा हो गया है। बाकी 20 किमी इलाके में यह काम शीघ्र शुरू होगा। मुक्त आवाजाही समझौते यानी फ्री मूवमेंट रेजिम (एफएमआर) के तहत अब तक दोनों देशों यानी भारत और म्यांमार के नागरिक बिना पासपोर्ट और वीजा के महज एक परमिट के सहारे एक-दूसरे की सीमा में 16 किमी तक भीतर जाकर वहां दो सप्ताह तक रह सकते थे।

पूर्वोत्तर के चार राज्यों–अरुणाचल प्रदेश (520 किमी), नागालैंड (215 किमी), मणिपुर (398 किमी) औऱ मिजोरम (510 किमी)-की कुल 1643 किमी लंबी सीमा म्यांमार से लगी है। इसमें से 1,472 किमी लंबी सीमा की शिनाख्त का काम पूरा हो गया है। मुक्त आवाजाही समझौता खत्म होने के बाद सीमा पार से आने वाले लोगों के लिए भारत का वीजा लेना अनिवार्य होगा।

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सीमा विभाजन से बट गईं जनजातियां

बर्मा (अब म्यांमार) के भारत से अलग होने के बाद सीमा के विभाजन में गड़बड़ियों के कारण कई जनजातियां दो देशों की सीमा में बंट गईं। आजादी के बाद अलग-अलग देश में रहने के कारण एक ही जनजाति के लोगों के जीवन और रहन-सहन में आने वाली दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 26 सितंबर, 1950 को एक गजट अधिसूचना के जरिए पासपोर्ट नियमों में संशोधन करते हुए दोनों देशों के नागरिकों को बिना पासपोर्ट और वीजा के एक-दूसरे देश में 40 किमी भीतर तक आने की छूट दे दी।

इसके बाद अगस्त, 1968 में इसमें संशोधन करते हुए परमिट प्रणाली लागू की गई यानी दूसरे देश में जाने वालों को परमिट लेना पड़ता था। अस्सी और नब्बे के दशक में पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद तेज होने के कारण आवाजाही की सीमा 25 किमी से घटाकर 16 किमी कर दी गई।

इस मुद्दे पर कोई अधिकृत समझौता नहीं होने के कारण सरकार ने एक सहमति पत्र तैयार किया और 11 मई, 2018 को दोनों देशों में इस पर हस्ताक्षर कर इसे औपचारिक जामा पहनाया।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद सीमावर्ती इलाकों में म्यांमार की सेना और विद्रोही गुटों में हिंसक झड़पें बढ़ी हैं और इसका असर भारतीय इलाकों में भी पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, म्यांमार में जारी हिंसा के कारण कम से कम 20 लाख लोग विस्थापित हो चुके हैं। इसकी वजह से करीब 40 हजार लोगों और पुलिस व सैन्य अधिकारियों ने भाग कर पड़ोसी मिजोरम और मणिपुर में शरण ली है।

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भारत और म्यांमार - फोटो : ANI

बीते साल मई में मणिपुर में शुरू हुई हिंसा के पीछे भी म्यांमार से आने वाले उग्रवादियों और सशस्त्र गुटों को जिम्मेदार ठहराया गया है। दरअसल, पूर्वोत्तर के चार राज्यों की म्यांमार से लगी सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग एक ही जाति और संस्कृति के हैं। इसलिए सीमा पार से आने वाले लोग आसानी से स्थानीय आबादी में घुल-मिल जाते हैं। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह शुरू से ही इन लोगों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं।

केंद्र के इस फैसले का इलाके में काफी विरोध हो रहा है। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदूहोमा ने हाल में कहा था कि म्यांमार सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने का फैसला स्वीकार्य नहीं होगा। उन्होंने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश सचिव एस.जयशंकर से मुलाकात कर उनको भी अपने विचारों से अवगत कराया है।

विरोध की उठ रही है आवाज

लालदूहोमा की दलील है कि ब्रिटिश शासकों ने स्थानीय लोगों से सलाह-मशविरा किए बिना ही मिजोरम-म्यांमार सीमा थोप दी थी। सीमा के दोनों ओर रहने वाले मिजो-जो-चिन समुदाय के लोग इस सीमा को नहीं मानते। लालदूहोमा कहते हैं कि उनकी सरकार के पास केंद्र के इस फैसले को रोकने का अधिकार नहीं हैं। लेकिन वह इसका पुरजोर विरोध करेगी।

नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो का कहना है कि अगर सीमा पर बाड़ लगाना अनिवार्य है तो आम लोगों की समस्याओं को भी ध्यान में रखना होगा। सीमा के दोनों ओर नागा जनजाति के लोग रहते हैं।

मिजोरम और नागालैंड सरकार के अलावा नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन) के इसाक-मुइवा गुट ने भी केंद्र के इस फैसले का विरोध किया है। मिजोरम के सबसे ताकतवर सामाजिक संगठन यंग मिजो एसोसिएशन (आईएमए) के अलावा नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर के एक दर्जन से ज्यादा संगठन इस फैसले का विरोध कर रहे हैं।

मणिपुर के हिंसाग्रस्त चूड़ाचांदपुर जिले के सबसे प्रमुख आदिवासी संगठन इंडीजीनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने भी म्यांमार सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने और मुक्त आवाजाही समझौता रद्द करने के फैसले का विरोध किया है। उसने कहा है कि संगठन इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा।

राज्य का एक कुकी संगठन द कुकी इन्पी मणिपुर भी इस फैसले का विरोध कर रहा है। उसने कहा है कि सरकार का यह फैसला चिंताजनक और इससे इलाके की जटिल समस्याएं हल नहीं होंगी। संगठन ने केंद्र से इस फैसले पर पुनर्विचार की भी अपील की है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पूर्वोत्तर के चार राज्यों से म्यांमार की जो सीमा लगी है उसके दोनों ओर एक ही जनजाति के लोग रहते हैं और उनमें बेटी-रोटी का रिश्ता है। ऐसे में बाड़बंदी जैसा फैसला उन पर जबरन थोपने से पहले से ही तमाम समस्याओं से जूझ रहे पूर्वोत्तर इलाके में एक नया सिरदर्द पैदा हो सकता है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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