बीते साल मई में मणिपुर में शुरू हुई हिंसा के पीछे भी म्यांमार से आने वाले उग्रवादियों और सशस्त्र गुटों को जिम्मेदार ठहराया गया है। दरअसल, पूर्वोत्तर के चार राज्यों की म्यांमार से लगी सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग एक ही जाति और संस्कृति के हैं। इसलिए सीमा पार से आने वाले लोग आसानी से स्थानीय आबादी में घुल-मिल जाते हैं। मणिपुर के मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह शुरू से ही इन लोगों को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं।
केंद्र के इस फैसले का इलाके में काफी विरोध हो रहा है। मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदूहोमा ने हाल में कहा था कि म्यांमार सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने का फैसला स्वीकार्य नहीं होगा। उन्होंने दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश सचिव एस.जयशंकर से मुलाकात कर उनको भी अपने विचारों से अवगत कराया है।
विरोध की उठ रही है आवाज
लालदूहोमा की दलील है कि ब्रिटिश शासकों ने स्थानीय लोगों से सलाह-मशविरा किए बिना ही मिजोरम-म्यांमार सीमा थोप दी थी। सीमा के दोनों ओर रहने वाले मिजो-जो-चिन समुदाय के लोग इस सीमा को नहीं मानते। लालदूहोमा कहते हैं कि उनकी सरकार के पास केंद्र के इस फैसले को रोकने का अधिकार नहीं हैं। लेकिन वह इसका पुरजोर विरोध करेगी।
नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो का कहना है कि अगर सीमा पर बाड़ लगाना अनिवार्य है तो आम लोगों की समस्याओं को भी ध्यान में रखना होगा। सीमा के दोनों ओर नागा जनजाति के लोग रहते हैं।
मिजोरम और नागालैंड सरकार के अलावा नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नागालैंड (एनएससीएन) के इसाक-मुइवा गुट ने भी केंद्र के इस फैसले का विरोध किया है। मिजोरम के सबसे ताकतवर सामाजिक संगठन यंग मिजो एसोसिएशन (आईएमए) के अलावा नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर के एक दर्जन से ज्यादा संगठन इस फैसले का विरोध कर रहे हैं।
मणिपुर के हिंसाग्रस्त चूड़ाचांदपुर जिले के सबसे प्रमुख आदिवासी संगठन इंडीजीनस ट्राइबल लीडर्स फोरम ने भी म्यांमार सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने और मुक्त आवाजाही समझौता रद्द करने के फैसले का विरोध किया है। उसने कहा है कि संगठन इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा।
राज्य का एक कुकी संगठन द कुकी इन्पी मणिपुर भी इस फैसले का विरोध कर रहा है। उसने कहा है कि सरकार का यह फैसला चिंताजनक और इससे इलाके की जटिल समस्याएं हल नहीं होंगी। संगठन ने केंद्र से इस फैसले पर पुनर्विचार की भी अपील की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पूर्वोत्तर के चार राज्यों से म्यांमार की जो सीमा लगी है उसके दोनों ओर एक ही जनजाति के लोग रहते हैं और उनमें बेटी-रोटी का रिश्ता है। ऐसे में बाड़बंदी जैसा फैसला उन पर जबरन थोपने से पहले से ही तमाम समस्याओं से जूझ रहे पूर्वोत्तर इलाके में एक नया सिरदर्द पैदा हो सकता है।
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