फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पक्षियों की दुनिया: पश्चिमी तट पर किसानों और पक्षी प्रजातियों की अटूट दोस्ती

सार

गौरैया और नीलकंठ दोनों को सांस्कृतिक तौर से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका एक दुखद परिणाम है। अंधविश्वास की वजह से दशहरा के दौरान नीलकंठ को खेतों से पकड़ के कुछ अत्याचारी उनके परों को बेरहमी से काट कर छोटे से पिंजरों में कैद करते हैं।
विज्ञापन
- फोटो : सुभद्रा देवी
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

भारत देश में कृषि उत्पादन की पद्धतियों में आधुनिक विधियों का चलन बढ़ने लगा है। पक्षी खेतों में उन कीड़ों का दहन करते हैं जो फसल को खाकर उनका नाश करते हैं। पाया गया है कि पक्षी हमारे देश की कृषि प्रणालियों के लिए अतिमूल्य है। यह खेतों में कीड़े मकौड़ों की समस्या का हल बनकर, अनाज की रखवाली में किसानों की मदद करते हैं। भारत का पश्चिमी तट विभिन्न प्रजातियों का निवास है। इस लेख का उद्देश्य यहां के दो पक्षियों का कृषिकरण में महत्व का वर्णन करना और उनके संरक्षण के लिए जागरूकता जगाना है।

विज्ञापन


नीलकंठ पक्षी (कोरेशियस बैंगालेंसिस) कर्नाटक का राज्य पक्षी है। यह यहां के बांदीपुर राष्ट्रीय उपवन में पाए जाते हैं। यह न केवल दक्षिण भारत में, बल्कि उत्तर पूर्व और अन्य कई प्रांतों में भी कीटनाशक पक्षी के रूप से लोकप्रिय है। यह भृंग, दीमकों के झुंड व टिड्डों को खाते हैं और अपनी दर्शनीय हवाई प्रदर्शन और गति के लिए जाने जाते हैं जिनसे इनका नाम इंडियन रोलर बर्ड पडा है।

नीलकंठ पक्षी का बदन हल्के नीले रंग का होता है और उसकी गर्दन बैंगनी और नारंगी रंग की होती है। इस कारण से भगवान शिव का स्वरूप बोलकर इनके दर्शन को शुभ माना जाता है।
विज्ञापन


हमारी जानी पहचानी चिड़िया - घरेलू गौरैया (पैस्सर डोमेस्टिकस) का भी धान, कपास और मकई की खेती में अमूल्य योगदान होता है। इनके शिकार में आने वाले कीडों में कुछ हैं - कत्थई रंग का फुदका या ब्राऊन प्लांट हॉपर (नीलपर्वता लुगेन्स) और चावल का लीफरोलर (नफलोक्रोसिस मेडिनेलिस), कार्न इयरवर्म (हेलिकोवर्पा ज़ीया), कपास के बॉलवर्म (हेलिकोवर्पा आर्मिगेरा) इत्यादि।

गौरैया और नीलकंठ दोनों को सांस्कृतिक तौर से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका एक दुखद परिणाम है। अंधविश्वास की वजह से दशहरा के दौरान नीलकंठ को खेतों से पकड़ के कुछ अत्याचारी उनके परों को बेरहमी से काट कर छोटे से पिंजरों में कैद करते हैं।

विज्ञापन

- फोटो : सुभद्रा देवी
यह टिड्डी (लोकस्ट) के दुश्मन एवं किसानों के दोस्त होते हैं। 1958 से 1962 के बीच चीन की सरकार ने “फोर पेस्ट्स कैंपेन” के जरिए गौरैया का विनाश रचाया था। इसका नतीजा यह रहा कि टिड्डियों की संख्या असामान्य मात्रा में बढ़ गई और यह विश्व के सबसे भयानक अकाल का कारण बन गया। यह एक सबक है जो हमें वर्तमान में याद रखना चाहिए।

पिछले कई सालों से प्रदूषण के कारण गौरैया की संख्या का शहरी इलाकों में तेजी से घटन हुआ है। कर्नाटक में यह एक चिंता का विषय बनता जा रहा है।

इस कारण से कीटनाशक दवाइयों का उपयोग कृषि पारिस्थितिकी के लिए हानिकारक होता है। केमिकल उर्वरक और अत्यधिक मात्रा में इमारतों का निर्माण इन पक्षियों के रहने की जगहों को नष्ट कर रहे हैं। मानव और किसान होने का उचित उत्तरदायित्व संभालते हुए और मित्र का कर्तव्य निभाते हुए, हमें कृषिकरण के दृष्टिकोण में सही परिवर्तन लाने चाहिए।

 -------------------------------------
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें