सिंगापुर में इस होड़ के फलस्वरूप सिनेमा हाल की संख्या में वृद्धि हो रही थी, नए हाल के साथ पुराने हाल का रिनोवेशन हो रहा था। इम्प्रेस पैलेस का टाउन हाल विक्टोरिया थियेटर और कन्सर्ट हॉल बन गया। होटल मोडिफाई हो कर सिनेमा दिखाने के लिए तैयार किए जा रहे थे।
एडेल्फी हॉल एक-से-एक फिल्में जैसे ‘द चार्ज ऑफ लेन्सर्स’, ‘द सर्पेन्टाइन डॉन्स’, ‘ली हन्ग-चान्ग इन पेरिस’ दिखा रहा था जहां दर्शक को सामने की सीट के लिए एक डॉलर और पीछे की सीट के लिए 50 सेंट देने होते थे। अच्छी फिल्म और उच्च वर्ग के दर्शकों से अधिक पैसा वसूला जा रहा था। 1908 में ‘बेन हर’ फिल्म की टिकट राफल्स होटल ने 2 डॉलर की रखी थी, और दर्शक टूट कर देखने गए थे।
इन शुरुआती प्रदर्शनों की ओर लोग नवीनता के चलते खिंचे चले आ रहे थे। जल्द ही कमियां नजर आने लगीं। लगातार कांपती अस्थिर तस्वीरें, बीच-बीच में बड़े सफेद धब्बे लोगों को परेशान करने लगे जबकि उनसे सर्वाधिक मनोरंजन और अनुभव का वायदा किया जाता था। इन कमियों का मुख्य कारण तकनीक का पूरा विकसित न होना था लेकिन इसके साथ एक अन्य कारण भी था।
फिल्मों के प्रदर्शन में बाधाएं
प्रदर्शन के दौरान होने वाली इन बाधाओं का एक बड़ा कारण वहां का पर्यावरण था, ट्रोपिकल नमी भरा मौसम था। नमी की वजह से फिल्म चिपक जाती और चलाते समय एकसार तरीके से नहीं घूमती थी। दिखाने वालों ने इसकी भी काट निकाल ली। जब रील में बाधा आती, वे दर्शकों के अन्य मनोरंजन का प्रबंध पहले से तैयार रखते। धीरे-धीरे तकनीक में सुधार हुआ और फिल्म प्रदर्शन बिना व्यवधान के अधिक सुचारू रूप से होने लगा।
जल्द ही (1907) सिंगापुर इलाके के लिए फिल्म वितरण का केंद्र बन गया। इसके मुख्य संचालक फ्रांस के पाथे फ्रेरेस थे। सिंगापुर के बंदरगाह और समुद्र दृश्य नई डॉक्यूमेंट्री में निरंतर दिखने लगे। यहां तक कि फिल्म के पुरोधा जॉर्ज मेलिस ने भी एक डॉक्यूमेंट्री ‘ए डे एट सिंगापुर’ बनाई। ये वही मेलिस थे जिन्होंने 1902 में ही स्पेशल इफेक्ट का प्रयोग करने ‘ए ट्रिप टू द मून’ जैसी मील का पत्थर फिल्म बनाई थी। इन्हीं मेलिस को श्रद्धांजलि देते हुए मार्टिन स्कोरसेस ने ‘ह्यूगो’ फिल्म बनाई है। यदि अब तक नहीं देखी है तो मौका मिले तो यह फिल्म अवश्य देखें।
शुरुआत में जो फीचर फिल्में यहां बनीं उनमें सिंगापुर नाम के लिए ही था। न इन्हें सिंगापुर में फिल्माया जा रहा था और न ही इनमें सिंगापुर के कौन कहे, एशिया के अभिनेता काम कर रहे थे। ‘एक्रॉस टू सिंगापुर’, ‘साल ऑफ सिंगापुर’, द क्रिमसन सिटी’, द रोड टू सिंगापुर’, ‘आउट ऑफ सिंगापुर’, ‘मालाया नाइट्स’ (इसे ‘शैडोज ऑफ सिंगापुर’ के नाम से भी जाना जाता है) ऐसी ही फिल्में हैं। ये आज से सौ साल पहले 1923-1933 यानी दस साल के बीच बनी फिल्में हैं।
1933 में बनी फिल्म ‘समरंग’ एक सूडो-डॉक्यूमेंट्री है, जिसे शायद हॉलीवुड ने 1932 में पहले पहल पूरा-का-पूरा सिंगापुर में फिल्माया है। यह फिल्म कोटोन्ग बंदरगाह पर फिल्माई गई है। इसमें एक मोती गोताखोर की कहानी है जो स्थानीय प्रमुख की खूबसूरत बेटी के प्रेम में पड़ जाता है। यहां दर्शकों को लुभाने के लिए आदमखोर हैं, शार्क हैं और हैं अजगर। इसे यूनाइटेड आर्टिस्ट्स तथा बी. एफ. जैडमैन ने प्रड्यूस किया तथा वार्ड विंग ने निर्देशित किया है, इसका लेखन लोरी बैरा ने किया है।
सिंगापुर में बनी स्थानीय फिल्म ‘दि इमीग्रैंट’ है, 1934 में ‘लैला मजनू’ बनी। ‘दि इमीग्रैंट’ तथा ‘लैला मजनू’ में स्थानीय दृश्य नजर आते हैं। इनका निर्माण एशिया के लोगों ने किया यहां एशिया के अभिनेता हैं, आधिकारिक कहानी भी एशिया की है। इन फिल्मों ने पचास के दशक में मलाया फिल्मों उद्योग को पनपने में सहायता दी।
सिंगापुर सिने-इतिहास की आगे की कहानी फिर और कभी।
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