तीन साल की उम्र से शेक्सपियर पढ़ने वाला वेल्स दस साल की उम्र तक शेक्सपियर के सारे काम को हजम कर चुका था। उसने स्कूल में आठ नाटक न केवल निर्देशित किए, वरन उनमें भूमिकाएं भी कीं। निर्देशन के साथ-साथ उसी काम में भूमिका करना उसका शगल था। रेडियो ने उसे प्रसिद्धि के शिखर पर बैठा दिया। 30 अक्टूबर 1938 में रेडियो पर उसके एच. जी. वेल्स के ‘द वार ऑफ द वर्ल्ड्स’ ने पूरे अमेरिका को हिला कर रख दिया था। अपनी फिल्मों में भी वेल्स ने शेक्सपियर को अमर कर दिया है। बाद में बहुत सारे फिल्म निर्देशक– चाहे वे किसी भी भाषा में फिल्म बना रहे हों – जिन्होंने शेक्सपीयर को ले कर काम किया उन पर वेल्स का प्रभाव पड़ना-ही-पड़ना था।
जब उसने ‘सिटिजन केन’ फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया, वह इस क्षेत्र में अनाड़ी था। हॉलीवुड के कुलीनों के बीच वह बाहरी और अजनबी था, वे उससे अछूत की तरह व्यवहार करते। तीन फिल्म बनाने की बात हुई थी, लेकिन दो ठंडे बस्ते में चली गई और ऑर्सन वेल्स ने बनाई केवल ‘सिटिजन केन’। जिसके बिना सिने-अध्ययन-अध्यापन का कोई प्रशिक्षण पूरा नहीं हो सकता है। इसका यह मतलब नहीं है कि उसकी अन्य फिल्मों का महत्व कम है। ऑर्सन वेल्स ने 1941 में ‘सिटिजन केन’ बनाई। वह इस फिल्म का निर्देशक, प्रड्यूसर, सह-लेखक, एडीटर और प्रमुख अभिनेता सब कुछ है।
‘सिटीजन केन’ के अलावा ऑर्सन वेल्स ने ‘द थर्ड मैन’, ‘टच ऑफ इविल’, ‘चाइम्स एट मिडनाइट’, ‘ए मैन फॉर ऑल सीजन’, ‘द लेडी फ्रॉम सांघाई’, ‘एफ ऑर फेक’, ‘जेन एयर’, ‘द मैग्नीफिशेंट एमबेरसन्स’ जैसी तमाम फिल्में बनाईं। उसकी कई फिल्मों की नायिका एक समय सेक्स बम कहलाने वाली उसकी एक पत्नी रीटा हैवर्थ हुआ करती थी। ‘द लेडी फ्रॉम सांघाई’ में वही नायिका थी। उसकी ‘द ट्रेजडी ऑफ ओथेलो: द मूर ऑफ वेनिस’ तथा ‘द स्ट्रेंजर’ विशेष रूप से देखी जानी चाहिए।
स्वप्नदर्शी ऑर्सन वेल्स ने अपनी कई फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया पर भी फिल्में बनाई, जिनमें ‘फिल्मिंग द ट्रायल’, ‘फिल्मिंग ओथेलो’ प्रमुख हैं। इसी तरह उसने कई अन्य साहित्यिक कृतियों जैसे ‘मोबी डिक’, ‘कैच-22’ तथा ‘क्रैक इन द मिरर’ पर भी फिल्में बनाईं।
अपने जीवन के अंतिम दिनों तक ऑर्सन वेल्स काम में व्यस्त था। मरने के ठीक दो घंटे पहले उसने एक साक्षात्कार दिया। 10 अक्टूबर 1985 को हृदयगति रुकने से उसकी मृत्यु हुई। वह 37 फिल्म, ढ़ेर सारी स्क्रिप्ट, खूब सारी आउटलाइन छोड़ कर 70 साल की उम्र में गुजरा। मृत्यु ने एक बार फिर से उसे और उसके काम को चर्चा के केंद्र में ला दिया। आखिरी कुछ सालों में हॉलीवुड भी उस पर मेहरबान हो गया था।
1975 में उसे अमेरिकन फिल्म इंस्ट्यूट ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा। 1985 में उसे डायरेक्ट्स गिल्ड ऑफ एमेरिकाज का सर्वोच्च सम्मान, डी. ड्ब्ल्यू. ग्रिफिथ सम्मान दिया गया। ‘सिटिजन केन’. ‘मेग्नीफिसेंट एम्बरसन्स’, ‘टच ऑफ इविल’, ‘लेडी फ्रॉम शांघाई’, ‘मैकबेथ’, ‘ओथेलो’, ‘चाइम्स एट मिडनाइट’, ‘एफ फॉर फेक’, ‘द ट्रायल’, ‘दि इम्मोर्टल स्टोरी’ जैसी चमकदार, कलात्मक फिल्में ऑर्सन वेल्स की चमक को कभी धूमिल नहीं होने देंगी।
इतना सृजनात्मक कार्य कितने लोगों के रिकॉर्ड में होता है। बहुत कम कलाकारों का जीवन इतना प्रसिद्ध और समृद्ध होता है। वेल्स ने अपने जीवन में क्या नहीं किया। वह भी इतनी विपरीत परिस्थितियों में। काश उसे थोड़ा सकारात्मक वातावरण मिला होता तो वह और क्या-क्या कर पाता?
खैर, कयास लगाने से क्या फायदा, उसने जो किया है, उसे देखें, उसका मूल्यांकन करें, उसे सराहें। ऑर्सन वेल्स ने फिल्म जगत के लिए जितना किया, वह उसे अमर करने के लिए काफी है, उसकी प्रसिद्धि कभी धूमिल नहीं होगी।
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