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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: ऑर्सन वेल्स- शेक्सपियर का दीवाना

सार

तीन साल की उम्र से शेक्सपियर पढ़ने वाला वेल्स दस साल की उम्र तक शेक्सपियर के सारे काम को हजम कर चुका था। उसने स्कूल में आठ नाटक न केवल निर्देशित किए, वरन उनमें भूमिकाएं भी कीं। निर्देशन के साथ-साथ उसी काम में भूमिका करना उसका शगल था।
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ऑर्सन वेल्स - फोटो : Twitter
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विस्तार
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‘द ट्रायल’ को अपनी सर्वोत्तम फिल्म मानने वाले जॉर्ज ऑर्सन वेल्स का जन्म 6 मई 1915 को विस्कोनसिन के केनोशा में हुआ था। ऑर्सन के पिता का नाम रिचर्ड हेड वेल्स और माता का नाम बिट्रियस था। ऑर्सन वेल्स के परबाबा केनोशा के एक प्रमुख अटर्नी थे, उनके नाम से ही उसे ऑर्सन नाम मिला था। उसके बड़े भाई का नाम जॉर्ज था। ऑर्सन के पिता ने बाइसिकिल लैंप बना कर काफी धन कमाया था। पर धन सब कुछ नहीं होता है, धन पारिवारिक सुख-शांति की गारंटी नहीं देता है। अक्सर यह मुसीबतों को साथ लाता है।

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भौतिक समृद्धि के बावजूद वेल्स का बचपन बहुत दु:खी था। जब वह मात्र चार साल का था, 1919 में उसके माता-पिता का विवाह-विच्छेद हो गया और वे शिकागो चले गए। पिता शराबी हो गया, मां पियानोवादक थी सो वह आर्ट इंस्ट्यूट ऑफ शिकागो में डडले क्राफ्ट्स वाट्सन के लेक्चर के समय पियानो बजा कर अपना और अपने बेटे का पालन-पोषण करने लगी। ऑर्सन का बड़ा भाई बहुत पहले ही अधिगम की कठिनाई के कारण मानसिक अस्पताल में भर्ती था। लेकिन ऑर्सन की परेशानियां अभी समाप्त नहीं हुई थीं। अभी उसका नौंवा जन्मदिन ही मना था कि उसकी मां मात्र 42 वर्ष की उम्र में हेपेटाइटिस से ग्रस्त हो कर शिकागो अस्पताल में 10 मई 1924 को गुजर गई। बच्चे के जीवन से मां का जाना क्या असर डालता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है। 


''मैं जब मर जाऊंगा तब वे मुझे प्यार करेंगे''

अमेरिका, फ्रांस, इटली, मैक्सिको में शूटिंग करने वाले, निर्देशक, प्रड्यूसर, सह-लेखक और प्रमुख अभिनेता ऑर्सन वेल्स अपने अंतिम दिनों में कडुआहट और नि:संग भाव के मिश्रण के साथ अक्सर कहा करता था, ‘गॉड, मैं जब मर जाऊंगा तब वे मुझे प्यार करेंगे।’ उसने इसके बारे में अपने दोस्त और फिल्म निर्देशक हेनरी जगलोम से कहा था कि बस मेरे मरने का इंतजार करो। सब कुछ होगा। जिस कहानी से मेरा जरा-सा भी संबंध है, उसे भी सब खोद निकालेंगे। मेरे जीवन के बारे में कहानियां गढ़ेंगे, और यह सब कुछ बिकाऊ होगा। और ऐसा ही हुआ। 

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महानता के साथ अक्सर मिथक जुड़ जाते हैं, और वेल्स के साथ ऐसा हुआ भी, उसके साथ कई मिथक जुड़ते गए। उसके आलोचकों की कमी न थी। वैसे उसके जीवित रहते भी उसे प्यार करने वालों की, उसकी और उसके काम की प्रशंसा करने वालों की भी कमी न थी। फ्रेंच फिल्म सिद्धांतकार आंद्रे बाजां उनमें से एक था।

फिल्म निर्देशक की होती है, मानने वाले प्रसिद्ध आलोचक और फिल्म सिद्धांतकार आंद्रे बाजां का कहना है कि इसमें कोई शक नहीं, यदि वेल्स ने केवल दो फिल्में- ‘सिटीजन केन’ और ‘द मैग्नीफिसेंट एम्बरसन्स’ बनाई होती तो भी सिनेमा के इतिहास में ऑर्सन वेल्स का महत्वपूर्ण स्थान होता। उसकी फिल्मों में ये दो फिल्में एक बड़ा दृश्य रचती हैं, जिनका साथ-साथ अध्ययन किया जाना आवश्यक है।
 

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Orson Welles
तीन साल की उम्र से शेक्सपियर पढ़ने वाला वेल्स दस साल की उम्र तक शेक्सपियर के सारे काम को हजम कर चुका था। उसने स्कूल में आठ नाटक न केवल निर्देशित किए, वरन उनमें भूमिकाएं भी कीं। निर्देशन के साथ-साथ उसी काम में भूमिका करना उसका शगल था। रेडियो ने उसे प्रसिद्धि के शिखर पर बैठा दिया। 30 अक्टूबर 1938 में रेडियो पर उसके एच. जी. वेल्स के ‘द वार ऑफ द वर्ल्ड्स’ ने पूरे अमेरिका को हिला कर रख दिया था। अपनी फिल्मों में भी वेल्स ने शेक्सपियर को अमर कर दिया है। बाद में बहुत सारे फिल्म निर्देशक– चाहे वे किसी भी भाषा में फिल्म बना रहे हों – जिन्होंने शेक्सपीयर को ले कर काम किया उन पर वेल्स का प्रभाव पड़ना-ही-पड़ना था।

जब उसने ‘सिटिजन केन’ फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया, वह इस क्षेत्र में अनाड़ी था। हॉलीवुड के कुलीनों के बीच वह बाहरी और अजनबी था, वे उससे अछूत की तरह व्यवहार करते। तीन फिल्म बनाने की बात हुई थी, लेकिन दो ठंडे बस्ते में चली गई और ऑर्सन वेल्स ने बनाई केवल ‘सिटिजन केन’। जिसके बिना सिने-अध्ययन-अध्यापन का कोई प्रशिक्षण पूरा नहीं हो सकता है। इसका यह मतलब नहीं है कि उसकी अन्य फिल्मों का महत्व कम है। ऑर्सन वेल्स ने 1941 में ‘सिटिजन केन’ बनाई। वह इस फिल्म का निर्देशक, प्रड्यूसर, सह-लेखक, एडीटर और प्रमुख अभिनेता सब कुछ है।

‘सिटीजन केन’ के अलावा ऑर्सन वेल्स ने ‘द थर्ड मैन’, ‘टच ऑफ इविल’, ‘चाइम्स एट मिडनाइट’, ‘ए मैन फॉर ऑल सीजन’, ‘द लेडी फ्रॉम सांघाई’, ‘एफ ऑर फेक’, ‘जेन एयर’, ‘द मैग्नीफिशेंट एमबेरसन्स’ जैसी तमाम फिल्में बनाईं। उसकी कई फिल्मों की नायिका एक समय सेक्स बम कहलाने वाली उसकी एक पत्नी रीटा हैवर्थ हुआ करती थी। ‘द लेडी फ्रॉम सांघाई’ में वही नायिका थी। उसकी ‘द ट्रेजडी ऑफ ओथेलो: द मूर ऑफ वेनिस’ तथा ‘द स्ट्रेंजर’ विशेष रूप से देखी जानी चाहिए।

स्वप्नदर्शी ऑर्सन वेल्स ने अपनी कई फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया पर भी फिल्में बनाई, जिनमें ‘फिल्मिंग द ट्रायल’, ‘फिल्मिंग ओथेलो’ प्रमुख हैं। इसी तरह उसने कई अन्य साहित्यिक कृतियों जैसे ‘मोबी डिक’, ‘कैच-22’ तथा ‘क्रैक इन द मिरर’ पर भी फिल्में बनाईं।

अपने जीवन के अंतिम दिनों तक ऑर्सन वेल्स काम में व्यस्त था। मरने के ठीक दो घंटे पहले उसने एक साक्षात्कार दिया। 10 अक्टूबर 1985 को हृदयगति रुकने से उसकी मृत्यु हुई। वह 37 फिल्म, ढ़ेर सारी स्क्रिप्ट, खूब सारी आउटलाइन छोड़ कर 70 साल की उम्र में गुजरा। मृत्यु ने एक बार फिर से उसे और उसके काम को चर्चा के केंद्र में ला दिया। आखिरी कुछ सालों में हॉलीवुड भी उस पर मेहरबान हो गया था।

1975 में उसे अमेरिकन फिल्म इंस्ट्यूट ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से नवाजा। 1985 में उसे डायरेक्ट्स गिल्ड ऑफ एमेरिकाज का सर्वोच्च सम्मान, डी. ड्ब्ल्यू. ग्रिफिथ सम्मान दिया गया। ‘सिटिजन केन’. ‘मेग्नीफिसेंट एम्बरसन्स’, ‘टच ऑफ इविल’, ‘लेडी फ्रॉम शांघाई’, ‘मैकबेथ’, ‘ओथेलो’, ‘चाइम्स एट  मिडनाइट’, ‘एफ फॉर फेक’, ‘द ट्रायल’, ‘दि इम्मोर्टल स्टोरी’ जैसी चमकदार, कलात्मक फिल्में ऑर्सन वेल्स की चमक को कभी धूमिल नहीं होने देंगी। 

इतना सृजनात्मक कार्य कितने लोगों के रिकॉर्ड में होता है। बहुत कम कलाकारों का जीवन इतना प्रसिद्ध और समृद्ध होता है। वेल्स ने अपने जीवन में क्या नहीं किया। वह भी इतनी विपरीत परिस्थितियों में। काश उसे थोड़ा सकारात्मक वातावरण मिला होता तो वह और क्या-क्या कर पाता? 

खैर, कयास लगाने से क्या फायदा, उसने जो किया है, उसे देखें, उसका मूल्यांकन करें, उसे सराहें। ऑर्सन वेल्स ने फिल्म जगत के लिए जितना किया, वह उसे अमर करने के लिए काफी है, उसकी प्रसिद्धि कभी धूमिल नहीं होगी।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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