World Press Freedom Index 2023
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स्थानीय पत्रकारिता हमेशा से रही है उपेक्षित
प्रेस की स्वतंत्रता से क्षेत्रीय पत्रकारिता पर पड़ रहे असर पर नोएडा में रहने वाले प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार सारंग उपाध्याय कहते हैं कि क्षेत्रीय पत्रकारिता पहले से ही उपेक्षित रही है। दिल्ली को छींक आ जाए तो देश को जुकाम और बुखार हो जाता है लेकिन ग्राम, देहात और बाकी देश, मीडिया में हैं ही नहीं। यही नहीं अब तो मुम्बई सहित देश के कई बड़े महानगर भी राष्ट्रीय मीडिया से बाहर होते जा रहे हैं।
प्रेस की स्वतंत्रता, स्थानीय पत्रकारिता और इसकी मजबूती पर 'जनज्वार' समाचार वेब पोर्टल के सम्पादक अजय प्रकाश से बात की गई तो उन्होंने बताया कि स्थानीय पत्रकारिता हमेशा से हाशिए पर ही रही है। उसकी वजह यह है कि स्थानीय समाज से ही देश चलता है।
देश में नीतियों का अमल होना या न होना, इसकी सच्चाई गांव और उसके आसपास के इलाकों से ही पता चलती है। जब दिल्ली या राज्यों की राजधानियों से सरकारें घोषणा करती हैं कि हम इतने लाख करोड़ की योजनाएं लाए हैं, तब उनका सच हर रोज सौ या पचास रुपये में जीने वालों के जरिए उजागर होता है।
जब भ्र्ष्टाचार थोड़ा कम था तब भी कहा जाता था कि विकास के लिए आने वाले एक रुपये में अस्सी पैसा रास्ते में रह जाता है। अब तो कमीशनखोरी बहुत बढ़ गई है। कर्नाटक में चुनाव हो रहा है, वहां कहा जाता है चालीस फीसदी की सरकार। मतलब कोई भी काम कराना है तो चालीस फीसदी सरकार लेगी।
सच दिखाने वाले दबा दिए जाते हैं
अब सवाल यह है कि इनका सच बताना, जाहिर तौर पर वह पत्रकार ही बताएगा। स्थानीय पत्रकार इतना कमजोर होता है कि उसको सिस्टम में जगह तब मिलेगी जब वह सत्ता में बैठे लोगों या बड़े पदों में बैठे लोगों की जी हजूरी करेगा, उनके पक्ष में खबरें छपेगा। मेरे दो दशक के पत्रकारिता अनुभव बताते हैं कि जिन भी पत्रकारों ने स्थानीय स्तर पर सही और सच मुद्दे उठाने की कोशिश की, उन्हें दबाया ही गया है। इसीलिए ऐसा होता है कि जब स्थानीय पत्रकार बड़ा मुद्दा उठाते हैं, उन्हें कोई नहीं पूछता पर दिल्ली बैठा पत्रकार जब उसी मुद्दे को उठाता है तो वह बड़ा मुद्दा बन जाता है।
क्या हम स्थानीय स्तर पर पत्रकार बन सकते हैं, हां बन सकते हैं और ऐसी हजारों कोशिशें हुई हैं। स्थानीय और ईमानदार लोगों ने नौकरियों को छोड़कर पहले अखबार निकाले हैं और चंदे से भी निकाले हैं। अब भी समाचार वेब पोर्टल, यूट्यूब चैनल निकाले जा रहे हैं पर सत्ता संरचना इतनी बड़ी और पैसे वाली है कि ऐसे पत्रकार उसमें फिट नहीं बैठ पाते।
इसका उपाय क्या है इस पर भी सोचना चाहिए। देश की राजनीति जैसी चलती है, वहां की जनता वैसी होता है। अगर राजनीति भ्रष्ट है, तो जनता भी भ्रष्ट होगी। इसलिए लोग स्थानीय राजनीति में भी मुद्दों पर कभी वोट नहीं देते। मुद्दों वाली पत्रकारिता इसलिए हाशिए पर है और वह तब तक हाशिए पर रहेगी जब तक राजनीति में मुद्दों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी।
आप देखते हैं स्थानीय स्तर पर वही युट्यूबर सफल हैं, जो राजनीति से जुड़ी खबरों को नहीं छूते या सत्ता या विपक्ष किसी एक से जुड़ी खबरें दिखाते हैं। वह पत्रकार नहीं पार्टी प्रवक्ता होते हैं और दिल्ली से देहात तक यही स्थिति है।
अगर इस देश में राजनीति, धर्म-जाति के नाम पर होगी। चाहे वह पक्ष द्वारा हो या विपक्ष के द्वारा, तो पत्रकारिता भी इसी के आसपास होगी। मेरा मानना है कि यह इस देश का बदलाव का दौर है, अभी इसमें एक दशक लगेगा। इसके बाद ही पत्रकारिता मजबूत होगी।
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