सत्तर के दशक की फिल्में
सत्तर के दशक में नॉर्वे में राजनैतिक विचारों की कई फिल्म बनीं। ‘स्ट्राइक’ (1974), ‘द साइलेंट मेजोरिटी’ (1977), ‘वाइव्स ट्रिलॉजी’ (1975, 1085, 1996) ऐसी ही फिल्में हैं। 16 मिनट की फिल्म ‘दैट फैन्सी फरकोट ऑफ योर्स’ (1977) एक विवादास्पद लघु फिल्म नॉर्वे में बनीं। लेकिन अगले दशक में हॉलीवुड की फिल्मों का बोलबाला हो गया और नॉर्वे की फिल्मों का बाजार नीचे गिरने लगा। वैसे 1980 में ‘ला एल्व लेवे’ नाम से 110 मिनट की फिल्म नदी बचाने की योजना और उससे संबंधित हड़ताल पर आधारित है। इसे विवादास्पद निर्देशक ब्रेडो ग्रेव ने बनाया है।
जल्द ही नॉर्वे इस बुरी स्थिति से उबरा और नब्बे के दशक में इसने खुद को फिर से स्थापित किया। अनी सदी में यूरोप के एक गरीबतम देश से यह एक सबसे अमीर देश के रूप में उभरा। जाहिर है इसका प्रभाव फिल्मों पर पड़ा। 1994 में द नॉर्वेजियन फिल्म स्कूल खुला था और उसने देश के सिनेमा में नई जान फूंकी थी।
2001 में नॉर्वेजियन फिल्म फंड की स्थापना ने नॉर्वे की फिल्मों को हॉलीवुड से टक्कर लेने में काफी मदद की। 2008 में नॉर्वेजियन फिल्म संस्थान, नॉर्वेजियन फिल्म डेवलेपमेंट और नॉर्वेजियन फिल्म कमीशन को एकीकृत कर नॉर्वेजियन फिल्म इंस्टट्यूट नाम दिया गया। आर्काइव को लाइब्रेरी से जोड़ कर फिल्मों के संरक्षण तथा मरम्मत का काम प्रारंभ हुआ।
1897 में ‘इनसोमनिया’ नाम से 96 मिनट की क्राइम, मिस्ट्री थ्रिलर एरिक सोब्यानी ने बनाया। यह नींद से वंचित व्यक्ति की कहानी है जो हत्यारे के पीछे जाकर स्वयं तमाम गुनाह करता है। एक सूत्र के अनुसार क्रिस्टोफर नोलान ने अपनी फिल्म ‘मेमेन्टो’ इसी से प्रेरित हो कर बनाई थी। हिन्दी एवं तमिल फिल्म ‘गजनी’ नोलान से प्रभावित है।
2001 की फिल्म ‘एलिंग’ एक संवेदनशील कवि से जुड़ी है। चालीस साल उसकी मां उसकी देखभाल करती है। मां के मरने के बाद उसके जीवन की उथल-पुथल को फिल्म दिखाती है। पीटर नीस निर्देशित इस फिल्म में संवेदनशील व्यक्ति के जीवन की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। फिल्म को 14 पुरस्कार मिले। साथ ही ऑस्कर केलिए नामांकन भी मिला। 2003 में नॉर्वे में ‘किचेन स्टोरीज’ बनी। बेन्ट हैमर की यह फिल्म एक एकाकी व्यक्ति की किचेन आदतों पर ध्यान केंद्रित करती है। नॉर्वे के सांस्कृतिक अध्ययन की सामग्री प्रदान करती है।
फिल्म ‘द बोदरसम मैन’
2006 की फिल्म ‘द बोदरसम मैन’ (निर्देशक जेन्स लिएन) एक शहर के आराम से रह रहे लोगों से एक अजनबी के प्रश्न पूछने से होने वाली मजेदार हलचल को दिखाती है। 2008 की एरिक पोपे की फिल्म ‘ट्रबल्ड वाटर’ 15 मिनट में एक व्यक्ति अपनी किशोरावस्था में एक बच्चे की हत्या के आरोप में जेल गया है। वह पैरोल पर छूटता है और अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरु करने की जद्दोजहद में है, लेकिन उसका अतीत आड़े आता है।
2010 की ‘ट्रोल हंटर’ में निर्देशक एंड्रे ओव्रेडाल छात्रों द्वारा भालू की रहस्यमय हत्या की खोज की फिल्म है। इस हॉरर फिल्म के अंत में वे ट्रोल हंटर को खोज निकालते हैं।
इस तरह हम देख सकते हैं, नॉर्वे ने अपने सिने-इतिहास में खूब सारी फिल्में बनाई हैं, जिनका विश्व के सिने-जगत में स्वागत हुआ है। सांस्कृतिक दृष्टि से नॉर्वे के अधिकांश लोगों का जीवन एकाकी है, जिसकी अपनी दुश्वारियां हैं। आज नॉर्वे अपनी फिल्मों को डिजिटल संस्करण में परिवर्तित कर रहा है, जिसके लिए उसे हॉलीवुड के प्रमुख स्टूडियो से सहायता मिल रही है।
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