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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: नॉर्वे- विशिष्ट संस्कृति का सिने इतिहास

सार

पचास का दशक नॉर्वे के सिनेमा का स्वर्णकाल रहा। 1950 में मानवशास्त्री थोर हायर्डाल ने ‘कोन-टिकी’ नाम से डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसमें उसकी प्रसिद्ध पेसेफिक राफ्ट यात्रा को फिल्माया गया है। यह नॉर्वे की एकमात्र अकादमी पुरस्कृत डॉक्यूमेंट्री है।
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नार्वे सिनेमा - फोटो : iStock
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विस्तार
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नॉर्वे नॉर्वेजियन समुद्र तट पर बसा एक छोटा-सा देश है। यह नोर्डिक देश उत्तरी यूरोप में स्कैंडनेवियन प्रायद्वीप पर स्थित है। इस देश ने बहुत पहले फिल्म बनानी प्रारंभ कर दी थी। 1905 में स्वीडन से स्वतंत्र होते ही यहां पहली फीचर फिल्म 1906 में ‘डेंजर्स ऑफ ए फिशरमैन’स लाइफ’ रिलीज हुई। इसके बाद नॉर्वे के सिनेमा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा, मनोरंजन के साधन के रूप में सदैव प्रगति करता गया। भले ही मात्रा में पड़ोसी डेनमार्क तथा स्वीडन से कम फिल्म बनाता है, मगर इसकी परम्परागत और सांस्कृतिक एक खास  खुशबू है। यहां अधिकतर साहित्यिक अवदान पर आधारित फिल्में बनती हैं। 1940 के नाजी काल में यहां हल्की-फुल्की कॉमेडी बनती रहीं।

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ह्यूगो हेरमनसेन द्वारा निर्देशित शॉर्ट-ड्रामा फिल्म ‘डेंजर्स ऑफ ए फिशरमैन’स लाइफ’ एक मछुआरे के खतरों भरे जीवन को दिखाती है। आज यह फिल्म उपलब्ध नहीं है। इसमें अल्मा लुंड तथा हेनरी हैगरअप ने अभिनय किया था। 1922 में हैराल्ड वेनजेन ने ‘पैन’ नामक फिल्म बनाई जो एक शिकारी तथा पूर्व सैनिक लेफ्टिनेंट थॉमस ग्लैन की जीवन को दिखाती है।

96 मिनट की फिल्म थॉमस को अपने स्वामीभक्त कुत्ते के साथ अकेले शिकार करते चित्रित करती है। इसी जोखिम भरी यात्रा के दौरान थॉमस व्यापारी की बेटी एडवर्डा से मिलता है। वे एक-दूसरे के प्रति आकर्षित हैं, पर एक-दूसरे के प्यार को समझ नहीं पाते हैं। 

क्नूत हाम्सुन की रचनाओं पर बनी फिल्में

नॉर्वे के चार लेखकों को अब तक नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। क्नूत हाम्सुन (1920) उनमें से एक हैं। इन्हीं क्नूत हाम्सुन की कृति पर यह फिल्म ‘पैन’ बनी है, जिसमें हैल्मर फ्राइस, हैन्स बिले रॉल्फ क्रिस्टनसेन आदि ने भूमिकाएं की हैं। क्नूत हाम्सुन की कई कृतियों पर फिल्म बनी हैं। 1922 में ही उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘हंगर’ पर हेनी कार्लसेन ने इसी नाम से फिल्म बनाई जिसमें एक भूखा और संवेदनशील लेखक तमाम तरह की कठिनाइयां झेलता है। इसी नाम से 2001 में मारिया गीज ने भी फिल्म बनाई जिसमें उन्होंने लेखक को होलीवुड का स्क्रीनप्ले राइटर बना कर उसे अमेरिका में स्थापित किया है।

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1927 में एक मिस्ट्री-ड्रामा फिल्म ‘ट्रोल-एलेन’ में वॉल्टर फार्स्ट ने मूस (एक प्रकार का बड़ा हिरण) के बच्चे को दिखाया है, जो अपनी मां के न रहने पर बछड़े जैसा व्यवहार करता है। शिकारी उसे नहीं मारते हैं, पर एक शिकारी उसके पीछे पड़ा है। इस जानवर के साथ तमाम कहानियां शुरू होती हैं।

पचास का दशक नॉर्वे के सिनेमा का स्वर्णकाल रहा। 1950 में मानवशास्त्री थोर हायर्डाल ने ‘कोन-टिकी’ नाम से डॉक्यूमेंट्री बनाई, जिसमें उसकी प्रसिद्ध पेसेफिक राफ्ट यात्रा को फिल्माया गया है। यह नॉर्वे की एकमात्र अकादमी पुरस्कृत डॉक्यूमेंट्री है।

‘वेस्लेफ्रिक मेड फेला’ (1851) मात्र 18 मिनट की एनीमेशन फिल्म है जो एक गरीब मगर उत्साहित लड़के को चित्रित करती है जो बेफिक्री के साथ अपनी सारंगी बजाता रहता है। यह एक 1957 में अर्ने स्कौसेन ने ‘नाइन लाइव्स’ बनाई। इस नाम से कई देशों में अलग-अलग साल में फिल्म बनी है।

स्कौसेन की फिल्म में द्वितीय विश्वयुद्ध के समय नॉर्वेजियन प्रतिरोध दस्ते के नौ सदस्य जर्मनों के साथ भयंकर लड़ाई में फंस जाते हैं। उनमें से केवल एक बच निकलता है और बर्फीले रेगिस्तान में मार गिराने केलिए उसका पीछा शुरू होता है। दो साल बाद एडिथ केल्मर ने बनाई ‘द वेवार्ड गर्ल’। सवा घंटे की इस फिल्म में एक सौतेली मां लड़की को हत्या केलिए फ्रेम करती है और आरोपी लड़की पेरोल रैकेट चलाने लगती है।

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विश्व सिनेमा - फोटो : istock

सत्तर के दशक की फिल्में

सत्तर के दशक में नॉर्वे में राजनैतिक विचारों की कई फिल्म बनीं। ‘स्ट्राइक’ (1974), ‘द साइलेंट मेजोरिटी’ (1977), ‘वाइव्स ट्रिलॉजी’ (1975, 1085, 1996) ऐसी ही फिल्में हैं। 16 मिनट की फिल्म ‘दैट फैन्सी फरकोट ऑफ योर्स’ (1977) एक विवादास्पद लघु फिल्म नॉर्वे में बनीं। लेकिन अगले दशक में हॉलीवुड की फिल्मों का बोलबाला हो गया और नॉर्वे की फिल्मों का बाजार नीचे गिरने लगा। वैसे 1980 में ‘ला एल्व लेवे’ नाम से 110 मिनट की फिल्म नदी बचाने की योजना और उससे संबंधित हड़ताल पर आधारित है। इसे विवादास्पद निर्देशक ब्रेडो ग्रेव ने बनाया है।

जल्द ही नॉर्वे इस बुरी स्थिति से उबरा और नब्बे के दशक में इसने खुद को फिर से स्थापित किया। अनी सदी में यूरोप के एक गरीबतम देश से यह एक सबसे अमीर देश के रूप में उभरा। जाहिर है इसका प्रभाव फिल्मों पर पड़ा। 1994 में द नॉर्वेजियन फिल्म स्कूल खुला था और उसने देश के सिनेमा में नई जान फूंकी थी।

2001 में नॉर्वेजियन फिल्म फंड की स्थापना ने नॉर्वे की फिल्मों को हॉलीवुड से टक्कर लेने में काफी मदद की। 2008 में नॉर्वेजियन फिल्म संस्थान, नॉर्वेजियन फिल्म डेवलेपमेंट और नॉर्वेजियन फिल्म कमीशन को एकीकृत कर नॉर्वेजियन फिल्म इंस्टट्यूट नाम दिया गया। आर्काइव को लाइब्रेरी से जोड़ कर फिल्मों के संरक्षण तथा मरम्मत का काम प्रारंभ हुआ।

1897 में ‘इनसोमनिया’ नाम से 96 मिनट की क्राइम, मिस्ट्री थ्रिलर एरिक सोब्यानी ने बनाया। यह नींद से वंचित व्यक्ति की कहानी है जो हत्यारे के पीछे जाकर स्वयं तमाम गुनाह करता है। एक सूत्र के अनुसार क्रिस्टोफर नोलान ने अपनी फिल्म ‘मेमेन्टो’ इसी से प्रेरित हो कर बनाई थी। हिन्दी एवं तमिल फिल्म ‘गजनी’ नोलान से प्रभावित है।

2001 की फिल्म ‘एलिंग’ एक संवेदनशील कवि से जुड़ी है। चालीस साल उसकी मां उसकी देखभाल करती है। मां के मरने के बाद उसके जीवन की उथल-पुथल को फिल्म दिखाती है। पीटर नीस निर्देशित इस फिल्म में संवेदनशील व्यक्ति के जीवन की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। फिल्म को 14 पुरस्कार मिले। साथ ही ऑस्कर केलिए नामांकन भी मिला। 2003 में नॉर्वे में ‘किचेन स्टोरीज’ बनी। बेन्ट हैमर की यह फिल्म एक एकाकी व्यक्ति की किचेन आदतों पर ध्यान केंद्रित करती है। नॉर्वे के सांस्कृतिक अध्ययन की सामग्री प्रदान करती है। 

फिल्म ‘द बोदरसम मैन’

2006 की फिल्म ‘द बोदरसम मैन’ (निर्देशक जेन्स लिएन) एक शहर के आराम से रह रहे लोगों से एक अजनबी के प्रश्न पूछने से होने वाली मजेदार हलचल को दिखाती है। 2008 की एरिक पोपे की फिल्म ‘ट्रबल्ड वाटर’ 15 मिनट में एक व्यक्ति अपनी किशोरावस्था में एक बच्चे की हत्या के आरोप में जेल गया है। वह पैरोल पर छूटता है और अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरु करने की जद्दोजहद में है, लेकिन उसका अतीत आड़े आता है।

2010 की ‘ट्रोल हंटर’ में निर्देशक एंड्रे ओव्रेडाल छात्रों द्वारा भालू की रहस्यमय हत्या की खोज की फिल्म है। इस हॉरर फिल्म के अंत में वे ट्रोल हंटर को खोज निकालते हैं।

इस तरह हम देख सकते हैं, नॉर्वे ने अपने सिने-इतिहास में खूब सारी फिल्में बनाई हैं, जिनका विश्व के सिने-जगत में स्वागत हुआ है। सांस्कृतिक दृष्टि से नॉर्वे के अधिकांश लोगों का जीवन एकाकी है, जिसकी अपनी दुश्वारियां हैं। आज नॉर्वे अपनी फिल्मों को डिजिटल संस्करण में परिवर्तित कर रहा है, जिसके लिए उसे हॉलीवुड के प्रमुख स्टूडियो से सहायता मिल रही है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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