फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: गणतंत्र दिवस और भारतीय फिल्में

सार

26 जनवरी को हम सभी गणतंत्र दिवस, उल्लास पर्व के रूप में मनाते हैं। इस अवसर पर भारतीय फिल्मों पर आइए एक नजर डालें और देखें उनमें स्वतंत्रता और स्वतंत्रता-संघर्ष का, स्वतंत्रता आंदोलन का चित्रण कैसा हुआ है?
विज्ञापन
फिल्म ‘द लेजेंड्स ऑफ़ भगत सिंह’ का दृश्य - फोटो : Twitter
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

काफी संघर्ष, आत्म-बलिदान और तपस्या के बल पर 15 अगस्त 1947 को हम आजाद हुए। जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। 26 जनवरी को हम गणतंत्र दिवस, उल्लास पर्व के रूप में मनाते हैं। इस अवसर पर भारतीय फिल्मों पर एक नजर डालें और देखें उनमें स्वतंत्रता और स्वतंत्रता-संघर्ष का, स्वतंत्रता आंदोलन का चित्रण कैसा हुआ है? किन अभिनेताओं, निर्देशकों, गीतों ने इस इतिहास को परदे पर मूर्तिमान किया है।

हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में इस मुद्दे को केंद्र में रखकर कई फिल्में बनी हैं। राष्ट्रीय त्योहारों पर चारों ओर से राष्ट्रगान के साथ देशप्रेम, राष्ट्रप्रेम के गीत ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के...’,  ‘मेरे देश की धरती...’, ‘यह देश है वीर जवानों का...’, ‘है प्रीत जहां की रीत सदा...’, ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...’ हम सुनते हैं। 

विज्ञापन

ये हमें आत्म-गौरव से परिचित कराते, शहीदों का स्मरण कराते हैं। देश-प्रेम का पर्याय बन गई थी अभिनेता-निर्देशक मनोज कुमार (हरिकृष्ण गोस्वामी) की, अपनी शैली की प्रथम फिल्म ‘पूरब-पश्चिम’। इसका गीत ‘है प्रीत जहां की रीत सदा...’ गीत गणतंत्र दिवस हर बार पर बजता सुनाई देता है। 

मोहम्मद रफी के गाया गीत ‘हम लाए हैं...’ एक प्रेरणादायक फिल्म ‘जागृति’ का (कवि प्रदीप, संगीत हेमंत कुमार) है। कवि लिखता है कि मुल्क हर बला को टाल कर अपनी मंजिल पर पहुंचा है। इसे बापू ने अपने खून से सींचा है और शहीदों ने इस दीपक को जलाए रखा है, अब तुम्हारी पारी है,  तुम ही इसका भविष्य हो, इसे संभाल कर रखने की जिम्मेदारी अब तुम्हारी है।

विज्ञापन

देशभक्ति से ओत-प्रोत फिल्में

कवि 1954 (फिल्म ‘जाग्रति’ का रिलीज वर्ष) में हमें आगाह करता है कि हम बारूद के ढेर पर बैठे हुए हैं। सावधान रहना है, अगर हम सावधान न रहे तो हमारा सर्वनाश तय है। आज इस पर कार्य करने की आवश्यकता है। कवि प्रदीप का लिखा एक और गीत है, ‘दे दी हमें आजादी बिना खड़ग बिना ढ़ाल,...’। 

कवि कुछ शब्दों में गांधी, आजादी का संघर्ष और भारत की तस्वीर उकेरता है। 

‘शहीद’, ‘शहीद भगत सिंह’, ‘स्वदेश’, ‘पूरब-पश्चिम’, ‘रंग दे बसंती’, ‘स्वदेश’, ‘चक दे इंडिया’, ‘एयरलिफ़्ट’, ‘लगान’, ‘नमस्ते लंदन’ और न मालूम कितनी फिल्में हैं जिन्हें देख कर देश पर मर-मिटने को जी चाहता है। इसी सिलसिले में मनोज कुमार की ‘शहीद’ याद आती है। मनोज कुमार ने देश-प्रेम की ऐसी लहर चलाई कि लोग उन्हें ‘भारत कुमार’ कहने लगे। स्वयं मनोज कुमार ने शहीद भगत सिंह की भूमिका की। इसका अंतिम दृश्य अत्यंत मार्मिक बन पड़ा है।


राजकुमार संतोषी ने ‘द लेजेंड्स ऑफ भगत सिंह’ (अजय देवगन) बनाई। असेंबली में बम विस्फ़ोट, जेल में अनशन, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी ऐसे ही दृश्य हैं जो दिल-दिमाग पर अंकित हो जाते हैं। पंजाबी टच लिए इसके गाने ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’, ‘पगड़ी संभाल जट्टा’ एवं ‘सरफरोशी की तमन्ना...’ सुन कर रोमांच होता है। सीपिया तथा भूरे टोन में बनी यह फिल्म ऐतिहासिकता का भान कराती है। इसी के गीत का शीर्षक ले कर फिल्म आई ‘रंग दे बसंती’ बनी। 

विज्ञापन

फिल्म लगान का दृश्य - फोटो : Twitter
विरल फिल्मों में 1956 में हिन्दी में बनी ‘26th जनवरी’ (निर्देशक: रमेश सहगल, अभि: अजित और नलिनी जयवंत, निशी, सप्रू, बी. एम. व्यास, कुकू, संगीत: सी रामचंद्र, गीत: राजेंद्र कृष्ण) खास है। इसके गीत और उनके बोल यूट्यूब पर हैं। गीतों को स्वर दिया है, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मन्ना डे तथा कोरस ने। लय, तान, भाव भरे इन गानों में प्रार्थना है, देशभक्ति और अनुरोध।
 
गीत है, ‘सोने की जहां धरती, चांदी का गगन है’ इस गीत में वायलिन का खूबसूरत प्रयोग हुआ है। ‘छोड़ भी दे आकाश सिंहासन... फिर धरती पर आजा रे...’ गीत के अंत में भगवद् गीता का श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानम् सृजाम्यह।’ आता है। अन्य गीत हैं, ‘रो रो के दिल पुकारे रो रो के दिल पुकारे, ढूंढे तेरे इशारे ढूंढे तेरे इशारे...’, ‘आंख रोई मगर मुस्कुराना पड़ा...दिल के टुकड़े हुए फिर भी आना पड़ा...’, ‘ओ तेरे साथ साथ मेरी दुनिया भी जा रही है...’, ‘ओ चांद मुझ को जरा ये बता’, ‘देखो जी देखो आंख से आंख लड़ी...’। 
 


फिल्मों में ‘कालापानी’ की दृश्य

2011 की मलयालम फिल्म है, ‘अगस्त 15’। साजी कैलास की इस फिल्म को एस.एन. स्वामी ने लिखा है। मम्मूटी ने क्राइम ब्रान्च ऑफिसर की प्रमुख भूमिका निभाई है। 1958 में हिन्दी में ‘कालापानी’ नाम से फिल्म बनी थी, जिसमें देव आनंद, मधुबाला, नलिनी जयवंत ने भूमिकाएं कीं। 1996 में बनी मलयालम सफल फिल्म ‘कालापानी’ (निर्देशक: प्रियदर्शन, संगीत: इलईराजा) गुलामी के दौरान न मालूम कितने लोगों को कालापानी की सजा की कहानी दिखाती है।

कालापानी मतलब अंदमान द्वीप के सेलुलर जेल में सड़ा देना। इस स्थान पर भारतीय कैदी मेहनत करते हैं और अंग्रेज मौज-मस्ती। इनमें अधिकतर राजनैतिक कैदी हुआ करते थे, जिन्हें झूठे मुकदमे में फंसा कर कालापानी की सजा दी जाती थी। 

‘कालापानी’ 1915 के ब्रिटिश इंडिया में डॉक्टर गोवर्धन मेनन (उन्नी) को ट्रेन में बम फेंकने के झूठे आरोप में गिरफ़्तार करके पोर्ट ब्लेयर के सेलुलर जेल भेज दिया जाता है। 1965 में भारतीय सेना का ऑफिसर सेतु अपनी ऑन्ट (बुआ) पार्वती के पति डॉक्टर गोवर्धन मेनन के विषय में पता करने कालापानी जाता है। पता चलता है कि गोवर्धन राष्ट्रवादी था, जिसे उसकी शादी के दिन गिरफ़्तार कर सेलुलर जेल भेज दिया गया था।

एक आइरिस जेलर डेविड बेरी (एलेक्स ड्रैपर) बहुत दुष्ट है, इंग्लिश डॉक्टर लेन हटन दयालु है। 14 लोगों की रिहाई का आदेश आता है, पर जेलर मिर्जा खान (अमरीश पुरी) जेल से भागने के नाम पर कैदियों को मार डलवाता है। बदले में गोवर्धन जेलर तथा मिर्जा को मार डालता है। गोवर्धन का क्या हुआ, सेतु अपनी ऑन्ट को क्या बताता है, यह सब आप स्वयं देखें।

गाथात्मक फिल्म में तब्बू के अलावा अन्नु कपूर (वीर सावरकर), टीनू आनंद (कैदी) भी नजर आते हैं। गोवर्धन मेनन की मुख्य भूमिका में मलयालम के प्रसिद्ध और लोकप्रिय अभिनेता मोहनलाल हैं। तब्बू ने पार्वती नाम से पहले उनकी प्रेमिका और बाद में उनकी पत्नी की भूमिका की है। इनके अलावा फिल्म में नेदुमुड़ी वेणु (डॉक्टर के मामा), श्रीनिवासन (कैदी, जेलर का जासूस), विनीत (इंडियन आर्मी ऑफ़ीसर सेतु) हैं।

पांच गीतों वाली इस फिल्म का एक गीत, ‘वंदे मातरम’ जावेद अख्तर ने लिखा है, बाकी के गीत अरिवुमति के हैं। चित्रा एवं श्रीकुमार ने गीतों को स्वर दिया है। उत्कृष्ट सिनेमाटोग्राफी संतोष शिवन की है। फिल्म की हिन्दी, तमिल, तेलगू डबिंग हुई है। मलयालम फिल्म में हिन्दी, इंग्लिश, तमिल, बांग्ला, तेलगू तथा जर्मन भाषा का प्रयोग हुआ है।

हिन्दी में यह ‘सजा-ए-कालापानी’ नाम से डब हुई, जिसमें अमिताभ बच्चन कथावाचक हैं। तेलगू में ‘कालापानी’ नाम रखा गया। सेल्वी की कोरियोग्राफी आकर्षक है। खासकर तब्बू को प्रसन्न मुद्रा मे नृत्य करते देखना सुखद लगता है। 

26 जनवरी 2023 के गणतंत्र दिवस पर कुछ फिल्मों-गीतों के माध्यम से देशवासियों को मेरा सलाम!


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें