अमेरिकन सिनेमाटोग्राफर ग्रेग टोलैंड ने अपने समय के दिग्गज सिने-निर्देशकों के साथ काम किया और सिने-इतिहास में अपने लिए स्थान सुरक्षित किया। उनके खाते में 68 फिल्मों की सिनेमाटोग्राफी दर्ज है जिनमें कई फिल्म आज भी देखी-सराही जाती हैं।
कालजयी फिल्म ‘सिटीजन केन’ के अध्ययन के बिना सिनेमा का प्रशिक्षण नहीं हो सकता है। ऑर्सन वेल्स के पास कहानी थी, विचार था, अभिनेता और अभिनय था... इन सबको परदे पर मूर्तिमान किया ग्रेग टोलैंड ने। अपनी सिनेमाटोग्राफी से इस फिल्म को अमर कर दिया। ऑर्सन वेल्स के यहां जो डीप फोकस, प्रकाश-छाया, शैडो का जादू, क्लोजअप्स हम देखते हैं वह इसी फोटोग्राफी का कमाल है। डीप फोकस ग्रैग टोलैंड की विशेषता थी।
29 मई 1904 को अमेरिका में जन्मे ग्रेग टोलैंड का जन्म का नाम ग्रेग वेस्ली टोलैंड था। वे जेनी तथा फ्रैंक की इकलौती संतान थे। पति से तलाक के बाद जेनी बेटे को लेकर कैलीफोर्निया चली गई। मां-बेटे ने कई फिल्म वालों के यहां काम किया। मां लोगों के यहां गृह सेविका थी। फिल्मों के सवाक होने पर कैमरे में शोर कम करने केलिए साउंडप्रूफ बूथ चाहिए थे। ग्रेग ने शोर कम करने का उपकरण विकसित किया।
डीप फोकस और फिल्म बनाने में जनत्रंत लाने वाले, ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्ति टोलैंड की 26 सितम्बर 1948 को कैलीफोर्निया में शराब की कु-लत से असमय मृत्यु हुई। असल में वे कैमरा पकड़ कर सर्वाधिक प्रसन्न होते थे और जब कैमरा न पकड़े होते तो उदास-निराश हो जाते और शराब का सहारा लेते थे।
डीप फोकस कैमरे की वह कला है जो किसी दृश्य में सारी चीजों को स्पष्ट दिखाता है। डीप फोकस में दृश्य का बैकग्राउंड, मिडिलग्राउंड, फॉरग्राउंड यानी सब कुछ साफ-साफ नजर आता है। ऑर्सन वेल्स खुले दिल से टोलैंड से फोटोग्राफी कला सीखने की बात स्वीकारते हैं। वेल्स के अनुसार उन्होंने जिनके साथ काम किया वे ग्रेग टोलैंड न केवल महान कैमरामैन थे वरन सबसे तेज भी थे।
1931 में पहली बार उन्हें ‘पामी डेज’ फिल्म के लिए क्रेडिट मिला और आठ साल बाद 1939 में उन्हें पहला ऑस्कर मिल गया। ऐसा कमाल का उनका कैमरावर्क था। विलियम वायलार ने एमिली ब्रॉन्टी की क्लासिक रचना ‘बदरिंग हाइट्स’ पर इसी नाम से पौने दो घंटे की फ़िल्म बनाई थी। इस अमर प्रेम कहानी फिल्म की नायिका कैथी (मर्ले ओबेरॉन) की खूबसूरती को दर्शकों तक पहुंचाने में ग्रेग की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
इस फ़िल्म को वे खुद एक सॉफ्ट, डिफ़्यूज्ड पिक्चर, एक फंतासी कहते हैं। मोमबत्ती रोशनी का प्रभाव, रोमांटिक प्रकृति, क्लोजअप्स, बर्फ़, कोहरा सब मिल कर दर्शकों को किसी अन्य लोक में ले जाता है। लेकिन इस फिल्म में विकट, निष्ठुर दृश्य भी हैं, जिनके लिए फोटोग्राफर ने लो एंगल्स, डॉर्क शेडोज और कभीकदा डीप फोकस का प्रयोग किया है। इन्हीं सब कारणों से क्रेडिट के रूप में परदे पर अलग से नाम लिखे जाने वाले कदाचित वे पहले कैमरामैन हैं। कोई आश्चर्य नहीं वे अपने समय के सर्वाधिक मेहनताना पाने वाले कैमरामैन थे।
1940 की फिल्म ‘ग्रेप्स ऑफ रॉथ’
याद करें उनके द्वारा फिल्माई गई 1940 की फिल्म ‘ग्रेप्स ऑफ रॉथ’। दो घंटे से कुछ मिनट ऊपर की इस फ़िल्म का आधार नोबेल (1939) पुरस्कृत साहित्यकार जॉन स्टीनबेक का इसी नाम का उपन्यास है। मगर इस फिल्म में स्क्रीनप्ले राइटर के रूप में वेक और नाम नननैली जॉनसन भी जुड़ा है। इस फिल्म का निर्देशन प्रसिद्ध सिने-निर्देशक जॉन फ़ोर्ड ने किया है। फ़िल्म ‘ग्रेप्स ऑफ़ रॉथ के अभिनेता हैं, हेनरी फ़ोंडा, जेन डैरवेल तथा जॉन कैरराडाइन। फिल्म ‘ग्रेप्स ऑफ रॉथ’ ने दो ऑस्कर जीते।
फिल्म की एक विशेषता है, इसमें प्रत्येक शॉट का सावधानीपूर्वक फिल्मांकन होना, कोई शॉट रुटीन ढ़ंग से नहीं लिया गया है। कहानी अमेरिका की महामंदी के दौर में बेघर हुए लोगों से संबंधित है, खासतौर पर ओक्लाहामा के एक परिवार की गरीबी, हताशा भरी जिंदगी से जुड़ी हुई है। ये लोग अपने खेतों-जमीन से उखड़ कर कैलीफ़ोर्निया की ओर प्रवास करने जा रहे हैं।