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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: फिजी का सिने-इतिहास, यहां की प्राकृतिक सुंदरता निर्देशकों को करती है मोहित

सार

फिजी का इतिहास काफी पुराना है लेकिन यहां सिनेमा काफी देर से आया अत: सिने-इतिहास बहुत पुराना नहीं है। 2017 में यहां 74 फिल्मों की शूटिंग हुई। इसका प्रमुख कारण यहां के करीब 300 टापू एवं 500 छोटे-छोटे द्वीप हैं। ग्रेट फिजी यहां का सबसे बड़ा टापू है।
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फिजी में बनी फिल्में - फोटो : Istock
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विस्तार
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फिजी और भारत का संबंध काफी पुराना है। ब्रिटिश काल में खेतों में काम करने के लिए यहां से गुलाम बनाकर मजदूर ले जाए जाते थे जिन्हें वैसे तो एग्रीमेंट के तहत ले जाते थे मगर वह करारनामा फर्जी होता था, उसका कोई महत्व न था। ये लोग कभी अपने देश न लौट सके। एक समय के गिरमिटिया मजदूर आज फिजी के समाज की प्रमुख इकाई हैं।

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वहां गुरु पूर्णिमा तथा दीपावली प्रमुख त्योहार हैं। सुवा यहां की राजधानी है और यहां इंग्लिश, फिजियन तथा फिजियन हिन्दी तीन भाषाएं सरकारी तौर पर स्वीकृत हैं।

आज फिजी, पर्यटकों का प्रिय स्थल है। समुद्र तट पर होने के कारण यहां स्कूबा डाइविंग, सर्फिंग, राफ्टिंग, विंड सर्फिंग की सुविधा के आकर्षण में दुनियाभर के लोग खिंचे चले आते हैं। स्त्रियों द्वारा पाल वाली नौकायन प्रतियोगिता, कुश्ती, तख्ता राफ्ट आदि यहां के परम्परागत खेल हैं। ये इनकी संस्कृति का हिस्सा हैं। यही समुद्र तट और ब्लू लगून फिल्म बनाने वालों को लुभाते हैं और वे अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए यहां आते हैं। फुटबॉल का खूब क्रेज है दुनिया के सर्वोत्तम फुटबॉल खिलाड़ी यहां से भाग लेते हैं। बहुत पहले से यहां ओलम्पिक खेल हुए हैं।
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फिजी में तब हलचल मच गई जब 3 सितंबर 1996 को द फिजी टाइम्स में दामोदर भाइयों ने एक घोषणा की, ''विलेज 6 मल्टी-सिनेमा कॉम्प्लेक्स इस सप्ताह खुलने वाला है।'' इसके साथ फिजी के लोगों के लिए मनोरंजन का एक नया युग प्रारंभ हो गया। परिवार-दोस्त एक साथ फिल्म देखने निकलते, एक समय में अपनी-अपनी पसंद की फिल्म देखते।

आने वाली फिल्मों के प्रिव्यू लॉबी में रखी कुर्सियों पर बैठ कर वीडियो स्क्रीन पर देखे जा सकते थे। कॉम्प्लेक्स में 250-320 सीट के एयरकंडीशन वाले 6 सिनेमा हाल थे। आवश्यकतानुसार अन्य सुविधाओं के साथ व्हीलचेयर भी उपलब्ध थी।


फिजी की प्राकृतिक सुंदरता

फिजी का इतिहास काफी पुराना है लेकिन यहां सिनेमा काफी देर से आया अत: सिने-इतिहास बहुत पुराना नहीं है। फिजी की प्राकृतिक सुषमा तथा संस्कृति ने दुनिया के फिल्म निर्देशकों को आकर्षित किया है, उन्होंने यहां के लोकेशन पर फिल्में बनाई हैं।

1980 की प्रसिद्ध फिल्म ‘द ब्लू लगून’ यहीं फिल्माई गई थी। टॉम हैंक्स तथा हेलेन हंट को लेकर 2000 में बनी फिल्म ‘कास्ट अवे’ की शूटिंग यहीं हुई थी और जब ‘किलर्स ऑफ द फ्लॉवर मून’ बनने लगी तो उसके शोध के दौरान ओसेज नेशन तथा ट्राइब भाषा के विशेषज्ञों से सलाह ली गई। इस प्रजाति के लोग फिजी में भी हैं।

2017 में यहां 74 फिल्मों की शूटिंग हुई। इसका प्रमुख कारण यहां के करीब 300 टापू एवं 500 छोटे-छोटे द्वीप हैं। ग्रेट फिजी यहां का सबसे बड़ा टापू है। हजारों किलोमीटर का समुद्र तट है। फिजी की 87% आबादी मुख्य रूप से दो बड़े टापुओं में रहती है। फिल्म बनाने वाले इन टापुओं पर फिल्मांकन करते हैं और उनकी टीम मुख्य टापू पर रिसोर्ट में रहती है। 

1954 में बर्ट लैंएस्टर ने ‘हिस मैजेस्टी ओ कीफ’ की शूटिंग यहां की थी। जिसमें दिखाया गया है कि निजी जिंदगी से बढ़ कर कुछ चीजें होती हैं। 1973 में पौने दो घंटे की ‘ब्रीजी’ फिल्म की शूटिंग यहां हुई। फिल्म में एक लड़की घर से भाग निकलती है और खडूस बूढ़े से मिलती है, पहले बूढ़ा हिचकिचाता है लेकिन बाद में दोनों में कोमल भावनाएं पनपती हैं।

हॉलीवुड की एक्शन एडवेंचर ड्रामा फिल्म ‘एड्रिफ्ट’ (2018) की शूटिंग फिजी तट पर हुई। सत्य कहानी पर आधारित इस फिल्म में शैलेन वूडी तथा सैम क्लैफ्लिन ने भूमिकाएं की हैं। टैमी ओल्डहैम तथा उनके मंगेतर रिचर्ड शार्प के प्रशांत महासागार के सबसे बड़े तूफान में फंसने और निकलने की कहानी, जिनके पास दुनिया से जुड़ने का कोई साधन न था।

2018 में ‘ऑस्ट्रेलियन सर्वावर’ यहीं बनी। 1990 में नील्स गौप ने यहां आकर ‘शिपरेक्ड’ बनाई जिसमें समय 1850 का है इस काल में एक नॉर्वेजियन लड़का केबिन बॉय का काम करने इंग्लैंड जाता है और उसे पता चलता है कि उसके साथ काम करने वालों में से कुछ लोग समुद्री डाकू हैं। 

 

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विश्व सिनेमा - फोटो : istock

फिल्म- ‘द लैंड हैज आइज’

भारतीय फिल्में यहां खूब दिखाई और पसंद की जाती हैं। फिजी की अपनी पहली फीचर फिल्म 2004 में बनी, जिसका नाम है, ‘द लैंड हैज आइज’, इसके निर्देशक विल्सोनी हेरेनिको हैं। डेढ़ घंटे की इस फिल्म में एक युवती विकी (सैपेटा टैटो) यौद्धा स्त्री (रेना ओवेन) के मिथ से प्रेरित हो कर न्याय तथा स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करती है। यह व्यक्ति के किशोरावस्था से प्रौढ़ होने की कहानी है। सैपेटा यहीं की पैदाइश हैं और यह उनकी पहली फिल्म है। इसकी थीम फिजी की है। यह पूरी तरह से यहां की फिल्म है।

2006 में ‘द फाल’ नामक एक फिल्म का फिल्मांकन यहां हुआ। इस करीब दो घंटे की फिल्म में बिस्तर से लगा एक मरीज एक उजाड़ टापू पर एक लड़की से नायकों, मिथ, खलनायकों की कहानी सुनता है। 2016 में डेढ़ घंटे की डॉक्यूमेंट्री ‘एम्ब्रैस’ बॉडी इमेज एक्टिविस्ट टैरिन ब्रुमफिट की कहानी है। वह इस वैश्विक मुद्दे पर युद्ध स्तर पर कार्य करती है।

लेकिन इन सबके पहले फीजी में 2002 में फीचर लेंथ की एक डॉक्यूमेंट्री ‘रील पैराडाइज’ नाम से बनी। यह अमेरिकन पियर्सन परिवार के विषय में है, जो एक साल फिजी में रहता है। जाहिर-सी बात है, उसका स्थानीय लोगों से संबंध होता है। इस फिल्म को ‘ए रॉ स्लाइस ऑफ फिजियन लाइफ’ की संज्ञा दी जाती है। ‘रील पैराडाइज’ इंडिपेंटेंट फिल्म वैतेवो टापू में बनी है।

यह पहली फिल्म है जिसमें फिजी का लैंडस्केप पूरी फिल्म की पृष्ठभूमि में है। वैसे तो यह पियर्सन परिवार की एक साल की कहानी है लेकिन फिल्म बनाने वाले फिजी जीवन और संस्कृति की जटिलताओं को समझने का चित्रण भी करते हैं।

वे एक साल फिजी के सुदूर टापू में रहते हैं और रहवास समाप्त होने के समय 180 मेरिडियन सिनेमा चलाते हैं जिसके द्वारा वे स्थानीय लोगों को मुफ्त सिनेमा दिखाते हैं।

जॉन पियर्सन इंडिपेंडेंट फिल्म मेकर हैं जिन्होंने अपनी पत्नी जेनेट के साथ मिल कर आईएफसी बनाया है। वे अपने बच्चों को भी न्यूयॉर्क सिटी से भिन्न अनुभव देना चाहते थे। विदा बेला में ग्रामीणों द्वारा आयोजित समारोह में परिवार पालथी मार कर बैठता है और स्थानीय पेय कावा पीता है।

बैरी बर्क्ले ने ‘फोर्थ सिनेमा’ नाम से एक पद का निर्माण किया। उनके अनुसार देशज लोगों द्वारा देशज लोगों के लिए बनाया गया देशज सिनेमा इस श्रेणी के अंदर आता है। उनके अनुसार प्रत्येक संस्कृति का यह अधिकार और दायित्व है कि वे अपनी संस्कृति अपने लोगों के समक्ष प्रस्तुत करें।

यह ऐसा दायित्व है जिसे बाहरी लोगों के हाथ में नहीं दिया जा सकता है, न ही उनके अनाधिकार ग्रहण केलिए छोड़ा जाना चाहिए। बैरी बर्कले की बात से इत्तिफाक रखते हुए अब फिजी के लोगों ने अपना सिनेमा खुद बनाने की ठानी है। इंतजार है, भविष्य में फिजी से आने वाली फिल्मों का।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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