इस फिल्म का एकमात्र प्रिंट, जो कि पुणे के नेशनल फिल्म आर्काइव्ज में रखा, वह भी 2003 में लगी एक आग में स्वाहा हो गया था।
- फोटो : प्रतीकात्मक फोटो
फिल्म के प्रदर्शन के अवसर पर बड़ा भव्य स्वागत हुआ था। तत्कालीन गवर्नर ने इसका उदघाटन किया था। प्रदर्शन के दिन सुबह से ही नए युग का आगमन का स्वागत करने के लिए थियेटर पर भरी भीड़ जमा हो गई थी। फिल्म शुरू हुई सीटियों व शोरगुल के बीच और खतम हुई तालियों की गड़गड़ाहट के साथ। मुंबई में यह फिल्म पूरे सात हफ्ते चली और कामयाब मानी गई। इस फिल्म का एकमात्र प्रिंट, जो कि पुणे के नेशनल फिल्म आर्काइव्ज में रखा, वह भी 2003 में लगी एक आग में स्वाहा हो गया था, इस तरह आज इस फिल्म के कुछ चित्र, पोस्टर्स और दस्तावेज ही उपलब्ध हैं।
भारत की पहली बोलती फिल्म चार माह में बनकर तैयार हुई थी।
- फोटो : पेक्सेल्स
सवाक् फिल्मों के आगमन ने भारतीय फिल्म उद्योग में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया और दूरदर्शी निर्माताओं ने जल्द ही नए माध्यम को अपनाना शुरू कर दिया। सवाक् युग आरंभ होने के कारण पहले वर्ष में ही 27 बोलती फिल्मों का निर्माण हुआ, इनमें से 22 हिन्दी में, 3 बांग्ला में और एक–एक तमिल व तेलगु भाषा में निर्मित हुई।
अतः हम कह सकते हैं कि सवाक् फिल्मों के आने से भारतीय सिनेमा के विषयवस्तु में भी खूब परिवर्तन हुआ फिल्मों में संवाद आने से सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों पर आधारित खूब फिल्में बनी और आपने समय के लोगों और आज तक के दर्शक वर्ग को प्रभावित करती हैं और प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं।