हो सकता है कि धामी उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बदलने के ट्रेंड को तुड़वा दें।
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घोषणाएं करने से पहले धामी ने संबंधित विभाग से आकलन करवाया और उसके बाद वित्त विभाग से परामर्श लिया ताकि उसके लाभ लोगों को जल्द मिल सकें। उनकी ज्यादातर घोषणाओं से संबंधित शासनादेश जारी भी हो गए थे, भले ही उनमें से काफी को धरती पर उतरना बाकी है। कोविड-19 से बुरी तरह प्रभावित पर्यटन, स्वास्थ्य, परिवहन और सांस्कृतिक क्षेत्रों के लिए उन्होंने आर्थिक पैकेज घोषित किए, राष्ट्रीय आजीविका मिशन के तहत काम करने वाले स्वयं सहायता समूहों के लिए आर्थिक सहायता डीबीटी के माध्यम से सीधे उनके खातों में पहुंचाने की शुरुआत की।
धामी की सबसे बड़ी घोषणा समान नागरिक संहिता की थी। धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए इस घोषणा ने उत्प्रेरक का काम किया। हालांकि यह संवैधानिक मामला है और इसमें संविधान के अनुच्छे 254 ‘क’ की बाधा से उसी अनुच्छेद 254 ’ख’ से राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने से पार पाया जा सकता है। मौलिक अधिकारों वाले अनुच्छेद 25 से 28 के कारण असली बाधा बाद में आ सकती है। फिर भी पुष्कर धामी ने इस दिशा में जो पहल की है उसका अनुसरण बाकी भाजपाई मुख्यमंत्री करने लगे हैं।
अब तो राज्यसभा में समान नागरिक संहिता के लिए किरोड़ीलाल मीना भी प्राइवेट मेंबर बिल ले आए हैं। यह मामला इतना आसान नहीं जितना कि भाजपाई प्रचार कर रहे है। बहरहाल इस पहल के लिए भी भाजपा में धामी का कद बढ़ना स्वाभाविक ही है।
टूट सकता है मुख्यमंत्री बदलने का ट्रेंड भी
प्रदेश के 22 सालों के जीवनकाल में भाजपा कुल साढ़े 13 साल शासन कर चुकी है और इन साढ़े तेरह सालों में पार्टी 7 नेताओं को मुख्यमंत्री बना चुकी है और 9 बार सरकारें दे चुकी हैं। इनमें से कोई भी 5 साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सका। तरीथ सिंह रावत को तो केवल 3 माह में ही चलता कर दिया गया। भाजपा के इस इतिहास को देखते हुए अब पुष्कर धामी के बारे में भी कयास लगने शुरू हो गए थे। लेकिन अब हिमाचल के चुनाव नतीजों के बाद धामी को बदलने का कोई वाजिब कारण नजर नहीं आता है। हो सकता है कि धामी मुख्यमंत्री बदलने के ट्रेंड को भी तुड़वा दें। भाजपा के अब तक जितने भी 7 नेता मुख्यमंत्री बने उनमें से धामी अकेले मुख्ष्मंत्री हैं जिनके नेतृत्व में भाजपा विधानसभा चुनाव जीती है।
भाजपा में अहमियत अब बढ़ेगी धामी की
सांगठनिक तौर पर भी अब भाजपा में युवा पुष्कर सिंह धामी का कद बढ़ना स्वाभाविक ही है। किसी भी राजनीतिक दल को जिताऊ नेता चाहिए और फिलहाल पुष्कर धामी जिताऊ नेताओं की श्रेणी में आ गए हैं। यद्यपि धामी इस साल हुए विधानसभा चुनाव में स्वयं हार गये थे। इसलिए उन पर सवाल उठ रहे थे कि जो नेता स्वयं चुनाव नहीं जीत सकता वह पार्टी को क्या जितायेगा। लेकिन चम्पावत उपचुनाव ने धामी पर लगा वह दाग धोने के साथ ही उनके नाम चुनाव में भारी मतों से जीतने का रिकार्ड भी थमा दिया। इस उपचुनाव में धामी अपनी कांग्रेस की प्रतिद्वंदी से 55,025 मतों से जीत कर कुल मतों का 94 प्रतिशत हिस्सा ले गए थे।
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