सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति फ़ातिमा बीबी, भारत की बेटी सानिया मिर्जा जिसनें अपने कपड़ों का चुनाव समाज से डर के नहीं डट के किया।
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संविधान ने दिए हैं हमें कई अधिकार
हम आजाद भारत के निवासी हैं। हमारा संविधान एक खूबसूरत दस्तावेज़ है। उसमें वर्णित मौलिक अधिकार आर्टिकल 15 (1) के मुताबिक राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान और वंश के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
साथ ही अनुच्छेद 15 के दूसरे क्लॉज के मुताबिक, किसी भी भारतीय नागरिक को धर्म, लिंग, जाति,जन्म स्थान और वंश के आधार पर दुकानों, होटलों, सार्वजानिक भोजनालयों, सार्वजानिक मनोरंजन स्थलों, कुओं, स्नान घाटों, तालाबों, सड़कों, और पब्लिक रिजॉर्ट्स में घुसने से नहीं रोका जा सकता। हर भारतीय नागरिक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 (1) के तहत संरक्षित है। हम सब जानते हैं कि हमारा संविधान हमें आर्टिकल 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। जो निश्चित रूप से किसी भी भारतीय के साथ होने वाले न्याय का सूचक है।
आज कला, विज्ञान, खेल, शिक्षा, राजनीति हर क्षेत्र में महिलाओं ने यह साबित किया है कि वो पुरुषवादी समाज में कमतर नहीं हैं लेकिन इतना सब कुछ करने के बाद भी आधी आबादी का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है। चाहे वो संसद में हों या सड़क में, किसी चाय की दुकान में हों या किसी आलीशान दफ्तर में। वे अब भी पिछड़ी हुई हैं और उनमें हर समाज की महिला है क्योंकि वो सबसे पहले एक महिला है जिसे अपने हिस्से का समाज खुद ही तैयार करना होता है। फिर चाहे वह घूंघट के पार की दुनिया हो या हिजाब से किताबों तक का सफ़र तय करना हो।
आजादी के 75 साल बाद भी मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा और रोजगार में भागीदारी आज भी हाशिए पर ही है हालांकि हमारे समाज में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जिनमें महिलाओं ने घूंघट और बुर्के की हदें लांघी हैं और अपनी परम्पराओं में रचबस कर कई कीर्तिमान भी हासिल किए हैं।
आज अनेकों उदाहरण हमारे बीच मौजूद हैं जैसे देश की पहली मुस्लिम शिक्षिका फ़ातिमा शेख जी, जिन्होंने देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फूले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर हाशिए पर खड़ी लड़कियों में शिक्षा की अलख जगाई वो भी उस दौर में जब महिलाओं का जीवन और भी ज्यादा जटिल था। अभी हाल ही में उनकी 191 वीं जयंती के अवसर पर गूगल ने भी डूडल बनाकर उन्हें सलाम किया था। यह हर भारतीय के लिए गौरव की बात है।
सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति फ़ातिमा बीबी, भारत की बेटी सानिया मिर्जा जिसनें अपने कपड़ों का चुनाव समाज से डर के नहीं डट के किया। आज खेल जगत पर कितने उभरते सितारे हैं जो अक्सर समाज की अवहेलना का शिकार हो जाती हैं लेकिन फिर भी वे अपने हिजाब या पूरे ढके कपड़ों की वजह से अपनी कामयाबी की रफ़्तार को कम नहीं होने दे रहीं। धर्म और हिजाब के नाम पर लड़कियों को शिक्षा से दूर करना किसी भी दृष्टि से सही नहीं है।
हमें वो हर अवसर खोजने चाहिए जिससे महिलाओं में शिक्षा और रोजगार का प्रतिशत बढ़े और उनकी कामयाबी की उड़ान जारी रहे। सरकारी नौकरी के साथ-साथ व्यवसाय में भी उनका आधे का प्रतिनिधित्व हो। आज हिजाब और गमछा प्रकरण 75 साल की आजादी को बेपर्दा करता नज़र आ रहा है।
काश की कभी भीड़ का एक हुजूम किसी निर्भया की रक्षा के लिए सामने आए, न की उसे स्कूल, कॉलेज से दूर करने के लिए। काश की भीड़ का सैलाब आधी आबादी को संसद से सड़क तक आधी हिस्सेदारी सौपने आगे आए। न की उन पर अपनी मर्जी थोप कर उनकी आजादी छीनने। काश की समाज का जिम्मेदार तबका हर लड़की को अपने हिस्से का आसमां दिलाने के लिए आगे आए। आखिर हर समाज की महिलाओं की समस्याएं वही हैं बस उनके रूप अलग-अलग हैं।
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