जम्मू-कश्मीर चुनाव परिणाम 2024
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उधर जम्मू-कश्मीर में भाजपा का सरकार बनाने का सपना दूर की कौड़ी ही था। वहां चुनाव जीतते ही सत्ता में आ रहे नेशनल कांफ्रेंस कांग्रेस गठबंधन के नेता फारूख अब्दुल्ला ने कहा कि यह जनादेश राज्य से धारा 370 व 35ए हटाने और भाजपा के खिलाफ है। इससे स्पष्ट हो गया कि जम्मू कश्मीर में आगे भी टकराव की राजनीति होने वाली है।
इस मामले में कांग्रेस दुविधा में रहेगी, क्योंकि वह जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने के मुद्दे पर चुप है, लेकिन प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की हामी है। दरअसल बीजेपी प्रदेश में शांति, अमन, पर्यटन को बढ़ावा जैसे मुद्दों पर घाटी में भी समर्थन की उम्मीद कर रही थी, लेकिन वैसा नहीं हुआ। मुसलमानों में भाजपा के प्रति जो नाराजी है, वह खत्म नहीं हुई है।
अलबत्ता 2014 के विधानसभा चुनाव की तुलना में राज्य में बीजेपी की सीटें और वोट दोनों बढ़े हैं। लेकिन बीजेपी के साथ कभी सरकार बनाने वाली महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी का सफाया और भाजपा ने घाटी में निर्दलियों के समर्थन से सरकार बना सकने की संभावना पर नतीजो ने पानी फेर दिया है। अच्छी बात यह है कि जम्मू-कश्मीर के मतदाताओ ने अलगाववादी निर्दलीयों और अन्य पार्टियों को चुनने की जगह नेकां-कांग्रेस गठबंधन को समर्थन दिया। जिससे सरकार पांच साल तक चलने की उम्मीद ज्यादा है।
धारा 370 हटाने का दांव भी फेल
धारा 370 हटाने की मांग नेकां के घोषणा पत्र में जरूर है, लेकिन उसे भी पता है कि यह अब व्यावहारिक नहीं है। लिहाजा उसका जोर पूर्ण राज्य के दर्जे पर ही ज्यादा रहेगा। वैसे भी केन्द्र की मदद के बगैर जम्मू- कश्मीर में सरकार चलाना नामुमकिन है। हालांकि वहां भाजपा के सरकार न बना पाने से यह संदेश दुनिया में जरूर गया है कि राज्य के लोग अभी भी धारा 370 हटाने से खुश नहीं हैं और इसके अलग-अलग कारण हैं।
अलबत्ता सकारात्मक संदेश यह है कि आंतकवाद से प्रभावित इस राज्य में चुनाव निष्पक्ष तरीके से हए हैं और लोकतंत्र मजबूत हआ है। अहम बात यह है कि जो तत्व कभी भारतीय संविधान और चुनावों को ही नकारते थे, वो मजबूरी में ही सही पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लौट रहे हैं। एक बात साफ है कि राज्य में जो संवैधानिक बदलाव किए गए हैं, उसका राजनीतिक और सामाजिक असर भी हमे जल्द दिखाई देगा। इस बात की संभावना कम है कि जम्मू कश्मीर की अवाम आए दिन आंतकी हमलों, पत्थरबाजी और बंद के दौर में लौटना चाहेगी।
इन नतीजों ने एग्जिट पोल की विश्वसनीयता पर फिर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। जम्मू कश्मीर में तो नतीजों सर्वे के हिसाब से आए हैं, लेकिन हरियाणा में तमाम सर्वे फेल हुए हैं। राजनेताओं को भी समझ आ गया है कि सर्वे के आधार पर मन में लड्ड़ू भले फूट रहे हों, लेकिन हकीकत में पूरे नतीजे आने के बाद ही लड्डू खाना और बांटना चाहिए।
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