गुरु नानक देव जी प्रथम शख्सियत थे जिन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई।
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गुरु नानक जी बचपन से ही विचारशील, तेज बुद्धि के मालिक और बड़े गंभीर स्वभाव की प्रवृत्ति के थे, जो कुछ भी बोलते सोच समझ कर बोलते थे और उनकी कही हर बात अटल सत्य की तरह होती थी। बचपन में एक बार जब नानक किसी पोथी को पढ़ रहे थे तो पिता ने पूछा की नानक क्या पढ़ रहे हो तो उन्होंने कहा पिता जी मैं 'सप्त सलोकी' गीता पढ़ रहा हूंं। उनकी ऐसी बातें सभी को अचरज में डाल देती थी।
बचपन में जब गुरु नानक जी को जनेऊ धारण करवाया जाने लगा तो उन्होंने भरी सभा में ऐसे जनेऊ की मांग की जो दया से भरपूर हो, सब्र, संयम का हो, जो न कभी टूट सके न जल सके, न कभी मैला हो सके। उनके कुल पुरोहित पंडित हरदयाल ने कहा कि यह जनेऊ धारण करना उच्च जाति की निशानी है और यह लोक प्रलोक में भी रक्षा करता है।
9 साल की छोटी सी आयु में जब गुरु नानक देव जी ने यह कहा की यदि इतने सारे गुण इसमें हैं तो इस जनेऊ को सबसे पहले मेरी बहन नानकी के गले में डाला जाए क्योंकि वह मेरे से पांंच वर्ष बड़े हैं यह सुनकर उस सभा में सन्नाटा छा गया हर कोई यह सुनकर हैरान था, तभी पीछे से आवाजें आई की नहीं-नहीं इसे केवल मर्द ही पहन सकते हैं औरतें नहीं, तो गुरु नानक जी ने सीधे कहा की जो कच्चा धागा औरत-पुरुष व जाति प्रथा में ऊंच-नींच का भेदभाव पैदा करता हो वह उसे कभी धारण नहीं करेंगे।
आज हमारे समाज में धर्म कर्म के मामले में महिलाओं से भेदभाव किया जाता है, गुरु नानक देव जी प्रथम शख्सियत थे जिन्होंने इस भेदभाव के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। औरत-पुरुष के बीच में भेदभाव को मिटाने के लिए गुरु जी ने बताया की जिस भगवान् ने औरत को बनाने में उंच-नींच का भेदभाव नहीं समझा फिर पुरुष को किसने हक दिया ऐसा भेदभाव करने का। स्त्री के स्वाभिमान को जगाने के लिए उन्होंने अपनी वाणी में कहा है
"सो क्यो मंदा आखिए? जितुः जंमहि राजान।।
जिस जातपात से आज भी हमारा समाज जूझ रहा है उसी जातपात व ऊंच-नीच के बंधनों को तोड़ने के लिए गुरु नानक देव जी ने उस समय नीच जाति कही जानी वाली मरासी जाति से संबंधित भाई मरदाने को अपना साथी व भाई माना। गुरु ग्रंथ साहिब में भी समानता की इस वाणी का जिक्र मिलता है
"अविल अल्लाह नूर उपाए, कुदरत दे सब बंदे।।
एक नूर ते सब जग ऊपजया कौन भले कौन मंदे"।।
वे जाति-आधारित भेदभाव को खत्म करने के समर्थक थे। उन्होंने कहा कि जन्म से किसी की जाति ऊंंची या नीची नहीं होती। ऊंच-नीच तो अच्छे और बुरे कर्म के माध्यम से तय होती है। मानव के रूप में सामाजिक समरसता के सबसे बड़े गुरु थे नानक जी।
गुरु नानक जी ने भ्रम, आडंबर, अंधविश्वासों का भी भरपूर खंडन किया है।
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गुरु नानक देव जी ने लंगर प्रथा शुरू की जहांं गरीब- राजा, ऊंच-नीच सभी लंगर खाते थे। गुरु जी ने गृहस्थ जीवन को सर्वोच्च बताया है। उन्होंने मनुष्य को कमल की तरह कीचड़ से निरलेप रह कर माया का मोह त्याग कर प्रभु भक्ति करने पर जोर दिया।
17 वर्ष की आयु में नानक जी के पिता ने व्यापार करने के लिए 20 रुपये दिए। नानक अपने पड़ोसी मित्र बाला के साथ व्यापार के लिए निकल गए। रास्ते में एक स्थान पर उन्हें भूखे साधु महात्मा मिले नानक ने पिता जी के द्वारा दिए 20 रुपये से राशन खरीद कर उन साधुओं को भिजवा दिया और खुद खाली हाथ घर लौट आए। घर वापसी पर पिता जी से डांट भी खाई लेकिन उन्होंने कहा कि पिता जी आपने ही कहा था की सच्चा सौदा करना है और इससे सच्चा व खरा सौदा और क्या हो सकता है?
गुरु नानक देव जी ने पुजारीवाद व ब्राह्मणवाद का भय लोगों में से दूर किया। इन्होंने मौलवियों, जोगियों, पीरों, काजि़यों, अंहकारी राजाओं और पाखंडियों को मुंह पर खरी खोटी सुनाकर आम लोगों के दिलों दिमाग में से इनका भय दूर किया।
गुरु नानक देव जी की और भी बहुत शिक्षाएं व उपदेश हैं जिन्होंने पूरी मानव जाति की भलाई के लिए कार्य किया। उस समय सभी के लिए गुरु नानक देव जी एक ब्रह्म ज्ञानी, एक महान विचारक व एक रहस्यवादी बन चुके थे।
उन्होंने गृहस्थी जीवन में मेहनत करके खाने पर जोर दिया। गुरु जी ने सेवा के महत्व को बताया, झाडू लगाना, बर्तन धोना, जूतों की सफाई करना, लंगर का प्रबंध करना आदि सेवा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि सच्ची सेवा से मन हमेशा घमंड से दूर रहता है। सच्चे मन से ही ईश्वर की प्राप्ति संभव हो पाती है। इनकी शिक्षाओं ने मनुष्य में स्वाभिमान पैदा किया और बताया की गुलामी की जिंदगी से कभी शांति नहीं मिलती।
गुलाम व्यक्ति तो पिंजरे में कैद एक पक्षी की तरह होता है। गुरु नानक जी ने भ्रम, आडंबर, अंधविश्वासों का भी भरपूर खंडन किया है। मानवता के लिए गुरु नानक ने काम, क्रोध, लोभ मोह, अहम, आदि अवगुणों को त्याग कर सच, संतोष, दया, धर्म व धीरज आदि सदगुणों को अपनाने का संदेश दिया क्योंकि इससे ही इंसान, इंसान के नजदीक आता है।
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