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लैंगिक असमानता: प्रवासी भारतीय महिलाओं की दुनिया और बदलता समाज

सार

लैंगिक भेदभाव के लिए केवल पुरुष जिम्मेदार नहीं बल्कि समाज, नीति व राजनीति सभी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। कई बार एक महिला ही दूसरी महिला के विकास को लेकर सकारात्मक नहीं होती।

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पुराने समय में अधिकांश पुरूषों को घर व रसोई के कामकाज करना स्वीकार्य नहीं था। लेकिन सामाजिक बदलाव की इस कड़ी में पुरूषों की मानसिकता बदली है। - फोटो : Istock
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विस्तार
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जाने-अनजाने में समाज व परिवार में स्त्री-पुरुष के भेदभाव को महसूस कर चुकी भारतीय महिलाएं अगली पीढ़ी में सुधार की जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं। खासतौर पर वे महिलाएं जो अपने देश से बाहर रहकर समानता के सुखद एहसास और इसके फायदे को महसूस कर रही हैं।

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ऐसी ही कुछ भारतीय महिलाओं ने जो कि लंबे समय से विदेशों में रह रही हैं, उन्होंने अपना अनुभव साझा किया है। विदेशों में रहने वाले प्रवासी बिहारियों के ग्लोबल फोरम बिहार फ्रेटर्निटी की ओर से आयोजित अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के कार्यक्रम में पिछले दिनों मेरे साथ ऐसी ही चार महिलाओं ने हिस्सा लिया।

यूरोप के अलग-अलग देशों में कार्यरत ये महिलाएं बिहार के मध्यवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखती हैं। उन्होंने अनुभवों को साझा करते हुए कहा-

 

भले ही पुराने समय में अधिकांश पुरूषों को घर व रसोई के कामकाज करना स्वीकार्य नहीं था। लेकिन सामाजिक बदलाव की इस कड़ी में पुरूषों की मानसिकता बदली है। जिस तरह महिलाएं घर और बाहर के कामकाज में तालमेल बनाने में सफल हो रही हैं, ठीक इसी तरह पुरूष भी वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए ईमानदारी से योगदान देने को आगे आ रहे हैं।

खासतौर पर प्रवासी भारतीयों के लिए यह सब आसान हो चुका है। वे घर और बाहर के कामकाज में संतुलन बनाकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनकी सोच बदली है और इसका सीधा असर उनके घर-परिवार पर हुआ है। वहीं भारत में रहने वाले उनके परिजनों की सोच भी बदली है। उनमें सकारात्मक बदलाव आए हैं। वे अपनी अगली पीढ़ी को समानता के सही मायने समझाते हुए तैयार कर रहे हैं।


बेल्जियम में रहने वाली उपासना सहाय बताती हैं-

वे बिहारी लड़कियों को लेकर समाज के पूर्वाग्रह को महसूस कर चुकी हैं। जब भी कोई लड़की मध्यमवर्गीय बिहारी परिवार से होती है तो लोगों को यह लगता है कि उनकी पढ़ाई कम हुई होगी या फिर सामाजिक तौर-तरीकों में उसे ज्यादा कुछ नहीं आता होगा। जबकि ऐसी कोई बात होती नहीं, यह बिहार के प्रति दूसरे राज्यों व देशों का पूर्वाग्रह मात्र है।

 

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पिछले डेढ़ दशक से यूरोप में रह रही उपासना कहती हैं-

महिलाओं को अपने हक के लिए खुद ही आवाज उठाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस तरह यूरोप में महिलाएं और पुरुष बराबरी में सामाजिक व आर्थिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं, भारत में भी कुछ इसी तरह से होना चाहिए। यह सोच रखना कि सामाजिक जिम्मेदारी महिलाओं पर और आर्थिक जिम्मेदारी पुरुषों पर, कभी भी समाज में लैंगिक समानता नहीं ला सकता। एक समृद्ध व समानता के अधिकार देने वाले समाज में बेहतर सोच का होना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि जिन समस्याओं और सामाजिक पूर्वाग्रहों को लड़कियां झेल रही हैं उससे उबरने के लिए पुरुषों को जिम्मेदार ठहराने की जगह खुद में ही बदलाव लाने की ज़रूरत है। लैंगिक भेदभाव के लिए केवल पुरुष जिम्मेदार नहीं बल्कि समाज, नीति व राजनीति सभी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। कई बार एक महिला ही दूसरी महिला के विकास को लेकर सकारात्मक नहीं होती।

इसलिए सामाजिक बदलाव के लिए हमें खुद ही पहल करनी होगी। उपासना कहती हैं कि वे खुद भी अपने छोटे बच्चों को सामाजिक-आर्थिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक करती रहती हैं ताकि भविष्य में वे लैंगिक समानता वाले समाज को तैयार करने में योगदान दे सके।

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लैंगिक असमानता: ऐसा लगता मानों चूल्हा-चौका ही शादी का असली पैमाना है। - फोटो : Istock
इसी चर्चा में दीप्ति कुमारी ने कहा कि समाज की सबसे छोटी इकाई मनुष्य है। अगर हम खुद में बदलाव लाएंगे तो समाज और देश खुदबखुद बदलेंगे। दीप्ति डबलिन, आयरलैंड में रहती हैं। उन्होंने कहा कि जिस तरह आयरलैंड में महिलाओं को सम्मान और प्रधानता मिली हुई है, इसका सकारात्मक असर समाज पर हुआ है।

यह मुझे अचंभित करता है। जब मैं भारत से बाहर निकली तो मुझे नहीं पता था कि दुनिया में ऐसा भी कोई देश है जो महिलाओं को इस कदर तवज्जो देता है। आयरलैंड में रहना और यहां के सिस्टम को समझना मेरे लिए एक सुखद एहसास है। उन्होंने कहा कि वे हमेशा अपने पति के साथ सहभागी बनकर खड़ी रही हैं। जबकि उनके पति व परिवार का साथ भी उनके साथ हमेशा रहा है।

उनके परिवार और सोच पर आयरलैंड के महिला उन्मुख नीति का सकारात्मक असर पड़ा है। वे चाहती हैं कि ऐसा ही कुछ भारत में हो तो निश्चित तौर पर महिलाओं की स्थिति और बेहतर होगी। जबकि देश के विकास में महिलाओं की भागीदारी भी बढ़ेगी।

कमोबेश यही राय फ्रैंकफर्ट, जर्मनी में कार्यरत नेहा सिंह की भी है। उन्होंने बताया कि वे कम उम्र से ही समाज के दोहरे रवैये को देखती आई हैं। घर आने वाले पारिवारिक मित्र हो या रिश्तेदार सभी कि एक ही राय होती कि समय रहते खाना बनाना व घर के दूसरे काम सीख लो, नहीं तो शादी के बाद तुम्हारा क्या होगा?

ऐसा लगता मानों चूल्हा-चौका ही शादी का असली पैमाना है। जब शादी हुई और पति घर व रसोई के कामों में हाथ बंटाते हुए दिखे तो लोग कहते तुम कितनी भाग्यशाली हो और साथ ही प्रतिभावान भी। तुमने कितने कम दिनों में अपने पति को घर के कामों में ट्रेंड कर दिया। नेहा ऐसी बातों से असहज हो जाती। वे कहती हैं कि अगर मेरे पति मुझसे बेहतर खाना बना लेते हैं और मैं घर के दूसरे काम कर लेती हूं तो इसमें बुराई क्या है। हालांकि लैंगिक भेदभाव की कहानी केवल भारत की नहीं है।

जर्मनी में जब वे एक किराए के मकान की तलाश में थी तो उन्हें विकसित देश के एक रूढ़िवादी पुरुष की सोच का पता चला। एक मकान मालिक जो घर का मुआयना कराते समय सुविधाओं की जानकारी दे रहे थे, जब उनसे वाशिंग मशीन की उपलब्धता के बारे में पूछा गया तो उन्होंने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा कि वे उनकी सुविधा के लिए मशीन भी लगवा देंगे। नेहा कहती हैं यह बहुत ही अजीब था। मुझे लगा कि जैसे घर में केवल मेरे कपड़े ही धुलेंगे। बेशक उस जर्मन की सोच व्यक्तिगत थी।
विकसित देशों में ऐसी सोच रखने वाले लोगों की संख्या कम होती है लेकिन कुछेक तो सोचते ही हैं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि विकसित देशों में भी लैंगिक भेदभाव के मामले होते रहते हैं। इसलिए हमें सोच बदलने की ज़रूरत है। और जब हम अपने देश जाएं तो बदले हुए सोच को समाज में मान्यता दिलाने के लिए प्रयास करते रहे।

इसी तरह पेरिस, फ्रांस में कार्यरत रत्ना प्रिया बताती हैं कि उन्होंने भारत से फ्रांस तक के सफर में यह खुद अनुभव किया है कि जब कोई लड़की समाज में खुद की जगह बनाने के लिए संघर्षरत होती है तो उसे और उसके परिजनों को इस रास्ते में अनगिनत चुनौतियों का सामना करना पड़ता है उन्हें आलोचनाओं को भी झेलना पड़ता है।

हतोत्साहित करने वालों की संख्या भी ज़्यादा होती है। लेकिन जब वही लड़की खुद की जगह बना लेती है तो उनके आलोचक भी हमदर्द बन जाते हैं। उससे रिश्ते जोड़ने की कोशिश में रहते हैं। इसलिए बेहतर यह है कि हमें विकसित देशों की लैंगिक समानता से जुड़ी अच्छी बातों को खुद अपनाने के बारे में सोचना चाहिये।

इससे सबका भला होगा और हमारे आलोचक ही कल हमारे प्रशंसक बनेंगे। वहीं इस संवेदनशील मुद्दे पर चर्चा करते समय यह सोच जरूर रखा जाए कि समाज बदलने की जिम्मेदारी हम खुद पर लें और इस दिशा में आज से ही जुट जाएं ताकि आने वाले समय में भारत में महिलाओं को लैंगिक असमानता के दंश को नहीं झेलना पड़े।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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