मदनलाल पहावा पाकिस्तान से आया एक शरणार्थी था।
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पृथ्वीराज से मिला मदनलाल पहावा
इस पुस्तक के मुताबिक जब गांधी की हत्या हो गई तो मदनलाल पहावा का पुलिस ने एक बार फिर बयान लिया। इस बयान में मदनलाल पहावा ने बताया कि गांधी की हत्या के पहले जब वो आर्थिक तंगी से गुज़र रहा था तो एक बार पृथ्वीराज कपूर ने उसकी मदद की थी। उसने पुलिस को बताया-
“मैं ऑपेरा हाउस सिनेमा गया जहां पृथ्वीराज कपूर का ऑफिस था। वहां 50-60 रिफ्यूजी लाइन में लगे हुए थे। मैं भी लाइन में लग गया। जब मेरा नंबर आया तो पृथ्वीराज कपूर ने खुद अपने हाथों से मुझे 8 रुपये दिए। लेकिन ये रुपये दो दिन में ही खत्म हो गए।”
पृथ्वीराज कपूर को फंसाने की कोशिश
पुलिस को दिए बयान में पाहवा ने बताया था कि पृथ्वीराज कपूर ने उसे 8 रुपये की मदद दी थी। पाहवा का इतना-सा बयान पुलिस ने पकड़ लिया। पुलिस ने सोचा कि वह इसके दम पर पृथ्वीराज कपूर को भी गांधी हत्याकांड में घसीट लेगी। पुलिस की इस साजिश का खुलासा खुद पाहवा ने अदालत को दिए एक लिखित बयान में किया था। उसने बताया-
“गांधीजी की हत्या के बाद दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर बालकिशन मुझ पर यह दबाव बनाने लगे कि मैं यह कहूं कि फिल्म अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और बंबई की शेर-ए-पंजाब होटल के मालिक अवतार सिंह ने मिलकर गांधीजी की हत्या की साजिश रची है और मैं भी इसमें शामिल था। इसी साजिश के सिलसिले में मैं इनसे मिलने के लिए गया था।”
ऐसे में ये सवाल उठता है कि दिल्ली पुलिस सुपरस्टार पृथ्वीराज कपूर को गांधी हत्याकांड में क्यों फंसाना चाहती थीं? क्या पृथ्वीराज कपूर जैसे बड़े नाम को घसीटकर पुलिस अपनी नाकामियों पर पर्दा डालना चाहती थी? सवाल ये भी है कि दिल्ली पुलिस ने पृथ्वीराज कपूर को लेकर कभी कोई सफाई क्यों नहीं दी?
गांधी की हत्या के आरोप में पुलिस पृथ्वीराज कपूर को गिरफ्तार करना चाहती थी?
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बाद में क्या हुआ?
गांधी हत्याकांड के बाद अदालत ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे को फांसी की सज़ा सुनाई थी। वहीं उसके बाकी साथियों गोपाल गोडसे (नाथूराम का छोटा भाई), विष्णु करकरे और मदनलाल पहावा को उम्र कैद की सज़ा दी गई। जबकि दिगंबर बड़गे को सरकारी गवाह बन जाने की वजह से माफी दे दी गई और शंकर किश्तैया को बरी कर दिया गया।
1964 में जब मदनलाल पाहवा जेल से रिहा हुआ तो उसकी उम्र करीब 37 साल थी। सबसे पहले उसने पढ़ाई पर ध्यान दिया और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से एम.ए. की डिग्री हासिल की। 1966 में उसने मंजरी नाम की महिला से शादी की। पाहवा की पत्नी मंजरी ने ‘संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन’ में हिस्सा लिया था। शादी के बाद पाहवा बंबई में बस गया और उसने यहां कई छोटे-मोटे कारोबार किए।
पाहवा ने एक इंटरव्यू में कहा था, “मुझे इस बात का हमेशा दुख रहेगा कि मैं अपने हाथों से गांधी को नहीं मार पाया।” पाहवा ने साल 2000 में आर्थिक तंगी में किडनी की बीमारी से जूझते हुए दम तोड़ दिया।
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