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राजस्थान: कांग्रेस-भाजपा में नेताओं की गुटबाजी के बीच कौन मारेगा बाजी?

सार

राजस्थान में पिछले पांच चुनावों से परंपरा चली आ रही है कि एक बार कांग्रेस सत्ता में रहती है और एक बार भाजपा। शायद यही कारण है कि विपक्षी भाजपा को इस बार भरोसा है कि वह पुनः सत्ता में इसी फार्मूले के सहारे आ जाएगी। सत्ताधारी कांग्रेस, गुटों में बंटी हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार दावा कर रहे हैं कि सरकार रिपीट होगी।
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कोरोना महामारी के दौरान भी सरकार में बगावत हो गई थी - फोटो : Social Media
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विस्तार
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वैसे तो नौ राज्यों में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं, लेकिन राजनीति का असली अखाड़ा इस समय राजस्थान बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आसींद (भीलवाड़ा) में भगवान देवनारायण की जयंती पर एक बड़े कार्यक्रम में शामिल होकर राज्य के 7% गुर्जर वोटरों को साधने की कोशिश की है। पार्टी सिंबल कमल का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा कि आपका-हमारा गहरा नाता, भगवान देवनारायण का जन्म कमल पर हुआ और हमारी पैदाइश कमल से है।

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हालांकि, जैसी उम्मीद थी, उन्होंने देवनारायण कॉरिडोर की घोषणा नहीं की। पिछले चुनाव में सचिन पायलट के कारण गुर्जर, कांग्रेस की ओर चले गए थे, लेकिन इस बार भाजपा को उम्मीद है कि वो पुनः पार्टी का रुख करेंगे। इसी के साथ राजस्थान में चुनाव का बिगुल पूरी तरह बज गया है।
 

राजस्थान में पिछले पांच चुनावों से यह परंपरा चली आ रही है कि एक बार कांग्रेस सत्ता में रहती है और एक बार भाजपा। शायद यही कारण है कि विपक्षी भाजपा को इस बार भरोसा है कि वह पुनः सत्ता में इसी फार्मूले के सहारे आ जाएगी। सत्ताधारी कांग्रेस, गुटों में बंटी हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत लगातार दावा कर रहे हैं कि सरकार रिपीट होगी।

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अभी हाल में उन्होंने 156 सीटें लाने का बड़ा दावा कर डाला है। कांग्रेस, भाजपा के अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) के सुप्रीमो व नागौर से लोकसभा सांसद हनुमान बेनीवाल भी पश्चिमी राजस्थान में ताल ठोक रहे हैं तो आम आदमी पार्टी मैदान में उतरने को तैयार है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नजरें भी उत्तर प्रदेश और हरियाणा से लगती सीटों पर है।

पिछले चुनाव में कांग्रेस की वापसी

वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी और तब चुनाव सचिन पायलट के प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए लड़ा गया था। 21 सीटों से पार्टी बढ़कर 100 सीटों पर पहुंची थी और साधारण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। तब कुछ निर्दलीयों ने सरकार को समर्थन दिया, लेकिन कुर्सी के असली दावेदार सचिन पायलट के बजाय अशोक गहलोत को मुख्यमंत्री बनाया गया। तभी से पार्टी दो गुटों में बंटी हुई है।

एक गुट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ, तो दूसरा सचिन पायलट के। कोरोना महामारी के दौरान भी सरकार में बगावत हो गई थी और तब सचिन पायलट अपने गुट के 19 विधायकों के साथ दिल्ली में डेरा डाल रहे थे।

कांग्रेस-भाजपा में नेताओं की गुटबाजी के बीच कौन मारेगा बाजी? - फोटो : अमर उजाला
स्थिति यहां तक पहुंच गई थी कि कांग्रेस को अपने विधायकों को होटल में रखना पड़ा था। उस समय मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सचिन पायलट के लिए नाकारा-निकम्मा जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। बगावत के समय सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री के साथ प्रदेश अध्यक्ष भी थे।

पार्टी ने उन्हें दोनों पदों से हटा दिया था। उनके साथ गए मंत्रियों को हटा दिया था। सचिन लौटे, लेकिन उन्हें पुनः कोई पद नहीं मिला। हालांकि, उनके साथ बगावत करने वाले रमेश मीणा, विश्वेंद्र सिंह जैसे नेताओं को पुनः मंत्री बना दिया गया। 

उस समय कांग्रेस संगठन और सरकार में जो दरार थी, वह अब खाई बन चुकी है। सचिन पायलट खुलकर सरकार के खिलाफ सभाओं में बोल रहे हैं। मुख्यमंत्री का नाम तो नहीं ले रहे हैं, लेकिन उनका पूरा हमला अशोक गहलोत के ऊपर है।


सचिन पायलट बनाम अशोक गहलोत

धीरे-धीरे सचिन पायलट का समर्थन भी बढ़ रहा है और अशोक गहलोत से नाराज नेता उनके साथ आ रहे हैं। इनमें नया नाम हरीश चौधरी का है, जो अशोक गहलोत सरकार में मंत्री रहे हैं और उनके पास पंजाब का प्रभार है, लेकिन इन सबसे अशोक गहलोत बिल्कुल बेफिक्र नजर आ रहे हैं। वह बजट की तैयारियों में लगे हैं। हालांकि, दबी जुबान में कांग्रेसी नेता यह कह रहे हैं कि दोनों गुटों की तनातनी में नुकसान पार्टी को ही होगा। सरकार को इस विग्रह का नुकसान उठाना पड़ेगा।

दूसरी तरफ, भारतीय जनता पार्टी में भी नेतृत्व को लेकर बहुत सुखद स्थिति नहीं कही जा सकती है। पार्टी अब तक किसी भी एक नेता को प्रोजेक्ट करने से बचती चली आ रही है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, जिन्हें कुछ समय से साइडलाइन किया गया था, वह दोबारा पिक्चर में दिखने लगी हैं।

दो-तीन दिन पहले ही दो साल बाद प्रदेश भाजपा कार्यालय के पोस्टर में उनकी वापसी हुई है। वसुंधरा विरोधी गुट में शामिल सतीश पूनिया प्रदेश अध्यक्ष हैं, उनका कार्यकाल समाप्त हो गया है, लेकिन कार्यकाल बढ़ेगा या नया अध्यक्ष आएगा, इस पर अभी असमंजस कायम है।


जोधपुर से सांसद व केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, कोटा सांसद व लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव, केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, सतीश पूनिया जैसे कई नेताओं के नाम मुख्यमंत्री के लिए चलाए जाते हैं। हालांकि, पार्टी बार-बार दोहरा रही है कि चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। इसकी बड़ी वजह है कि पार्टी अभी से किसी नाम की घोषणा करके गुटबाजी को और अधिक नहीं बढ़ाना चाहती है।
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कांग्रेस-भाजपा में नेताओं की गुटबाजी के बीच कौन मारेगा बाजी? - फोटो : Social Media

भाजपा को वापसी की उम्मीद

भाजपा को उम्मीद भी है कि सत्ता में उसकी वापसी होगी और वर्ष 2013 जैसे चुनाव का करिश्मा दोहराया जाएगा, तब पार्टी की 163 सीटें आई थीं और कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई थी, लेकिन इस बार जिस तरह से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने योजनाओं की बारिश की है और सभी वर्गों को खुश करने की कोशिश है। उनकी सौगातें अभी भी जारी हैं। 10 फरवरी को राज्य के बजट में और भी घोषणाएं संभव हैं। पुरानी पेंशन स्कीम का उनका दांव हिमाचल प्रदेश में सफल रहा है। ऐसे में भाजपा थोड़ा सतर्क भी नजर आ रही है। यदि भाजपा यूं ही गुटबाजी करती रही तो बाजी हाथ से फिसल सकती है।

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल लगातार प्रदेश में दौरे कर रहे हैं। खासकर पश्चिमी राजस्थान की जाट बाहुल्य सीटों पर उनकी नजर है। पिछले दिनों उन्होंने सचिन पायलट और भाजपा के राज्यसभा सांसद किरोड़ी लाल मीणा को साथ आने का न्योता दे डाला था।

इसके पीछे जाट, गुर्जर, मीणा समीकरण बताया गया। हनुमान ने तो यहां तक दावा कर दिया कि अगर तीनों साथ आ जाएं तो राजस्थान की 200 में से 140 सीटें यह गठबंधन ला सकता है। हनुमान भले बड़े दावे करें, लेकिन तीनों का साथ आना आसान नहीं है। खासकर किरोड़ी लाल मीणा फिलहाल भाजपा से अलग होंगे, यह नजर नहीं आ रहा। उन्हें मोदी कैबिनेट के आगामी फेरबदल में मंत्री पद मिलने की उम्मीद है। सचिन पायलट का रुख क्या रहेगा?

यह देखना होगा, क्योंकि जो स्थिति उनकी कांग्रेस में बनी हुई है, यह भी माना जा रहा है कि चुनाव से पहले संभवतः वह कोई अलग रास्ता पकड़ सकते हैं। जहां तक आम आदमी पार्टी की बात है तो पार्टी कभी सक्रिय तो कभी निष्क्रिय नजर आती है। वह अभी ग्राउंड पर नहीं दिख रही है।

उसकी नजर कांग्रेस और भाजपा के बागी नेताओं पर टिकी है। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी, जो हर चुनाव में 4 से 6 सीटें ले आती है, उसके लिए भी माना जा रहा है कि चुनाव से पहले राज्य में बहुजन समाज पार्टी की सक्रियता बढ़ेगी और दोबारा से पार्टी कुछ सीटें जरूर लेकर आएगी। 

अब यह पूरी तरह तय है कि भीलवाड़ा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कदम पड़ते ही राजस्थान पूरी तरह चुनावी मोड में आ जाएगा। राज्य में राजनीतिक सरगर्मियां एकाएक और तेज हो जाएंगी। अगले कुछ महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या गठबंधन बनते हैं? कौन सा नेता, किस गुट में जाता है? सरकार बदलने का फार्मूला कायम रहता है या अशोक गहलोत की जादूगरी काम आती है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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