विधेयक लाने से पहले इन सुधारों पर राष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चा कराने की जरूरत थी
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सरकार ने 2016-17 के बजट में किसानों की आय साल 2022 तक दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। इसे ध्यान में रखते हुए उसने कृषि क्षेत्र में सुधार से जुड़ी सिफारिशें देने के लिए 2016 में अशोक दलवाई की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में इन तीन कृषि सुधारों के अलावा और भी सिफारिशें की थीं लेकिन इन कानूनों में इन चीजों का उल्लेख नहीं है।
विधेयक लाने से पहले इन सुधारों पर राष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चा कराने की जरूरत थी, उसके मसौदे को सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए डाला जाना चाहिए था। इसपर लोग सुझाव देते और जो कानून बनता उसमें कमियों की संभावना कम रहती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने जिस तरह से विधेयकों को संसद में पारित कराया और आनन-फानन में उन्हें कानून का रूप दिया गया, उससे सरकार की नीयत पर संदेह उठे।
तमाम शंकाओं की वजह से ही किसान पिछले कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार और किसानों के बीच बातचीत के बेनतीजा रहने के बाद उच्चतम न्यायालय ने दखल देते हुए इन कानूनों के कार्यान्वयन पर अपने अगले आदेश तक रोक लगा दी और एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया जो संबंधित हितधारकों से बातचीत करेगी और दो महीने के भीतर उच्चतम न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी।
यह अभूतपूर्व है, इस तरह के निलंबन का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह अधिकारों के पृथक्करण का उल्लंघन लगता है। अदालत का काम किसी राजनीतिक विवाद में मध्यस्थता करना नहीं होता बल्कि उसका काम किसी कानून, अधिकार या नियम की असंवैधानिकता या अवैधता का निर्धारण करना है।
साथ ही मध्यस्थता के लिए बनाई गई विशेषज्ञ समिति को लेकर भी अजीब स्थिति है, मध्यस्थता का नियम यह कहता है कि मध्यस्थ सभी पक्षों को मान्य होने चाहिए। लेकिन यहां किसानों को उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के सदस्यों पर विश्वास नहीं है, उनका कहना है कि विशेषज्ञ पहले ही कानूनों पर सरकार के रुख का समर्थन कर चुके हैं। अब जब समिति गठित कर दी गयी है तो किसानों के उसके सामने अपना पक्ष रखने में कुछ नहीं जाता। ॉ
वह उसके सामने अपनी शिकायतें रख सकते हैं और अदालत के फैसले का इंतजार कर सकते हैं। लेकिन सबसे अच्छा होगा कि सरकार किसानों के साथ खुले मन से बातचीत करे। सरकार की दलील है कि ये सुधार क्रांतिकारी हैं और ये कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाएंगे जो पूरी तरह गलत भी नहीं है क्योंकि कृषि क्षेत्र में सुधार वक्त की जरूरत है और उन सुधारों का मूल उद्देश्य फसलों की विविधता को बढ़ाना, किसानों की आय बढ़ाना, कृषि को पर्यावरण के लिहाज से ज्यादा सतत, सब्सिडी को कम अनुत्पादक बनाना, खाद्य पदार्थों की मूल्यवृद्धि को रोकना आदि है।
इन कानूनों को निरस्त करने का मतलब होगा कि खरीदार चुनने और कॉरपोरेट को बेचने की आजादी छिन जाएगी। जहां सरकार करीब 20 फसलों के लिए एमएसपी तय करती है, वह मुख्य रूप से धान और गेहूं ही खरीदती है। इन दोनों फसलों की पैदावार काफी है, बाजार को दूसरी फसलों की जरूरत है। हमें फसल विविधता की जरूरत है।
लेकिन ये कानून किस तरह से किसानों के लिए मददगार होंगे, किसानों को यह अच्छी तरह से समझाना और उनका भरोसा जीतना सबसे जरूरी है। इसके लिए सरकार की ओर से किसानों की हर तरह की शंका दूर करना, कथनी और करनी का अंतर दूर करने वाले कदम उठाना बेहद आवश्यक है। वरना यह गतिरोध बना रहेगा।
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