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किसानों का विश्वास जीत कर ही दूर किया जा सकता है गतिरोध

Tue, 23 Feb 2021 11:41 AM IST
प्रशांत नारंग लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Farmers Protest - फोटो : PTI
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गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा ने किसानों के आंदोलन को उसके उद्देश्य से भटका दिया है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहे हैं कि क्या यह पूरे देश के किसानों का आंदोलन है, क्योंकि दिल्ली की सीमाओं पर बैठे प्रदर्शनकारी किसान ज्यादातर दो राज्यों पंजाब और हरियाणा के ही हैं।

किसान कृषि कानूनों को निरस्त करने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी रूप देने की मांग कर रहे हैं। जबकि सच्चाई ये है कि एमएसपी कभी भी किसी कृषि कानून का हिस्सा नहीं रहा है।एक पक्ष यह भी है कि कुछ किसान विरोध प्रदर्शन कर दूसरे किसानों की व्यापार करने की आजादी नहीं छीन सकते।

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ऐसे में सवाल यह उठता है कि किसान क्यों चाह रहे हैं कि एमएसपी को कानूनी रूप दिया जाए। इसकी वजह उनके मन में उपजी शंका है, उन्हें लग रहा है कि सरकार एमएसपी की व्यवस्था को आगे पूरी तरह खत्म कर देगी।

ये कृषि कानून कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए जरूरी थे। ये कानून रातों-रात नहीं आए हैं बल्कि लंबे समय से इनकी मांग की जा रही थी। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार भी ये सुधार लाना चाहती थी। लेकिन तब सहमति न बन पाने की वजह से इनपर आगे नहीं बढ़ा गया। वर्ष 2000 में कृषि मंत्रालय ने शंकरलाल गुरु की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति गठित की थी। 2001 में समिति ने अपनी रिपोर्ट में कई सिफारिशें दीं जिनमें से एक यह भी थी कि कृषि उपज मंडी समितियों (एपीएमसी) का नए सिरे से गठन किया जाए।

देश में उदारीकरण के साथ कई क्षेत्रों में सुधार आया लेकिन कृषि क्षेत्र इससे अछूता रह गया। ऐसे में कृषि क्षेत्र को मुक्त करने के लिए ये सुधार जरूरी हैं। कृषक उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) अधिनियम 2020, चुनने की आजादी का विस्तार कर और किसानों को तर्कशील आर्थिक हिस्सेदार मानते हुए उनके जीवन में सुधार ला सकता है। हाल फिलहाल तक किसान केवल सरकारी मंडियों में ही अपनी उपज बेच सकते थे। किसान अब कीमतों के आधार पर यह चुन सकता है कि वह किसे अपनी उपज बेचना चाहेगा।

इससे पहले कई राज्यों ने अंतर-राज्यीय व्यापार पर रोक लगा रखी थी। यह कानून पूरे भारत को एक अकेले बाजार के तौर पर देखता है।

इसी तरह से कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020 किसानों को खरीदाताओं के साथ अनुबंध करने के लिहाज से मुक्त कर उनके जीवन में सुधार ला सकता है। हाल फिलहाल तक किसान केवल पहले से पक चुकी अपनी फसलों को ही मौजूदा दरों पर बेच सकते थे।

यह अधिनियम फसलों की पहले से तय मात्रा पहले से तय कीमत पर बेचने के लिए किसान को राजी करने को संभव करता है। इससे किसान और व्यापारी दोनों के लिए कीमत में अचानक से आने वाले बदलाव का जोखिम कम हो जाता है।

वहीं आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020 का मकसद कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना है। संशोधन का लक्ष्य उपभोक्ताओं और किसानों दोनों के हितों का संरक्षण करते हुए कृषि क्षेत्र में उदारीकरण लाना है। संशोधन का मकसद भंडारण सुविधाओं जैसे क्षेत्रों में निजी निवेश को बढ़ावा देना भी है जिससे बाजारों में कीमतों की स्थिरता में सुधार आएगा।

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इन कानूनों को निरस्त करने का मतलब होगा कि...

विधेयक लाने से पहले इन सुधारों पर राष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चा कराने की जरूरत थी - फोटो : अमर उजाला

सरकार ने 2016-17 के बजट में किसानों की आय साल 2022 तक दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था। इसे ध्यान में रखते हुए उसने कृषि क्षेत्र में सुधार से जुड़ी सिफारिशें देने के लिए 2016 में अशोक दलवाई की अध्यक्षता में एक समिति गठित की थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में इन तीन कृषि सुधारों के अलावा और भी सिफारिशें की थीं लेकिन इन कानूनों में इन चीजों का उल्लेख नहीं है।

विधेयक लाने से पहले इन सुधारों पर राष्ट्रीय स्तर पर एक चर्चा कराने की जरूरत थी, उसके मसौदे को सार्वजनिक प्रतिक्रिया के लिए डाला जाना चाहिए था। इसपर लोग सुझाव देते और जो कानून बनता उसमें कमियों की संभावना कम रहती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। केंद्र सरकार ने जिस तरह से विधेयकों को संसद में पारित कराया और आनन-फानन में उन्हें कानून का रूप दिया गया, उससे सरकार की नीयत पर संदेह उठे।

तमाम शंकाओं की वजह से ही किसान पिछले कई महीनों से प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार और किसानों के बीच बातचीत के बेनतीजा रहने के बाद उच्चतम न्यायालय ने दखल देते हुए इन कानूनों के कार्यान्वयन पर अपने अगले आदेश तक रोक लगा दी और एक विशेषज्ञ समिति का गठन कर दिया जो संबंधित हितधारकों से बातचीत करेगी और दो महीने के भीतर उच्चतम न्यायालय को अपनी रिपोर्ट देगी।

यह अभूतपूर्व है, इस तरह के निलंबन का कोई कानूनी आधार नहीं है। यह अधिकारों के पृथक्करण का उल्लंघन लगता है। अदालत का काम किसी राजनीतिक विवाद में मध्यस्थता करना नहीं होता बल्कि उसका काम किसी कानून, अधिकार या नियम की असंवैधानिकता या अवैधता का निर्धारण करना है।

साथ ही मध्यस्थता के लिए बनाई गई विशेषज्ञ समिति को लेकर भी अजीब स्थिति है, मध्यस्थता का नियम यह कहता है कि मध्यस्थ सभी पक्षों को मान्य होने चाहिए। लेकिन यहां किसानों को उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति के सदस्यों पर विश्वास नहीं है, उनका कहना है कि विशेषज्ञ पहले ही कानूनों पर सरकार के रुख का समर्थन कर चुके हैं। अब जब समिति गठित कर दी गयी है तो किसानों के उसके सामने अपना पक्ष रखने में कुछ नहीं जाता। ॉ

वह उसके सामने अपनी शिकायतें रख सकते हैं और अदालत के फैसले का इंतजार कर सकते हैं। लेकिन सबसे अच्छा होगा कि सरकार किसानों के साथ खुले मन से बातचीत करे। सरकार की दलील है कि ये सुधार क्रांतिकारी हैं और ये कृषि क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव लाएंगे जो पूरी तरह गलत भी नहीं है क्योंकि कृषि क्षेत्र में सुधार वक्त की जरूरत है और उन सुधारों का मूल उद्देश्य फसलों की विविधता को बढ़ाना, किसानों की आय बढ़ाना, कृषि को पर्यावरण के लिहाज से ज्यादा सतत, सब्सिडी को कम अनुत्पादक बनाना, खाद्य पदार्थों की मूल्यवृद्धि को रोकना आदि है।

इन कानूनों को निरस्त करने का मतलब होगा कि खरीदार चुनने और कॉरपोरेट को बेचने की आजादी छिन जाएगी। जहां सरकार करीब 20 फसलों के लिए एमएसपी तय करती है, वह मुख्य रूप से धान और गेहूं ही खरीदती है। इन दोनों फसलों की पैदावार काफी है, बाजार को दूसरी फसलों की जरूरत है। हमें फसल विविधता की जरूरत है।

लेकिन ये कानून किस तरह से किसानों के लिए मददगार होंगे, किसानों को यह अच्छी तरह से समझाना और उनका भरोसा जीतना सबसे जरूरी है। इसके लिए सरकार की ओर से किसानों की हर तरह की शंका दूर करना, कथनी और करनी का अंतर दूर करने वाले कदम उठाना बेहद आवश्यक है। वरना यह गतिरोध बना रहेगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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