केंद्र की भाजपा सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले नागरिकता (संशोधन) कानून को लागू कर दिया है। लेकिन खासकर पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में इसके विरोध को देखते हुए यह बहस तेज हो रही है है कि आगामी चुनाव में इसका क्या और कितना असर होगा? पक्ष और विपक्ष इसे लेकर परस्पर विरोधाभासी दावे जरूर कर रहा है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की राय में इस कानून के कारण धार्मिक आधार पर वोटरों के ध्रुवीकरण का अंदेशा है।
इसके बारे में अधिसूचना जारी होते ही पश्चिम बंगाल के साथ समूचे पूर्वोत्तर भारत में इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। अंतर यह है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार इसके खिलाफ है और पूर्वोत्तर में छात्र और सामाजिक संगठन व विपक्षी राजनीतिक दल। असम में इसकी कमान राज्य के ताकतवर छात्र संगठन अखिल असम छात्र संघ (आसू) के हाथों में है। उसके बैनर तले इस कानून की प्रतिया जलाई गई हैं और मशाल जुलूस निकाले जा रहे हैं।
वैसे, दशकों से घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे असम में इस कानून के सबसे कड़े विरोध का ठोस कारण है। इस कानून के तहत 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आने वाले हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है।
असम के लोगों को डर है कि इससे पड़ोसी देशों में आने वाले शरणार्थियों की बाढ़ के कारण असमिया लोगों की भाषा, संस्कृति, इतिहास और पहचान खतरे में पड़ जाएगी। यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि करीब चार साल पहले इस कानून के संसद में पेश होने पर भी असम में इसके खिलाफ भारी हिंसा और आगजनी हुई थी। उसमें कई लोगों की मौत हो गई थी और यह राज्य लंबे समय तक कर्फ्यू और अशांति की चपेट में रहा था।
इस कानून का विरोध करने वालों की दलील है कि यह साल 1985 के उस असम समझौते का उल्लंघन है जिले राज्य के लोगों की जीवन रेखा माना जाता है। उस समझौते में कहा गया था कि 25 मार्च 1971 के बाद असम में अवैध रूप से आने वाले तमाम लोगों को घुसपैठिय़ा मानते हुए राज्य से निकाल दिया जाएगा।
इस कानून का विरोध करने वाले संगठनों को आशंका है कि नए नागरिकता कानून से बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर आने वाले हिंदू बंगालियों को भारतीय नागरिकता मिलने की स्थिति में राज्य की मूल आबादी अल्पसंख्यक हो जाएगी। आसू के अध्यक्ष उत्पल शर्मा कहते हैं कि केंद्र ने तानाशाही तरीके से नागरिकता कानून थोप दिया है। यह असम समेत समूचे पूर्वोत्तर के लोगों के लिए विनाश की वजह साबित होगा।
इलाके के दो अन्य राज्यों-त्रिपुरा और मेघालय में भी छात्र और सामाजिक संगठन इस कानून के विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं। इन संगठनों की दलील है कि उक्त कानून के तहत भारी तादाद में नागरिकता हासिल करने वाले लोगों के कारण इलाके में जनसांख्यिकी संतुलन गड़बड़ा जाएगा।