राज्य की गैर-आदिवासी आबादी विभाजन के समय के 45 फीसदी से बढ़कर 70 फीसदी तक पहुंच गई है।
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यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि टिपरा मोथा अलग ग्रेटर टिपरालैंड के गठन की मांग कर रही है। उसने 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और इनमें से आदिवासी बहुल कम से कम 20 सीटों पर उसके बेहतर प्रदर्शन की संभावना जताई जा रही है।
इन लोगों का है बहुमत
वहीं, आखिर भाजपा राज्य की पारंपरिक पार्टी वाममोर्चा और कांग्रेस के गठजोड़ की बजाय चार साल पुरानी टिपरा मोथा को निशाना क्यों बना रही है? राज्य के राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखें तो इसकी वजह साफ हो जाती है। त्रिपुरा पूर्वोत्तर का अकेला ऐसा राज्य है जहां देश के विभाजन के बाद आने वाले बांग्लाभाषी प्रवासियों का बहुमत है।
गैर-आदिवासी आबादी बढ़ चुकी है
राज्य की गैर-आदिवासी आबादी विभाजन के समय के 45 फीसदी से बढ़कर 70 फीसदी तक पहुंच गई है। इससे स्थानीय आदिवासियों को अपने वजूद पर संकट नजर आ रहा है। इस खतरे से निपटने के लिए ही आदिवासियों ने यहां वाममोर्चा सरकार का खुलकर समर्थन किया था। लेकिन लंबे अरसे तक सत्ता में रहने के बावजूद वह भी आदिवासी हितों की रक्षा की दिशा में कई ठोस कदम नहीं उठा सकी। इसी वजह से 2018 में उन लोगों ने भाजपा को समर्थन दिया।
टिपरा मोथा के बढ़ते प्रभाव की वजह से ही भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने उसे तालमेल की बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया था, लेकिन वह देबबर्मा की मांग के अनुरूप ग्रेटर टिपरालैंड पर कोई लिखित भरोसा नहीं दे सकी। हालांकि, ऐसा नहीं है कि टिपरा से सिर्फ भाजपा को ही खतरा है। यह पार्टी विपक्षी गठबंधन के लिए भी खतरा बन सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केंद्र और पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्यों में सत्ता में होने का फायदा इस चुनाव में भाजपा को जरूर मिल सकता है, लेकिन चुनावी नतीजों के बाद भगवा पार्टी अगर टिपरा मोथा से हाथ मिलाने पर मजबूर हो जाए तो किसी को कोई हैरत नहीं होनी चाहिए।
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