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त्रिपुरा में चुनावी सरगर्मी बढ़ने के साथ ही तेज हुआ आरोप-प्रत्यारोप का दौर

सार

सत्ता के दावेदार घोषणापत्र और वादों के जरिए मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस ने सत्ता में आने पर किसानों को 150 यूनिट मुफ्त बिजली देने और धान की खरीद में न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करने का वादा किया है।
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सत्ता के दावेदार घोषणापत्र और वादों के जरिए मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। - फोटो : istock
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विस्तार
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इस बार सत्तारूढ़ भाजपा और उसे चुनौती देने वाले कांग्रेस-वाम गठबंधन के लिए नाक और साख का सवाल बने पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में चुनावी सरगर्मी अचानक तेज हो गई है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य में चुनावी रैलियां और रोड शो कर चुके हैं। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 और 13 फरवरी को चुनावी रैलियों को संबोधित करेंगे। भाजपा ने अबकी जितनी ताकत झोंकी है उससे साफ है कि इस चुनाव की उसके लिए कितनी अहमियत है। राज्य की 60 सीटों के लिए 17 फरवरी को मतदान होना है।

भाजपा-इंडीजीनस पीपुल्स फ्रंट को मिल रही चुनौती

बीते पांच साल से राज करने वाली भाजपा-इंडीजीनस पीपुल्स फ्रंट (आईपीएफटी) सरकार को इस बार कांग्रेस-वाम गठजोड़ और क्षेत्रीय पार्टी टिपरा मोथा से कड़ी चुनौती मिल रही है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने भी भाजपा और कांग्रेस-वाम गठबंधन को निशाने पर लेते हुए व्यापक चुनाव अभियान शुरू कर दिया है।

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सत्ता के दावेदार घोषणापत्र और वादों के जरिए मतदाताओं को लुभाने के हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। कांग्रेस ने सत्ता में आने पर किसानों को 150 यूनिट मुफ्त बिजली देने और धान की खरीद में न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करने का वादा किया है। भाजपा नौ फरवरी को अपना घोषणापत्र जारी कर चुकी है।

आरोप-प्रत्यारोप का दौर

चुनाव अभियान के तेजी पकड़ते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज होने लगा है। केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने सोमवार को एक चुनावी जनसभा में विपक्षी गठबंधन के साथ ही त्रिपुरा के शाही वंशज प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा के नेतृत्व वाली टिपरा मोथा पार्टी को भी आड़े हाथ लिया। उन्होंने टिपरा मोथा पर कांग्रेस और माकपा के साथ गोपनीय समझौता और उसकी बी टीम होने का आरोप लगाया।

शाह के इस बयान पर टिपरा मोथा के प्रमुख देबबर्मा ने कहा है कि उनकी पार्टी किसी की बी टीम नहीं है। भाजपा नागालैंड, मेघालय, मिजोरम, तमिलनाडु और पंजाब में स्थानीय दलों की बी-टीम है। लेकिन टिपरा मोथा छोटी पार्टी होने के बावजूद किसी के साथ कोई समझौता नहीं करती है।

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दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने अपने चुनाव अभियान के दौरान भाजपा और विपक्षी गठबंधन को आड़े हाथों लेते हुए उनको एक ही थैली के चट्टे-बट्टे करार दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राज्य में भाजपा विपक्षी गठबंधन की बजाय शाही घराने के प्रद्योत विक्रम देबबर्मा के नेतृत्व वाली टिपरा मोथा को ही अपना मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानते हुए उस पर जम कर हमले कर रही है। इसलिए असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा समेत तमाम नेता कह रहे हैं कि उनकी पार्टी राज्य के विभाजन के खिलाफ है।

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राज्य की गैर-आदिवासी आबादी विभाजन के समय के 45 फीसदी से बढ़कर 70 फीसदी तक पहुंच गई है। - फोटो : Agency (File Photo)
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि टिपरा मोथा अलग ग्रेटर टिपरालैंड के गठन की मांग कर रही है। उसने 42 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं और इनमें से आदिवासी बहुल कम से कम 20 सीटों पर उसके बेहतर प्रदर्शन की संभावना जताई जा रही है।

इन लोगों का है बहुमत

वहीं, आखिर भाजपा राज्य की पारंपरिक पार्टी वाममोर्चा और कांग्रेस के गठजोड़ की बजाय चार साल पुरानी टिपरा मोथा को निशाना क्यों बना रही है? राज्य के राजनीतिक समीकरण को ध्यान में रखें तो इसकी वजह साफ हो जाती है। त्रिपुरा पूर्वोत्तर का अकेला ऐसा राज्य है जहां देश के विभाजन के बाद आने वाले बांग्लाभाषी प्रवासियों का बहुमत है। 

गैर-आदिवासी आबादी बढ़ चुकी है

राज्य की गैर-आदिवासी आबादी विभाजन के समय के 45 फीसदी से बढ़कर 70 फीसदी तक पहुंच गई है। इससे स्थानीय आदिवासियों को अपने वजूद पर संकट नजर आ रहा है। इस खतरे से निपटने के लिए ही आदिवासियों ने यहां वाममोर्चा सरकार का खुलकर समर्थन किया था। लेकिन लंबे अरसे तक सत्ता में रहने के बावजूद वह भी आदिवासी हितों की रक्षा की दिशा में कई ठोस कदम नहीं उठा सकी। इसी वजह से 2018 में उन लोगों ने भाजपा को समर्थन दिया।

टिपरा मोथा के बढ़ते प्रभाव की वजह से ही भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने उसे तालमेल की बातचीत के लिए दिल्ली बुलाया था, लेकिन वह देबबर्मा की मांग के अनुरूप ग्रेटर टिपरालैंड पर कोई लिखित भरोसा नहीं दे सकी। हालांकि, ऐसा नहीं है कि टिपरा से सिर्फ भाजपा को ही खतरा है। यह पार्टी विपक्षी गठबंधन के लिए भी खतरा बन सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि केंद्र और पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्यों में सत्ता में होने का फायदा इस चुनाव में भाजपा को जरूर मिल सकता है, लेकिन चुनावी नतीजों के बाद भगवा पार्टी अगर टिपरा मोथा से हाथ मिलाने पर मजबूर हो जाए तो किसी को कोई हैरत नहीं होनी चाहिए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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