मधुश्री मुदके, इशिका रामाकृष्णन और सुभादर्शिनी प्रधान
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मधुश्री मुदके
मधुश्री मुदके ATREE में एक शोधकर्ता, जो दक्षिण-पश्चिमी भारत में उभयचरों पर मानवजनित गतिविधियों के प्रभावों पर काम कर रही हैं। मधुश्रीजी “EDGE ऑफ एक्जिस्टेंस”, एक कार्यक्रम जो उन प्रजातियों के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करता है जो क्रमिक रूप से भिन्न और विश्व स्तर पर लुप्तप्राय हैं, के अंतर्गत पश्चिमी घाटों में कोटिगेहर डांसिंग फ्रॉग (मेंढक) के लिए पारिस्थितिक आवश्यकताओं और खतरों पर शोध कर रही है। यह गंभीर रूप से लुप्तप्राय मेंढक पर अपनी तरह का पहला अध्ययन है।
प्रकृति और विशेष रूप से पक्षियों के प्रति अपने बचपन के लगाव के कारण, उन्होंने 2014 में अपना संरक्षण करियर शुरू किया। इस क्षेत्र में पर्यावरण प्रभाव आकलन करते समय वह डांसिंग फ्रॉग के संपर्क में आई और पाया कि इसका बहुत कम अध्ययन किया गया था। उन्होंने पाया कि मेंढकों के संरक्षण के लिए आवास संरक्षण सबसे महत्वपूर्ण है, और स्थानीय समुदाय काफी हद तक प्रजनन स्थलों को पवित्र उपवनों के रूप में संरक्षित करके पहले से ही ऐसा कर रहे थे।
वह कहती हैं कि हालांकि संरक्षण के क्षेत्र में सही दिशा खोजना मुश्किल है, खासकर एक महिला के रूप में, वह उन लोगों को खोजने में सक्षम रही हैं जिन्होंने इस यात्रा के दौरान उनका मार्गदर्शन किया।
इशिका रामाकृष्णन
इशिका रामाकृष्णन “सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज” की एक शोधकर्ता हैं, जो मनुष्यों और गैर-मानव प्राइमेट्स के बीच के संबंधों का अध्ययन करती हैं। उनका वर्तमान अध्ययन असम में गिब्बन, लंगूर और मकाक का मनुष्यों के साथ के संबंध पर केंद्रित है। वह अध्ययन कर रही हैं कि भू-उपयोग में परिवर्तन कैसे प्राइमेट्स को प्रभावित कर रहा है, स्थानीय इतिहास और लोककथाओं में उनका जुड़ाव और मनुष्यों की निकटता से उनके व्यवहार में क्या बदलाव आता है।
मुंबई में पली-बढ़ी इशिका को प्रकृति से जुड़ने का ज्यादा मौका नहीं मिला, लेकिन उन्हें वन्य जीवन के बारे में पढ़ने और प्रकृति पर फिल्म देखने का शौक था। घर में अपने पालतू जानवरों के व्यवहार को देखने के बाद उन्हें जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करने में दिलचस्पी आई। वह विज्ञान संचार के क्षेत्र में काम करना जारी रखना चाहती हैं, जैसे की बच्चों की किताबें लिखना और पॉडकास्ट बनाना।
सुभादर्शिनी प्रधान
सुभदर्शिनी प्रधान जूलॉजी में एमएससी हैं और वर्तमान में पीएचडी कर रही हैं। उनका अध्ययन ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में मैंग्रोव पिट्टा के व्यवहार और संरक्षण पर केंद्रित है। मैंग्रोव पिट्टा एक छोटा, रंगीन पक्षी है जो निवास स्थान के नुकसान से खतरे में है। एक छोटी सी चिड़िया होने के कारण पिट्टा का अध्ययन करना कठिन होता है।
ये महिलाएं उस क्षेत्र में अद्भुत काम कर रही हैं जिसमें किसी भी इंसान के लिए काम करना मुश्किल है। परिवार से दूर वन्य जीवन के अध्ययन में कठिन इलाके को पार करना वास्तव में बहुत चुनौतीपूर्ण है। प्रकृति और वन्य जीवन के प्रति थोड़ा और संवेदनशील होने के लिए इन महिलाओं को हमारे लिए प्रेरणा बनने दें।
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