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विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस: पारिस्थितिक अनुसंधान क्षेत्र में महिलाओं का योगदान

सार

इशिका रामाकृष्णन “सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज” की एक शोधकर्ता हैं, जो मनुष्यों और गैर-मानव प्राइमेट्स के बीच के संबंधों का अध्ययन करती हैं। उनका वर्तमान अध्ययन असम में गिब्बन, लंगूर और मकाक का मनुष्यों के साथ के संबंध पर केंद्रित है।
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डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन - फोटो : डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन
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विस्तार
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हर साल 11 फरवरी को विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है। दुनियाभर में विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों की भूमिका का जश्न मनाते हुए, आइए जानें कुछ अद्भुत महिला वैज्ञानिकों के बारे में जो पारिस्थितिकी के क्षेत्र में दिलचस्प शोध कर रही हैं और चुनौतियों का सामना करते हुए फली-फूली हैं और कई लोगों के लिए प्रेरणादायी हैं।

डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन

ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क (सारस) के अपने संरक्षण कार्य के लिए प्रसिद्ध, डॉ. पूर्णिमा देवी बर्मन असम में एक गैर सरकारी संगठन “अरण्याक” के साथ एक जीवविज्ञानी हैं। पक्षियों के साथ उनका प्रेम संबंध पांच साल की उम्र में शुरू हुआ, जब वे असम में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर अपनी दादी के साथ रहती थीं। उनकी दादी ने उन्हें विभिन्न पक्षी-प्रजातियों और पक्षी-गीतों के बारे में सिखाया, लेकिन उन्होंने 2007 में एक जीवन बदलने वाली घटना देखी।

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उन्होंने देखा कि एक किसान एक पेड़ को काट रहा है जिसमें ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क का घोंसला और चूजे है। उन्होंने पाया की यह पक्षी अपने अनाकर्षक रूप, हड्डियों और मृत जानवरों को खाने और दुर्गंध फ़लाने के लिए बदनाम है। पक्षी को हरगिला कहा जाता है, जिसका अर्थ हड्डी-निगलने वाला होता है। पूर्णिमाजी ने तब स्थानीय समुदायों को सारस के पारिस्थितिक महत्व के बारे में शिक्षित करने पर ध्यान केंद्रित किया।


यही नहीं उन्होंने हरगिला सेना बनाने के लिए असम के कामरूप जिले के गांवों में महिलाओं के एक समूह को संगठित किया। हरगिला सेना घोंसलों की रक्षा करती हैं, घायल सारसों का पुनर्वास करती हैं और लोगो को जागृत करने के लिए सारस के बारे में लोक गीत, कविता और नाटक दिखाती है।

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आज, हरगिला सेना में 10,000 से अधिक महिलाएं हैं, और यह असम के कई जिलों में फैली हुई है। कामरूप जिले के गांवों में घोंसलों की संख्या 28 से बढ़कर 250 से अधिक हो गई है, जिससे यह दुनिया में ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क की सबसे बड़ी प्रजनन कॉलोनी बन गई है। हरगिला सेना सारस के घोंसलों के पास पौधे भी लगाती है। वे बच्चों को शिक्षित करने के लिए स्कूलों का दौरा करते हैं और विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन करते हैं।


पूर्णिमाजी ने अपने घर का कार्यभार और अपने दो बच्चो को भी संभालते हुए, अपने परिवार तथा असम के गांवों के लोगों की सारस और वन्यजीव प्राणी के संरक्षण के बारे में मानसिकता ही बदल दी। उनके काम को विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है और उन्हें संयुक्त राष्ट्र के चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरस्कार और नारी शक्ति पुरस्कार (भारतीय महिलाओं के लिए सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार) सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

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मधुश्री मुदके, इशिका रामाकृष्णन और सुभादर्शिनी प्रधान - फोटो : मधुश्री मुदके, इशिका रामाकृष्णन और सुभादर्शिनी प्रधान

मधुश्री मुदके

मधुश्री मुदके ATREE में एक शोधकर्ता, जो दक्षिण-पश्चिमी भारत में उभयचरों पर मानवजनित गतिविधियों के प्रभावों पर काम कर रही हैं। मधुश्रीजी “EDGE ऑफ एक्जिस्टेंस”, एक कार्यक्रम जो उन प्रजातियों के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करता है जो क्रमिक रूप से भिन्न और विश्व स्तर पर लुप्तप्राय हैं, के अंतर्गत पश्चिमी घाटों में कोटिगेहर डांसिंग फ्रॉग (मेंढक) के लिए पारिस्थितिक आवश्यकताओं और खतरों पर शोध कर रही है। यह गंभीर रूप से लुप्तप्राय मेंढक पर अपनी तरह का पहला अध्ययन है।

प्रकृति और विशेष रूप से पक्षियों के प्रति अपने बचपन के लगाव के कारण, उन्होंने 2014 में अपना संरक्षण करियर शुरू किया। इस क्षेत्र में पर्यावरण प्रभाव आकलन करते समय वह डांसिंग फ्रॉग के संपर्क में आई और पाया कि इसका बहुत कम अध्ययन किया गया था। उन्होंने पाया कि मेंढकों के संरक्षण के लिए आवास संरक्षण सबसे महत्वपूर्ण है, और स्थानीय समुदाय काफी हद तक प्रजनन स्थलों को पवित्र उपवनों के रूप में संरक्षित करके पहले से ही ऐसा कर रहे थे।

वह कहती हैं कि हालांकि संरक्षण के क्षेत्र में सही दिशा खोजना मुश्किल है, खासकर एक महिला के रूप में, वह उन लोगों को खोजने में सक्षम रही हैं जिन्होंने इस यात्रा के दौरान उनका मार्गदर्शन किया।


इशिका रामाकृष्णन

इशिका रामाकृष्णन “सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज” की एक शोधकर्ता हैं, जो मनुष्यों और गैर-मानव प्राइमेट्स के बीच के संबंधों का अध्ययन करती हैं। उनका वर्तमान अध्ययन असम में गिब्बन, लंगूर और मकाक का मनुष्यों के साथ के संबंध पर केंद्रित है। वह अध्ययन कर रही हैं कि भू-उपयोग में परिवर्तन कैसे प्राइमेट्स को प्रभावित कर रहा है, स्थानीय इतिहास और लोककथाओं में उनका जुड़ाव और मनुष्यों की निकटता से उनके व्यवहार में क्या बदलाव आता है।

मुंबई में पली-बढ़ी इशिका को प्रकृति से जुड़ने का ज्यादा मौका नहीं मिला, लेकिन उन्हें वन्य जीवन के बारे में पढ़ने और प्रकृति पर फिल्म देखने का शौक था। घर में अपने पालतू जानवरों के व्यवहार को देखने के बाद उन्हें जानवरों के व्यवहार का अध्ययन करने में दिलचस्पी आई। वह विज्ञान संचार के क्षेत्र में काम करना जारी रखना चाहती हैं, जैसे की बच्चों की किताबें लिखना और पॉडकास्ट बनाना।


सुभादर्शिनी प्रधान

सुभदर्शिनी प्रधान जूलॉजी में एमएससी हैं और वर्तमान में पीएचडी कर रही हैं। उनका अध्ययन ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में मैंग्रोव पिट्टा के व्यवहार और संरक्षण पर केंद्रित है। मैंग्रोव पिट्टा एक छोटा, रंगीन पक्षी है जो निवास स्थान के नुकसान से खतरे में है। एक छोटी सी चिड़िया होने के कारण पिट्टा का अध्ययन करना कठिन होता है।

ये महिलाएं उस क्षेत्र में अद्भुत काम कर रही हैं जिसमें किसी भी इंसान के लिए काम करना मुश्किल है। परिवार से दूर वन्य जीवन के अध्ययन में कठिन इलाके को पार करना वास्तव में बहुत चुनौतीपूर्ण है। प्रकृति और वन्य जीवन के प्रति थोड़ा और संवेदनशील होने के लिए इन महिलाओं को हमारे लिए प्रेरणा बनने दें।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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