‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का संकल्प
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ये राज्य क्यों बने, किन राजनीतिक परिस्थितियों, आग्रहों और जनाकांक्षा के कारण बने, इस पर काफी कुछ कहा गया है। यह भी सिद्ध हो चुका है कि केवल एक भाषा और संस्कृति की वजह से ही कोई राज्य हमेशा एक रहे, जरूरी नहीं है। कुछ के तो नाम भी बदले गए हैं। भावनात्मक लगाव, प्रशासनीय सुविधा तथा विकास की आकांक्षा के कारण राज्यों के मानचित्र बदलते भी रहे हैं। बावजूद इन सबके हर राज्य के स्थापना दिवस पर उसे दूसरे राज्यों द्वारा बधाई दिए जाने का चलन कम ही रहा है।
अलबत्ता राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जरूर ऐसा करते रहे हैं, क्योंकि वो भारत संघ के मुखिया हैं या फिर सम्बन्धित राज्यों के राज्यपाल व मुख्यमंत्री राज्य की जनता को बधाई देते आ रहे है। बधाई का यह आदान- प्रदान उतना ही आत्म केन्द्रित है, जितना कि फ्लैट या बंगलों में रहने वालों का जीवन। जहां बगलवाले से दूसरे को कोई खास मतलब नहीं होता।
राज्यों के बीच भावनात्मक एकीकरण की पहल
ऐसे में अगर यह शुरुआत की गई है, हर राज्य दूसरे सीमावर्ती राज्य का जन्मोत्सव मनाएगा तो यह अच्छी पहल है बशर्तें कि सभी राज्य इसको उसी भाव में लें। ऐसा हुआ तो इससे राज्यों के बीच भावनात्मक एकीकरण को नया बल मिलेगा। साथ ही मूल राज्य के आप्रवासी दूसरे राज्यों को अपनी पितृभूमि से जुड़ाव का अलग अहसास होगा। इस पहल को और व्यापक बनाना चाहिए, क्योंकि किसी भी राज्य में परप्रांतीय ज्यादातर दूध में शकर की माफिक ही रहते हैं, भले ही कुछ राज्यों में राजनीतिक दुराग्रहों के कारण उनके खिलाफ मुहिम चलाई जाती रही है।
अब ये सवाल कि यह सब अभी ही क्यों सूझा या सूझ रहा है? क्या इसका लक्ष्य सांस्कृतिक एकीकरण है या फिर इसके जरिए कोई नया राजनीतिक लक्ष्य है? भारत को एक ही संस्कृति में रंगना है? पहले के राजनेताओं को इसकी जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई? देश का तानाबाना टूटने का वैसा डर नहीं था या फिर इस तानेबाने को कायम रखने लिए जरूरी सदिच्छाओं और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी।
ये आशंकाएं हो सकती हैं, पर ऐसा ही होगा, इसकी संभावना बहुत कम है। सम्बन्धित राज्य के वो निवासी जो बाहर से आकर उस राज्य में बस गए हैं और अब वही उनकी मातृभूमि बन चुकी है, को बिसरा कर अपनी पितृभूमि का इकतारा बजाने लगेंगे, यह व्यावहारिक रूप से भी संभव नहीं है। न ही वो ऐसा कभी करना चाहेंगे। हां ऐसे आयोजनों से उनकी अलग सांस्कृतिक पहचान को स्वीकृति और सराहना ही मिलेगी। दरअसल इस तरह के आयोजन राजभवन में करना अपने आप में सांस्कृतिक विविधता का अभिनंदन करना ही है।
इस पहल में राजनीति ढूंढना सही नहीं होगा, लेकिन वर्तमान राजनीतिक कटुता के बीच यह कोशिश कितनी कामयाब होगी, देखने की बात है। महाराष्ट्र और गुजरात को बधाई देने में राज्यपाल मंगू भाई पटेल और सीएम शिवराजसिंह चौहान को कोई दिक्कत इसलिए नहीं हुई, क्योंकि ये दोनों और मप्र भी भाजपा शासित है। दिक्कत तब हो सकती है, जब विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों को भाजपा शासित राज्यों द्वारा या फिर उसके विपरीत भी सम्बन्धित राज्य के शीर्ष नेता एक दूसरे को बधाई देंगे।
यह जानना दिलचस्प होगा कि वो किस मन और भाव से एक दूसरे को बधाई देते हैं? अगर आगामी 1 नंवबर को शिवराज चौहान, केरल के वामपंथी सीएम पी. विजयन को और विजयन शिवराज को बधाई देते दिखे और दोनों ही राज्यों के राजभवनों में एक दूसरे के सांस्कृतिक वैभव का आत्मीय भाव से आस्वाद लेते दिखे तो बात कुछ और ही होगी। लेकिन फिलहाल इसकी संभावना कम ही लगती है।
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