शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती साल 1973 में ज्योतिष्पीठ के पीठाधीश्वर बने
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स्वाधीनता संग्राम में 15 महीने जेल काटी
पोथीराम ने किशोरावस्था से युवा अवस्था में प्रवेश किया तो उसी दौरान महात्मा गांधी ने अगस्त 1942 में ‘‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’’ नारे का उद्घोष कर दिया। पोथीराम भी 19 साल की अवस्था में स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े और ’’क्रांतिकारी साधू’’ के रूप में चर्चित हुए। आन्दोलन में उन्होंने 9 माह की सजा वाराणसी और 6 माह की सजा मध्य प्रदेश की जेलों में काटी।
महापुरुषों की संकल्प शक्ति से देश 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ तो पोथीराम ने आद्यगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित अद्वेत मत को सर्वश्रेष्ठ मानकर सन् 1950 में ज्योतिष्पीठ के ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती से विधिवत् दण्ड सन्यास की दीक्षा ली और ‘‘स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती’’ का नाम धारण कर सनातन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए समर्पित हो गए।
भारत के नागरिकों को दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्ति दिलाने के लिए स्वामी करपात्री महाराज द्वारा स्थापित ’रामराज्य परिषद’ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने आध्यात्मिक आन्दोलन चलाया।
सन् 1973 में ज्योतिष्पीठ के पीठाधीश्वर बने
भारत के चार कोनों में स्थापित चार सर्वोच्च धार्मिक पीठों में से एक हिमालयी पीठ ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम के ब्रह्मलीन होने पर सन् 1973 में द्वाराकापीठ एवं पुरीपीठ के तत्कालीन शंकराचार्यों, श्रृंगेरीपीठ के प्रतिनिधि, भारत धर्म महामण्डल, काशी विद्वत परिषद आदि संस्थाओं एवं स्वामी करपात्री जी महाराज सहित देश के अनेक सन्तों, विद्वानों के द्वारा स्वामी स्वरूपानन्द को ज्योतिष्पीठ के पीठाधीश्वर के पद पर आसीन किया गया।
देश में स्वंभू शंकराचार्याे की संख्या 50 से भी अधिक मानी जाती है
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शंकराचार्य पद की दुहरी जिम्मेदारी 1982 में
स्वामी जी ज्योतिष्पीठ की जिम्मेदारी निभा ही रहे थे कि द्वारका-शारदा पीठ के जगतगुरू शंकराचार्य सच्चिदानन्द तीर्थ ब्रह्मलीन हो गये। लेकिन वह अपने जीवित रहते ही स्वामी स्वरूपानन्द को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर गये थे। उनकी इच्छानुसार स्वामी स्वरूपानन्द को 27 मई 1982 को द्वारका पीठ का भी पट्टाभिषेक कर दिया गया। इस प्रकार स्वामी स्वरूपानन्द भारत की चार में से दो पीठों के पीठाधीश्वर बन गये। इस प्रकार आधा भारत उनके धर्माधिकार में आ गया।
स्वामी जी स्वाधीनता सेनानी होने के नाते आन्दोलन में कांग्रेस से जुड़े रहे। इसलिये उनका झुकाव सदैव कांग्रेस की ओर माना जाता था। इसी झुकाव के कारण उनकी कभी आरएसएस से नहीं निभी। जबकि आरएसएस भी स्वरूपानन्द सरस्वती के प्रतिद्वन्दी स्वामी बासुदेवानन्द के पीछे खडा रहा। स्वामी जी रामजन्मभूमि आन्दोलन में आरएसएस और भाजपा के आलोचक रहे। वह सदैव मंदिर को आस्था का विषय मानकर इसके राजनीतिकरण के घोर विरोधी रहे।
प्रधानमंत्री ने केवल शरदा पीठ का शंकराचार्य माना
स्वामी स्वरूपानन्द के अधीन भारत की दो धार्मिक पीठें अवश्य आ गईं थीं मगर उनका मार्ग कभी निष्कंटक नहीं रहा। हालांकि, देश में स्वंभू शंकराचार्याे की संख्या 50 से भी अधिक मानी जाती है। इनमें से कई दावेदार शरदा पीठ के भी हैं। लेकिन इस पीठ के पीठाधीश्वर के रूप में स्वरूपानन्द को निर्विवाद माना गया। लेकिन ज्योतिष्पीठ का मामला सुप्रीमकोर्ट तक गया और अन्ततः फैसला स्वरूपानन्द के पक्ष में ही गया। जबकि दूसरे दावेदार स्वामी वासुदेवानन्द को अदालत ने न केवल अमान्य घोषित किया अपितु उन पर शंकराचार्य के रूप में उपयोग किए जाने वाले चिन्हों पर भी रोक लगाई गई।
दरअसल, वासुदेवानन्द का दावा था कि उन्हें पूर्व शंकराचार्य ने उत्तराधिकारी घोषित किया था। लेकिन साथ ही उनके विरोधियों के अनुसार वह वेतनभागी कर्मचारी रहे जो कि शंकराचार्य पद के लिए अयोग्यता है। फिर भी भारत सरकार ने वासुदेवानन्द को ही ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में राम मंदिर न्यास का एक ट्रस्टी बनाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत् दिवस अपने शोक संदेश में शंकराचार्य को केवल शरदापीठ का पीठाधीश्वर माना। ज्यातिष्पीठ के दावेदार एक अन्य स्थानीय सन्यासी माधवाश्रम भी रहे। वह उद्भट विद्वान अवश्य थे, मगर सन्यास से पहले विवाहित होने के कारण उन्हें साधू समाज से अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।
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