साये में जीती हो।
सारी दुनिया के लिए रौशन होता है सवेरा जब,
तुम डर के काले साये में रहती हो।
तुम खिड़की की सलाखों के पीछे से,
काटती हो खुद के जिंदा रहने की तारीखें।
हर गुजरती तारीखों पर,
चंद सुकून की सांसे लेती हो।
फिर झट से छुपाने की कोशिश करती हो,
खुद को, खुद के ही साये से।
कि कहीं तुम्हारे गोश्त की खुशबू,
खिड़की के पार न चली जाए।
लेकिन क्या चारदीवारी,
क्या चौखट के पार।
भेड़िये सूंघ ही लेते हैं,
तुम्हारा हंसना, बिसूरना और सांस लेना भी।
उसे चाहिए तुम्हारी हर चीज पर कब्ज़ा,
शरीर, आत्मा, नाम और चेहरा।
तुम चाहो या न चाहो,
तुम मानो या न मानो।
वो तुम्हें पाने को ही अपना,
पुरुषार्थ समझता है।
जो न पा सके तो,
नष्ट करने को आगे बढ़ता है।
लेकिन भूल जाता है वो,
कि हर औरत के भीतर।
पनपते हैं कई कई,
फीनिक्स पक्षी।
जो अपनी ही राख से,
उठ खड़े होते हैं फिर फिर।
हारती जाएगी वो,
ये भ्रम मत पालना।
खुलेगा उसका भी तीसरा नेत्र,
तो भस्म हो जाएगा सब भ्रम।
याद रखना कि शिव के साथ,
वो रहती है हमेशा शक्ति स्वरूप।
उस दिन रोटी सेकते हुए अचानक हाथ की एक उंगली का पिछला हिस्सा गर्म तवे से टकराया। कुछ सेकेंड्स के लिए मैं तिलमिला गई। तुरन्त जले हिस्से पर माँ की बताई सलाह के हिसाब से आटे की लोई लगाई। इसके बावजूद एक नन्हा सा फफोला उस जगह पर उभर आया। करीब 10 दिनों तक जलन, दर्द और टीस तकलीफ देती रही। फफोला फूटने पर उस जगह जितनी बार साबुन लगता, सेनेटाइजर लगता, मैं तिलमिला कर रह जाती। आज यह सोचकर ही दिल में घाव सा दर्द होता है कि वो बच्ची जिसने जीवन में सिर्फ अपने हिस्से का आसमान पाने की आरजू की होगी, जब रात मीठी नींद में सपनों की सैर करते हुए, अचानक उसे आग के हवाले कर दिया गया होगा तब उसे कैसा लगा होगा।
अधमुंदी, उनींदी पलकों से वो चीख भी पूरी तरह नहीं पाई होगी। और कुछ दिन तड़पने के बाद उसके शरीर के साथ उसके सपने भी खाक हो गए। उसकी गलती महज यह थी कि उसने एक सिरफिरे की मित्रता को अस्वीकार कर दिया था। मित्रता का निवेदन ठुकराया जाना उस कथित युवक के पौरूष को आघात की तरह लगा और उसने उस लड़की की जान लेने का ही इरादा कर लिया। जितनी आसानी से उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया था उतनी ही आसानी से उसने लड़की पर तेल डालकर आग लगा दी। बस यूं ही, हमारे देश में सड़क पर गुटका थूकने जितना आसान हो गया है यह!