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Dumka Case: 'न' कहने पर जलती, मरती लड़कियां !

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प्रताड़ना तोड़ देती है भीतर से - फोटो : social media
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सुना है तुम खौफ के,

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साये में जीती हो।
सारी दुनिया के लिए रौशन होता है सवेरा जब,
तुम डर के काले साये में रहती हो।
तुम खिड़की की सलाखों के पीछे से,
काटती हो खुद के जिंदा रहने की तारीखें।
हर गुजरती तारीखों पर,
चंद सुकून की सांसे लेती हो। 
फिर झट से छुपाने की कोशिश करती हो,
खुद को, खुद के ही साये से।
कि कहीं तुम्हारे गोश्त की खुशबू,
खिड़की के पार न चली जाए।
लेकिन क्या चारदीवारी,
क्या चौखट के पार।
भेड़िये सूंघ ही लेते हैं,
तुम्हारा हंसना, बिसूरना और सांस लेना भी।
उसे चाहिए तुम्हारी हर चीज पर कब्ज़ा,
शरीर, आत्मा, नाम और चेहरा।
तुम चाहो या न चाहो,
तुम मानो या न मानो।
वो तुम्हें पाने को ही अपना,
पुरुषार्थ समझता है।
जो न पा सके तो,
नष्ट करने को आगे बढ़ता है।
लेकिन भूल जाता है वो,
कि हर औरत के भीतर। 
पनपते हैं कई कई,
फीनिक्स पक्षी।
जो अपनी ही राख से,
उठ खड़े होते हैं फिर फिर।
हारती जाएगी वो,
ये भ्रम मत पालना।
खुलेगा उसका भी तीसरा नेत्र,
तो भस्म हो जाएगा सब भ्रम।
याद रखना कि शिव के साथ,
वो रहती है हमेशा शक्ति स्वरूप। 

 
 
उस दिन रोटी सेकते हुए अचानक हाथ की एक उंगली का पिछला हिस्सा गर्म तवे से टकराया। कुछ सेकेंड्स के लिए मैं तिलमिला गई। तुरन्त जले हिस्से पर माँ की बताई सलाह के हिसाब से आटे की लोई लगाई। इसके बावजूद एक नन्हा सा फफोला उस जगह पर उभर आया। करीब 10 दिनों तक जलन, दर्द और टीस तकलीफ देती रही। फफोला फूटने पर उस जगह जितनी बार साबुन लगता, सेनेटाइजर लगता, मैं तिलमिला कर रह जाती। आज यह सोचकर ही दिल में घाव सा दर्द होता है कि वो बच्ची जिसने जीवन में सिर्फ अपने हिस्से का आसमान पाने की आरजू की होगी, जब रात मीठी नींद में सपनों की सैर करते हुए, अचानक उसे आग के हवाले कर दिया गया होगा तब उसे कैसा लगा होगा।

अधमुंदी, उनींदी पलकों से वो चीख भी पूरी तरह नहीं पाई होगी। और कुछ दिन तड़पने के बाद उसके शरीर के साथ उसके सपने भी खाक हो गए। उसकी गलती महज यह थी कि उसने एक सिरफिरे की मित्रता  को अस्वीकार कर दिया था। मित्रता का निवेदन ठुकराया जाना उस कथित युवक के पौरूष को आघात की तरह लगा और उसने उस लड़की की जान लेने का ही इरादा कर लिया। जितनी आसानी से उसने दोस्ती का हाथ बढ़ाया था उतनी ही आसानी से उसने लड़की पर तेल डालकर आग लगा दी। बस यूं ही, हमारे देश में सड़क पर गुटका थूकने जितना आसान हो गया है यह! 
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हर जगह असुरक्षा हावी है - फोटो : Social Media
बुरे लोगों का शिकंजा !

अभी दुमका की इस घटना को चंद घण्टे ही बीते होंगे कि एक और नाबालिग बच्ची का शव पेड़ से लटका मिला। इस बच्ची के साथ अमानवीयता की गई और फिर मारकर उसका शव पेड़ से लटका दिया गया। देश के किसी एक हिस्से से ये दो घटनाएं भर नही हैं। सिर्फ पिछले एक महीने का अखबार उठाकर देखिए लड़के द्वारा पीछा किये जाने, दोस्ती करने के लिए दबाव बनाने, जबरदस्ती करने आदि के कारण कई किशोरियों और युवतियों ने आत्मघाती कदम उठा लिया या उन्हें मार डाला गया। कभी चाकू से गोदकर, कभी तेजाब फेंक कर तो कभी जला कर। लड़कियां मर गईं और भेड़िए जीतते गए। 
 
अस्सी का दशक था। मेरे पिताजी की पोस्टिंग उस समय एक दूरस्थ गांव में थी जहां एक अदद स्कूल का मिलना भी मुश्किल था। लिहाजा मुझे नानी के पास शहर में पढ़ने के लिए छोड़ा गया।  साल में दो बार पापा-मम्मी मुझसे मिलने आते और जाहिर था 10-15 दिनों की इस अवधि में मम्मी-पापा साल भर के स्नेह को लुटाने का प्रयास करते। मैं नानी के घर की सबसे लाडली और सबसे छोटी सदस्य थी लिहाजा स्नेह और दुलार यहां भी भरपूर था। पापा जब भी आते, हम लोग लगभग रोज आइसक्रीम खाने जाते। ऐसे ही एक दिन पापा मुझे और मेरी बहन को बाजार लेकर चले। उस समय भी उस शहर में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में बसें चला करती थीं। बस में बहुत भीड़ थी। पापा हमारे आगे खड़े हुए, मेरी छोटी बहन बीच में और मैं सबसे आखिर में। मेरे पीछे एक आँटी थीं और उनके पीछे एक अंकल। मुश्किल से 5 साल उम्र रही होगी मेरी। एक स्टॉप पर वो आँटी उतर गईं।

अगला स्टॉप हमारा था। पापा ने इशारा किया और मैं मन ही मन आइसक्रीम के फ्लेवर्स सोचने लगी कि स्टॉप आ गया। पापा बहुत तेजी से बहन का हाथ पकड़ आगे बढ़े और इसके पहले कि मैं आगे बढ़ती पीछे वाले अंकल ने मुझे पकड़कर पीछे की ओर खींचा। ये सबकुछ उस वक्त हो रहा था जब दिन का सूरज तेजी से हमारे सिर पर चमक रहा था और बस में करीब 50 लोग बैठे और खड़े थे। उस आदमी के दोनों हाथ मेरे कंधो को जकड़े थे और को मुझे खुद से सटाने की पूरी कोशिश में था। कुछ सेकेंड्स तो मुझे कुछ समझ ही नहीं आया। तब तक पापा और बहन नीचे उतरने की प्रक्रिया में थे और जैसे ही पापा ने मेरी ओर देखा मैंने पूरी ताकत लगा कर खुद को छुड़ाया और उनकी तरफ भागी। मैं लगभग कूदते हुए बस से नीचे उतरी। सरकती हुई उस बस से झांकता उस आदमी का चेहरा अब भी मुझे याद है। वो उतनी ही बेशर्मी से मुस्कुराता हुआ, कुटिलता से मेरी ओर देख रहा था। पापा को इसकी भनक भी नहीं थी कि अभी अभी क्या हुआ है। वो हम दोनों बहनों का हाथ पकड़ हमें सुरक्षित फुटपाथ पर चढ़ा रहे थे। खुद मुझे भी सिर्फ इतना समझ आया था कि जो हुआ वह सही नहीं था। हालांकि थोड़ी ही देर में आइसक्रीम के स्वाद ने मुझे उस डर से उबार लिया। लेकिन आज भी मुझे वह घटना जस की तस याद है। कई बातें हैं जो मुझे अब समझ आती हैं।

मैं उस समय न चिल्ला पाई, न किसी से कुछ कह पाई। 5 साल की एक बच्ची जो अपने आस पास एक सुरक्षित माहौल से घिरी रहती है, जिसे नही मालूम कि लोग ऐसे भी हो सकते हैं उसके लिए यह घटनाक्रम किसी सदमे से कम नहीं रहा होगा। शायद इसलिए मैं चीख भी नहीं पाई क्योंकि मुझे नही मालूम था कि इस तरह के व्यवहार के लिए रिएक्ट कैसे करना है। 

पीड़ित बार बार उसी पीड़ा से गुजरती है - फोटो : फाइल फोटो
दोषी को बरी करता समाज, पीड़ित को देता है दोष 

दुमका की उस घटना के बाद से ही कई सवाल उस लड़की के चरित्र और हरकतों (?) को लेकर भी उछल रहे होंगे। मसलन हो सकता है लड़की ने ही लड़के को बढ़ावा दिया हो, लड़की का ही चाल चलन खराब रहा होगा या लड़की हद में नहीं रही होगी आदि, इत्यादि। इसके बिल्कुल विपरीत जुर्म करके भी हंसते हुए पुलिस कस्टडी में अकड़ कर चल रहे लड़के को अब तक समाज ने बरी करने की प्रोसेस चालू भी कर दी होगी। मसलन, इस उम्र में गलतियां हो जाती हैं, जवानी का जोश रहा होगा, जरूर लड़की ने अपने व्यवहार से लड़के को भड़काया होगा, आदि जुमलों के साथ। कोई भी यह नहीं सोच रहा कि लड़की की निजी ज़िन्दगी में जो भी रहा होगा, उसे इस तरह जला कर मार देने का अधिकार और इतना आत्मविश्वास लड़के के पास कैसे आया? 
 
ये तो वो किस्से थे जो दबाने की तमाम कोशिशों के बाद निकलकर सामने आ गए। वरना तो ऐसे किस्सों से अखबार के पन्ने उपन्यास बन जाते। हमारे देश मे न्याय व्यवस्था पहले ही इतने बोझ से लदी हुई है कि अपराध की सजा मिलने में इतनी देर लग जाएगी कि लड़की अगर प्रताड़ना के बाद जिंदा बच गई हो तो यह इंतज़ार उसकी जान ले डालेगा। उसपर कानून हर चीज का डॉक्यूमेंट्री प्रूफ मांगता है। कई बार यहां फर्जी दस्तावेज चल जाते हैं लेकिन इंसानी जज्बातों के लिए कानून को भी आँखों पर पट्टी बांधनी पड़ती है। क्योंकि केवल जज्बात के आधार पर फैसले नहीं किये जा सकते। ऐसे में हर लड़की या तो पूरे समय अपने साथ स्टिंग ऑपरेशन की तर्ज पर सीक्रेट कैमरा लेकर चले जो सारे सबूत जुटाता जाए या फिर अपने होने को ही दुनिया के सामने न आने दे या जो भी उसके साथ जो करना चाहे, चुपचाप करवाती जाए। उधर इस मामले का एक पहलू वे फर्जी केस भी हैं जो लड़कियां या स्वार्थी तत्व अपने फायदे के लिए करवाते हैं। इनके कारण भी कानून और व्यवस्था का असमंजस होना लाजमी है। 
 
ज्यादातर लड़कियों को पहले ही खुद को साबित करने के लिए कई मोर्चों पर जूझना पड़ता है। इस पूरे संघर्ष के बाद फिर अचानक एक दिन कोई आकर उनके सपनों में आग लगा जाता है। तो क्या इसका समाधान नहीं है?  सामाधान हैं, और सबसे पहले ये समाधान परिवार और समाज से ही निकल सकते हैं। पहली चीज है लड़के और लड़कियों को व्यवहारिक स्तर पर एक आंकना। क्लास में दोनों को साथ बैठाने से लेकर सेक्स एजुकेशन देने और निरंतर काउंसिलिंग देने तक जैसे उपाय जल्द से जल्द लागू करना आवश्यक है। वहीं परिवार और समाज द्वारा बचपन से ही लड़की और लड़के दोनों को ही एक दूसरे का सम्मान करना सिखाना जरूरी है। जब आप लड़की को मनपसंद करियर चुनने, आगे बढ़ने की छूट दे रहे हैं तो उसे यह बताना भी जरूरी है कि उसे खुद की सुरक्षा के लिए किस तरह सजग रहना है।

सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करने से लेकर अनजान लोगों से जुड़ने तक, हर मामले में सतर्कता रखनी जरूरी है। परिवार में बच्चों से निरंतर संवाद होना भी जरूरी है। बेटा हो या बेटी, उसके रूटीन में कोई भी परिवर्तन दिखे तो पैरेंट्स का तुरन्त सतर्क होना बनता है। इन सबके अलावा वर्चुअल दुनिया के जाल से उन्हें बाहर लाकर असली दुनिया से जोड़ना भी जरूरी है, ताकि वे हिंसा और नकारात्मकता को खुद में पोषित होने से पहले ही रोक सकें। ये सब संभव है और इसका असर भी होगा लेकिन एक दिन में नहीं। 

कानून बनेंगे, व्यवस्थाएं बदलेंगी लेकिन सबसे पहले हमें स्वस्थ समाज और स्वस्थ सोच का प्रचार बढाना होगा। तभी आने वाले समय में युवा सपने सच की उड़ान भरते दिखाई देंगे।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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