डॉक्टर मनमोहन सिंह को बतौर अर्थशास्त्री भी लोग जानते हैं।
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दुनिया के बड़े ब्रांड्स ने भारत में दस्तक दीय़ नौकरियां और उद्योग बढ़े। ग्लोबलिजेशन की यह नयी व्यवस्था ‘सर्वाइबल आफ द फिटेस्ट’ की व्यवस्था है। जब देश का राजकोषिय घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 8.5 फीसदी के आस-पास था, तब सिंह ने उसे सिर्फ एक साल के अंदर 5.9 फीसदी तक ला दिया था। देश में ग्लोबलाइजेशन की शुरुआत 1991 में सिंह ने ही की थी। उन्होंने भारत को दुनिया के बाजार के लिए तो खोला ही, बल्कि निर्यात और आयात के नियमों को भी सरल बनाया।
मनमोहन सिंह ने तीन कैटेगरी में बड़े बदलाव किए - उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण जिसके तहत विदेश व्यापार उदारीकरण, वित्तीय उदारीकरण, कर सुधार और विदेशी निवेश जैसे बदलाव किये गए थे। आसान शब्दों में कहें तो किसी वस्तु का कितना उत्पादन होगा और उसकी कितनी कीमत होगी, इसका फैसला सरकार नहीं बल्कि बाज़ार पर छोड़ दिया गया।
स्वर्णिम 10 वर्ष
2004 से 2014 जब वो प्रधानमंत्री थे, भारतीय अर्थव्यवस्था के 10 स्वर्णिम वर्ष थे। इस उल्लेखनीय दशक में भारत की जीडीपी औसतन 8.1% की दर से बढ़ी। 2006-07 में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि रिकॉर्ड 10.08% तक पहुंच गई। 2007 में, भारत ने 9% की अपनी उच्चतम सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर हासिल की और दुनिया में दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा।
2005 में, सिंह की सरकार ने वैट कर लागू किया जिसने जटिल बिक्री कर का स्थान ले लिया। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) 2005, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई/आधार) 2009 , महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (मनरेगा), बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई) ), 2011 में शहरों में गरीबों और बेघरों को आवास प्रदान करने वाली राजीव आवास योजना (आरएवाई), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013, आदि उनके प्रमुख कदम हैं जिन्होंने देश को बदल दिया।
डॉक्टर मनमोहन सिंह ने भारतीय अर्थव्यवस्था में बड़े पैमाने पर आर्थिक सुधारों की कवायद की और उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरहॉलिंग में महत्वपूर्ण योगदान दिया है इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
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