पंडित दीन दयाल उपाध्याय
- फोटो : Facebook/BJP
दीनदयाल उपाध्याय और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जुड़ाव
उसके बाद पंडित दीनदयाल बीटी. का कोर्स करने के लिए प्रयागराज (इलाहाबाद) आए और यहां भी उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से नाता नहीं तोड़ा। प्रयागराज पहुंचकर उन्होंने संघ में अपनी सेवा जारी रखी।
बीटी. का कोर्स पूरा हुआ तो उन्होंने खुद को संघ में पूर्णकालिक रूप से समर्पित करने का फैसला किया। संघ ने वर्ष 1955 में उन्हें उत्तर प्रदेश के प्रांतीय संगठक (प्रान्त प्रचारक) बनाने का निर्णय लिया। जल्दी ही उन्होंने संघ में सभी को प्रभावित किया। उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आदर्श स्वयंसेवक समझा जाता था, क्योंकि उनके भाषण व उनके विचार पूर्ण रूप से संघ की शुद्ध विचारधारा पर आधारित ही होते थे।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जनसंघ कनेक्शन
माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर से प्रेरणा लेकर 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की अध्यक्षता में भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई और जनसंघ के माध्यम से ही दीनदयाल ने भारतीय राजनीति में कदम रखा। 1952 में कानपुर में जनसंघ का प्रथम अधिवेशन हुआ। पंडित दीनदयाल उपाध्याय को पहले उत्तर प्रदेश शाखा का महासचिव बनाया गया और उसके बाद उन्हें अखिल भारतीय महासचिव के पद पर नियुक्त किया गया। उनकी कार्य कुशलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जनसंघ के कानपुर अधिवेशन में पारित हुए कुल 15 प्रस्तावों में से 7 प्रस्ताव पंडित दीनदयाल उपाध्याय के थे।
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दीनदयाल उपाध्याय के लिए कहा था, 'अगर मुझे दो दीनदयाल मिल जाएं तो मैं भारतीय राजनीति का नक्शा बदलकर रख दूंगा।' 1953 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की रहस्यमय मृत्यु के बाद दीनदयाल ने जनसंघ को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। वर्ष 1967 तक वो भारतीय जनसंघ में महासचिव रहे और पार्टी को लगातार आगे बढ़ाने के मिशन में जुटे रहे।
दिसंबर 1967 में भारतीय जनसंघ का चौदहवां अधिवेशन कालीकट में हुआ और इसमें सर्वसम्मति से पंडित दीनदयाल उपाध्याय को पार्टी अध्यक्ष चुना गया, लेकिन वो मात्र 43 दिन ही जनसंघ के अध्यक्ष रह सके। 10 फरवरी 1968 को वो लखनऊ से पटना जाने के लिए रेलगाड़ी में बैठे, लेकिन 11 फरवरी को सुबह पौने चार बजे उनकी लाश रेलवे लाइन के किनारे मिली। कहा जाता है कि जौनपुर तक वे जीवित थे, लेकिन उसके बाद किसी ने चलती ट्रेन में से उन्हें धक्का दिया और खंभे से टकरा जाने के चलते उनकी मौत हो गई। दीनदयाल जी के कद का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेता संपूर्णानंद ने उपाध्याय की 'राजनीतिक डायरी' की प्रस्तावना में दीनदयाल को अपने समय के सबसे 'उल्लेखनीय नेताओं' में शामिल बताया है।
पत्रकार और लेखक के रूप में भी करते रहे देश सेवा
दीनदयाल पत्रकार भी रहे थे, उन्होंने अनेकों पत्र पत्रिकाओं का प्रकाशन किया। हिंदुत्व की विचाराधारा को प्रसारित करने के लिए उन्होंने मासिक राष्ट्रधर्म का प्रकाशन किया। इसके अलावा उन्होंने साप्ताहिक पांचजन्य व दैनिक स्वदेश की शुरुआत भी की। उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य, शंकराचार्य की हिंदी में जीवनी लिखी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार की जीवनी का मराठी से हिंदी में अनुवाद करने का श्रेय भी दीनदयाल को ही जाता है।
सरकारों ने भी दिया दीनदयाल को सम्मान
पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारत मां के मुखर और सच्चे सपूत थे। भारत सरकार ने दीनदयाल को श्रद्धांजलि देते हुए 1978 में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। 2017 में गुजरात के कांदला बंदरगाह का नाम बदलकर दीनदयाल उपाध्याय बंदरगाह कर दिया गया। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव पर भारत सरकार ने 2018 में मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय कर दिया। 16 फरवरी 2020 को वाराणसी में पंडित दीनदयाल उपाध्याय मेमोरियल सेंटर खोला गया जिसमें उनकी 63 फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई। यही नहीं, आज देश में उनके नाम पर कई सरकारी योजनाएं भी संचालित की जा रही हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw। co। in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।